गुजरात : भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ को चुनौती देने के लिए जूझती काँग्रेस

अहमदाबाद। लगभग तीन दशकों से गुजरात की सत्ता से बाहर बैठी कांग्रेस भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ को चुनौती देने के लिए जूझ रही है। 1995 के बाद से भाजपा ने गुजरात में जिस तरह सत्ता, संगठन और प्रशासन पर अपनी पकड़ बनाई है, उसने विपक्ष को हाशिये पर धकेल दिया।

हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव अपवाद रहे, लेकिन उत्तर और मध्य गुजरात लंबे समय तक कांग्रेस का सामाजिक-राजनीतिक आधार क्षेत्र रहे हैं। अब इन्हीं इलाकों से कांग्रेस एक बार फिर राजनीतिक पुनरुत्थान की कोशिश कर रही है।

प्रदेश अध्यक्ष की कमान संभालते ही अमित चावड़ा ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल चुनावी बयानबाज़ी से नहीं, बल्कि सड़क पर उतरकर सत्ता को चुनौती दी जाएगी। इसी रणनीति के तहत ‘जन आक्रोश यात्रा’ को कांग्रेस ने सिर्फ जनसंपर्क अभियान नहीं, बल्कि भाजपा शासन के खिलाफ एक राजनीतिक आरोपपत्र के रूप में पेश किया है।

जन आक्रोश यात्रा के पहले चरण में उत्तर गुजरात के सात ज़िलों में कांग्रेस नेताओं ने गाँव-गाँव जाकर उस मॉडल पर सवाल उठाए, जिसे भाजपा ‘विकास मॉडल’ बताती रही है। कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम, संस्थागत भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, ड्रग्स और अवैध शराब जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर कांग्रेस ने सीधे-सीधे सरकार और प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया। यात्रा के दौरान ड्रग्स के सवाल पर सरकार और पुलिस तंत्र के बेहूदा बचाव ने विपक्ष के आरोपों को और धार दी।

करीब 1200 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद पहला चरण 3 दिसंबर को मेहसाणा ज़िले के बहुचराजी में संपन्न हुआ। इसके बाद 20 दिसंबर से खेड़ा ज़िले के फगवेल गाँव से शुरू हुआ दूसरा चरण अब मध्य गुजरात में राजनीतिक तापमान बढ़ा रहा है। यह चरण 6 जनवरी को दाहोद में समाप्त होगा।

यात्रा के पांचवें दिन बोरसद से अहिमा तक निकली रैली विशेष रूप से अहम रही, क्योंकि यह प्रदेश अध्यक्ष अमित चावड़ा के विधानसभा क्षेत्र आंकलाव से होकर गुज़री। यहाँ जनसभा में उमड़ी भीड़ को कांग्रेस ने संगठन के लिए संजीवनी के रूप में पेश किया। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भीड़ जुटना एक संकेत भर है, असली चुनौती उसे वोट में तब्दील करना है।

सभा को संबोधित करते हुए अमित चावड़ा ने भाजपा नेतृत्व पर सीधा और तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा,

“15 साल पहले जिन भाजपा नेताओं के पास साइकिल थी, वे आज मर्सिडीज़ में घूम रहे हैं। यह बदलाव मेहनत से नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी से आया है।”

उन्होंने शिक्षा के नाम पर ज़मीन घोटाले का आरोप लगाते हुए कहा कि एक कॉलेज के लिए 137 बीघा ज़मीन देना सत्ता-संरक्षित लूट का उदाहरण है, जबकि मात्र 20-25 बीघा ज़मीन में पूरी यूनिवर्सिटी बन सकती थी तो एक कॉलेज को भाजपा के दलालों की वजह से क्यों दी गई।

चावड़ा का हमला केवल भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं रहा। बेरोज़गारी और कॉन्ट्रैक्ट प्रथा को लेकर उन्होंने भाजपा सरकार पर युवाओं का भविष्य गिरवी रखने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि स्थायी नौकरियों के बजाय अस्थायी कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम ने राज्य के युवाओं को असुरक्षित और हताश बना दिया है।

अपने भाषण में गांधीजी की दांडी यात्रा का उदाहरण देकर चावड़ा ने मौजूदा सरकार की तुलना औपनिवेशिक सत्ता से कर दी।

यह बयान स्पष्ट संकेत देता है कि कांग्रेस अब नरम विपक्ष की भूमिका छोड़कर टकराव की राजनीति अपनाने का संदेश दे रही है।

राजनीतिक रूप से देखें तो जन आक्रोश यात्रा कांग्रेस के लिए संगठनात्मक परीक्षा भी है। पार्टी नेतृत्व यह मान चुका है कि केवल शीर्ष नेताओं के भरोसे गुजरात नहीं जीता जा सकता। घर-घर जाकर मुद्दों को ज़मीन से जोड़ना ही एकमात्र रास्ता है।

चावड़ा का यह कहना कि “आंकलाव की ज़िम्मेदारी अब आंकलाव तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे गुजरात की ज़िम्मेदारी है”, दरअसल आंकलाव को भावनात्मक रूप से कांग्रेस के साथ जोड़ने का प्रयास माना जा सकता है क्यूंकि अमित चावड़ा आंकलाव से ही विधायक हैं और अब पूरे प्रदेश के नेतृत्व की ज़िम्मेदारी है।

कांग्रेस की यह यात्रा चार चरणों में पूरे गुजरात को कवर करने की योजना पर आधारित है—पहले उत्तर गुजरात, फिर मध्य गुजरात और संभावित रूप से तीसरे चरण में दक्षिण गुजरात। मार्च-अप्रैल में संभावित महानगर पालिका और ज़िला पंचायत चुनावों को देखते हुए यह अभियान कांग्रेस के लिए राजनीतिक रिहर्सल माना जा रहा है।

अब सवाल यह है कि क्या जन आक्रोश यात्रा केवल सड़क तक सीमित रहेगी या वह भाजपा के अजेय किले में कोई दरार पैदा कर पाएगी? गुजरात की राजनीति में कांग्रेस के लिए यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बनती जा रही है

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