एक महाकाव्यात्मक दस्तावेज है संविधान सभा की 12 खंडों की बहस

संविधान सभा की 12 खंडों की 4251 पृष्ठों के इस दस्तावेज की तुलना यदि भारत के ग्रंथ से की जा सकती है, तो मेरी नजर में वह महाभारत है। भले ही संविधान सभा में हथियारों से कोई युद्ध नहीं लड़ा गया, लेकिन वह एक साथ युद्ध और शान्ति दोनों का रणस्थल था। जहां भारत नामक देश के भविष्य का सिर्फ फैसला नहीं हो रहा था, बल्कि भारत के विभिन्न समुदायों- आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषायी, क्षेत्रीय और राजनीतिक– के नियति का भी फैसला हो रहा था। एक शब्द में कहें तो भारतीय जनता की नियति का भी फैसला हो रहा था।

इसमें किसको क्या मिला? किसने क्या खोया? किसको किन-कारणों से कुछ मिला, किसने किन कारणों से जो मिला हुआ था, उसे भी खो दिया? इसका भी उत्तर उसमें मिलता है।

संविधान सभा में प्रभावी समूह और व्यक्ति कौन थे, कैसे उन्होंने भारत की नियति का फैसला किया, इसे भी यह किताब पढ़कर समझा जा सकता है।

यह महाग्रंथ भारतीय लोकतंत्र के सफलता और असफलता के कारणों को समझने के सारे बुनियादी सूत्र मुहैया करता है। भारतीय लोकतंत्र की सफलता के जश्न और उसकी असफलता हताशा की जिस चुनौती का सामना कर रहे हैं, उससे कैसे पार पाया जा सकता है, उसके बुनियादी सूत्र इसमें मौजूद हैं।

आज के भारत के समाने कोई भी संघर्ष और चुनौतियों का कोई ऐसा मुद्दा नहीं है, जो संविधान सभा के समाने उपस्थित न हुआ हो। कुछ बीज रूप में है, तो कुछ विस्तृत पृष्ठों में है।

महाग्रंथ की तुलना करने के लिए मुझे महाभारत जैसे महाकाव्य ही क्यों सूझा? इसकी कई वजहें हैं- पहली तो यह कि महाभारत में जिस तरह विषयों पर चर्चा, वाद-विवाद और संघर्ष हुआ है, वह बहुत ही व्यापक है, सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन का शायद ही कोई ऐसा पक्ष हो जो महाभारत में न आया हो। वैसा इस महाग्रंथ में भी दिखता है।

इसकी दूसरी वजह यह है कि महाभारत में जितने तरह के विविध और जटिल चरित्रों वाले पात्र हैं, उतने ही पात्र संविधान सभा में दिखते हैं। सबकी अपनी धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि अलग-अलग है। बहुत सारी बोली-बानियों के लोग हैं। उनकी अलग-अलग भाषा है। अलग-अलग चीजों के विशेषज्ञ हैं। अनके व्यक्तित्व का स्याह पक्ष है, तो बहुत उजला पक्ष भी है। सबके अपने-अपने व्यक्तित्व के अंतर्विरोध हैं। कोई आदर्शवादी है, तो कोई पूरी तरह भाववादी है। कोई वस्तुगत है तो कोई पूरी तरह आत्मगत।

चरित्रों की, विचारों की, संवेदनाओं की, आस्थाओं की और प्रतिबद्धताओं की इतनी विविधा है कि एक बड़ा सा कोलॉज सा बनता है। 

एक बड़ी बात कि संविधान सभा में हिस्सेदारी की प्रक्रिया में सभी बदल रहे हैं। सभी कुछ अपना छोड़ रहे हैं, कुछ नया अपना रहे हैं। एक दूसरे को समझने की कोशिश करे हैं।

महाभारत की तरह यह भी सही है कि एक राजवंश के लोग बहुसंख्या में हैं, जैसे संविधान सभा में करीब 60 प्रतिशत से अधिक लोग एक जाति-ब्राह्मण जाति- के लोग हैं। लेकिन वहां एकलव्य और शंबूक के वंशज भी हैं और ताकतवर स्थिति में हैं, उनकी आवाज को कोई दबा नहीं सकता है। उनमें कुछ तो पूरी संविधान सभा को दिशा दे रहे हैं, जैसे आंबेडकर और जयपाल सिंह मुंडा आदि।

