दस साल पहले उत्तर प्रदेश के दादरी में मोहम्मद अखलाक की मॉब लिंचिंग मामले में उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से 10 आरोपियों के खिलाफ मामला वापस लेने के आवेदन पर नोएडा की एक फास्ट ट्रैक अदालत के न्यायाधीश ने सवाल किया कि क्या कभी भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत मामला वापस लिया गया है?
अखलाक को रेफ्रिजरेटर में कथित रूप से बीफ रखने के आरोप में भीड़ ने मार दिया था।
शुक्रवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने अखलाक के परिवार को सरकार के आवेदन पर आपत्ति दर्ज करने के लिए समय देते हुए सुनवाई 18 दिसम्बर तक स्थगित कर दी। अदालत ने इसी के साथ अभियोजन व बचाव पक्ष से गवाहों के बयान दर्ज करवाने की कार्रवाई तेज़ करने का भी निर्देश दिया।
सरकार के आवेदन में कहा गया है कि “सामुदायिक सद्भाव बढ़ाने के उद्देश्य के लिए मामला वापस लेना आवश्यक है।”
28 सितंबर, 2015 की रात भीड़ ने घर में घुसकर अखलाक और उनके बेटे दानिश को सरियों से पीटते हुए घर से बाहर निकाला था। गाँव के मंदिर पर उद्घोषणा हुई थी कि अखलाक के घर में बीफ रखा हुआ है। हमले में अखलाक की मौके पर मौत हो गई थी जबकि दानिश बुरी तरह घायल हुए थे। दानिश की दो ब्रेन सर्जरी और लंबे उपचार के बाद रिकवरी हो पाई।
पुलिस ने 10 लोगों के खिलाफ हत्या समेत विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था। बाद में आठ और नाम आरोपियों में जोड़े गए थे। इनमें से तीन को नाबालिग घोषित किया गया। दो की मौत हो चुकी है और बाकी सब जमानत पर हैं।
इस मामले की फोरेंसिक जांच भी विवादास्पद रही है। पहली जांच रिपोर्ट में कहा गया कि घर से मिला मांस बकरे का था लेकिन फिर मथुरा प्रयोगशाला में की गई जांच में दावा किया गया कि नमूना गोवंश का था। सरकार ने मामला वापस लेने के लिए किए आवेदन में इस रिपोर्ट का हवाला दिया है।
पीड़ित परिवार के पक्ष में अदालत में मौजूद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) नेता वृंदा करात ने बाद में मीडिया से बातचीत में आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश सरकार का फैसला आरोपियों को बचाने के लिए है। उन्होंने कहा कि आरोप वापस लेने का मतलब यह संकेत देना होगा कि एक व्यक्ति हत्या करने के बाद भी यदि सरकार चाहे तो कानून का दुरुपयोग कर बच निकल सकता है।
उन्होंने कहा कि यह न्यायिक प्रणाली की हत्या करने जैसा होगा। उन्होंने कहा कि सरकार अपनी राजनीति के चलते हत्या के आरोपियों का पक्ष ले रही है। देश कानून के अनुसार चलना चाहिए। हर न्यायप्रिय नागरिक को पीड़ित के परिवार, संविधान और न्यायिक प्रणाली के साथ खड़ा होना चाहिए।