इस महाकाव्य के एक बड़े नायक आंबेडकर के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों को भी इससे समझा जा सकता है। संविधान सभा के करीब सभी लोग, उनसे सहमत और असहमत दोनों उनकी नैतिकता, निष्पक्षता, वस्तुगतता, तार्किकता, दार्शनिकता, विद्वता, प्रतिभा, अध्ययन, संवैधानिक कानूनी मामलों की विशेषज्ञता, अथक परिश्रम करने की क्षमता, साहस और धैर्य के कायल हैं। संविधान सभा में सभी ने यह स्वीकार किया कि वे संविधान सभा की रीढ़ थे, केंद्रीय व्यक्तित्व थे।

संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद की सभा के अध्यक्ष के रूप में निष्पक्षता पर संविधान सभा के किसी सदस्य ने शायद ही कभी सवाल उठाया हो। वे खुद के न्याय के कुर्सी पर बैठे न्यायाधीश के रूप में निष्पक्ष, पारदर्शी और तटस्थ व्यवहार का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

वर्तमान संविधान को शक्ल देने में नेहरू की भूमिका को भी इस महाकाव्यात्मक दस्तावेज से समझा जा सकता है। नेहरू के बिना भारत के संविधान की महान प्रगतिशील उपलब्धियों को शक्ल देना मुश्किल होता। संविधान सभा में डॉ.आंबेडकर दलित, आदिवासियों, महिलाओं, पिछड़ों और अन्य समूहों के लिए जो कुछ सकारात्मक कर पाए, जिसका परिणाम संविधान था। वह कर पाने में जिस व्यक्ति ने उनका सबसे अधिक साथ दिया, उस व्यक्ति का नाम जवाहर लाल नेहरू था। बल्कि यह कहना सही होगा कि जो एकमात्र व्यक्ति उनके साथ निर्णायक तौर पर खड़ा रहा, वह नेहरू थे। लेकिन अकेले ही बहुत ताकतवर थे।

क्योंकि नेहरू कांग्रेस ( जिसका संविधान सभा में पूर्ण बहुमत था) के सबसे बड़े नेता थे। वे प्रधानमंत्री थे। संविधान सभा के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व थे। उन्होंने बुनियादी मामलों में डॉक्टर आंबेडकर का साथ दिया। यहां तक कि हिंदू कोड़ बिल के मामले में भी। नेहरू का उनका साथ देना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि कई बुनियादी मामलों में सरदार पटेल और राजेंद्र प्रसाद आंबेडकर और नेहरू से असहमत थे। भले ही हिंदू कोड़ बिल पर नेहरू आंबेडकर का निर्णायक साथ नहीं दे पाए, भले उन्हें पीछे हटना पड़ा। लेकिन आंबेडकर यह भी अच्छी तरह जानते थे कि वे किन हालातों में काम कर रहे हैं।

सरदार बल्लभभाई पटेल के व्यक्तित्व के विभिन्न रूप संविधान सभा में सामने आते हैं। लेकिन ये वे लोग हैं, जो चर्चित रहे हैं, लेकिन संविधान सभा में ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिनकी भले ही उतनी चर्चा किन्हीं कारणों से न होती हो, लेकिन इस महाग्रंथ में उनकी भूमिका बहुत बड़ी है। जैसे तमिलनाडु के दलित प्रतिनिधि मुनिस्वामी पिल्लै, अद्भुत, अद्वितीय और असाधारण चरित्र।

यह सच है कि महाभारत की तरह इस ग्रंथ में भी दलित-आदिवासी प्रतिनिधियों को छोड़ दिया जाए, तो मेहनतकश तबकों के बीच के लोग नहीं के बराबर हैं। ज्यादातर मध्यवर्गीय, उच्च मध्यमवर्गीय और निम्न मध्यमवर्गीय समूह के लोग हैं।

महिलाएं तो करीब 15 की संख्या में हैं, लेकिन उनकी स्वतंत्र आवाज बहुत कम सुनाई देती है। महाभारत जैसी दमदार महिला चरित्र अनुपस्थित है।

कैसे संविधान सभा की बैठकों की शुरुआत के कुछ महीनों बाद भारत का भारत-पाकिस्तान नामक दो देशों में बंटवारा हो गया। इस बंटवारे ने कैसे संविधान सभा की करीब-करीब पूरी दिशा बदल दी। कैसे सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों ने सुनिश्चित राजनीतिक प्रतिनिधित्व के अपने सारे अधिकार खो दिए, वे संवैधानिक तौर पर पूरी तरह बहुसंख्यकों की कृपा के भरोसे छोड़ दिए गए, जिसके परिणाम स्वरूप आज करीब राजनीतिक तौर पर प्रतिनिधित्वहीन हो गए हैं, इसका जवाब यह दस्तावेज देता है।

कैसे, किन परिस्थितियों और संघर्षों के चलते दलित प्रतिनिधियों ने अपने प्रतिनिधित्व और आरक्षण का अधिकार बचा लिया। कैसे उनका यह संघर्ष आदिवासियों और भविष्य में अन्य पिछड़े वर्गों के आरक्षण का आधार बना इसका जवाब यह महाग्रंथ देता है।

अन्य पिछड़े वर्गों की प्रतिनिधियों की करीब-करीब अनुपस्थिति के चलते, उनके प्रतिनिधित्व और आरक्षण का सवाल भविष्य के लिए टाल दिया गया। भारत संविधान सभा ने अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) को ऐतिहासिक तौर पर मिल रहे आरक्षण और विशेष प्रतिनिधित्व के सवाल को टाल दिया। यह आरक्षण करीब भारत की ब्रिटिश राज्य से स्वतंत्रता (1947) से करीब 45 वर्ष पहले शुरू हो गया था। इसे 1902 में शाहू महाराज ने शुरू किया था। 

मद्रास प्रेसीडेंसी में 1921 में सत्ता में विराजमान जस्टिस पार्टी की चुनी हुई सरकार ने विधान सभा में बाकायदा बहुमत से कानून बनाकर एससी-एसटी के अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण और वंचित समुदाय के तौर अन्य विशेषाधिकार प्रदान किया था। 

अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) को संविधान निर्माण से पहले कई अन्य रियासतों और प्रांतों में आरक्षण या विशेष प्रतिनिधित्व मिल रहा था। 

भारतीय संविधान सभा ने इसे उनकी इस ऐतिहासिक संघर्षों से हासिल उपलब्धि से उन्हें वंचित कर दिया। भारतीय संविधान में भारत के बहुसंख्य वंचित समुदाय (अन्य पिछड़े वर्ग-ओबीसी) को आरक्षण और वंचना आधारित अन्य विशेष प्रतिनिधित्व भविष्य पर छोड़ दिया गया। जिसे दोबारा हासिल करने में 42 वर्ष से अधिक लग गए, जब मंडल कमीशन की रिपोर्ट की एक सिफारिश (नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू हुआ) लागू हुई। 

हिंदी, अंग्रेजी और कई अन्य भारतीय भाषाओं में यह किताब मुफ्त में ऑनलाइन पीडीए कॉपी उपलब्ध है। एक ऐसा महाग्रंथ है, जिसे संभव हो तो जरूर पढ़ना चाहिए।

यह सिर्फ कानूनी किताब नहीं है। इसे पढ़ते समय साहित्य का भी सुख मिलता है, यह खुद को पढ़ने के लिए बाध्य करती है। कानूनी शब्दावलियों की बोर करने वाली जगहें भी हैं। इसे आधुनिक काल के महाभारत की तरह पढ़ना चाहिए।

आखिर में कुछ तथ्य जो संविधान और संविधान सभा को समझने में सहायक होंगे जान लेना जरूरी है। 26 जनवरी 1950 से संविधान अमल में लाया गया। संविधान संविधान सभा के 284 सदस्यों के हस्ताक्षर से पारित हुआ था। संविधान सभा के लिए कुल 389 सदस्य संख्या निर्धारित की गई थी। भारत पाकिस्तान विभाजन के बाद यह संख्या घटकर 15 अगस्त 1947 को 324 रह गई। संविधान सभा की पहली बैठक में 207 सदस्य शामिल हुए।

इसके साथ ही भारतीय संविधान को तैयार करने में कुल 2 साल, 11 महीने और 18 दिन लगे। इस दौरान संविधान सभा की कुल 11 बैठकों में 165 दिन लगे थे। 

शुरुआत: संविधान निर्माण का काम 9 दिसंबर 1946 को शुरू हुआ।

अंतिम रूप: 26 नवंबर 1949 को संविधान को अंतिम रूप दिया गया।

लागू होने की तिथि: संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। 

(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं।)

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