सुरेन्द्रनगर/अहमदाबाद: कथित 1500 करोड़ के ज़मीन घोटाले और ज़मीन के नाम पर कथित अवैध वसूली के मामले में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा छापेमारी के बाद गुजरात सरकार ने सुरेन्द्रनगर ज़िला कलेक्टर डॉ. राजेश पटेल को तत्काल प्रभाव से ट्रांसफर कर दिया है।
सरकार ने ज़िला विकास अधिकारी के.एस. यागनिक को कलेक्टर का अतिरिक्त प्रभार सौंपा है। 2015 बैच के आईएएस अधिकारी राजेश पटेल को फिलहाल किसी विभाग की जिम्मेदारी नहीं दी गई है और उनकी नियुक्ति ‘पोस्टिंग इन वेटिंग’ में रखी गई है।
बताया जा रहा है कि पाटीदारों मक्का खोडल धाम से मुख्य मंत्री भूपेन्द्र पटेल पर दबाव बनाया जा रहा है कि राजेश पटेल को ज़मीन घोटाले में गिरफ्तार न किया जाये। इसीलिए सरकार ने केवल ट्रान्सफर किया है| ट्रान्सफर भी सवालों के घेरे में है। यदि पटेल की घोटाले में कोई भूमिका नहीं है तो ट्रान्सफर भी नहीं किया जाना चाहिए| यदि भूमिका है तो गिरफ़्तारी से नहीं बचाया जाना चाहिए।
गुजरात की राजनीति और प्रशासन में पाटीदार समुदाय का लंबे समय से वर्चस्व रहा है। सत्ता, नौकरशाही और उद्योगों में इस समुदाय की मज़बूत पकड़ मानी जाती है। मुख्यमंत्री से लेकर शीर्ष अधिकारियों तक पाटीदार प्रभाव दिखाई देता है, जिससे निर्णयों और कार्रवाइयों की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहे हैं। इसीलिए गुजरात में विपक्ष भी इस घोटाले पर राजेश पटेल की भूमिका पर बहुत ही संतुलित बयान दे रहा है।
मंगलवार को ईडी ने कलेक्टर राजेश पटेल की मौजूदगी में उनकी ही कचहरी में सर्च ऑपरेशन चलाया था। इसी दौरान नायब मामलातदार (उप राजस्व अधिकारी) चन्द्रसिंह मोरी के आवास पर भी छापा मारा था। इस कार्रवाई में 67.5 लाख रुपये नकद और व्हाट्सएप के ज़रिए पैसे के लेन-देन से जुड़ी चिट्ठियां मिलने के बाद ईडी ने मोरी को गिरफ्तार कर अहमदाबाद ग्रामीण कोर्ट में पेश किया। कोर्ट ने आरोपी को 1 जनवरी तक ईडी रिमांड पर भेज दिया है।
ईडी ने कोर्ट को बताया कि आरोपी के पास रिश्वत और अवैध वसूली से जुड़ा हिसाब-किताब मिला है। एजेंसी के अनुसार, कलेक्टर कार्यालय से ज़मीन के उपयोग परिवर्तन (लैंड पर्पज़ चेंज) के लिए मोबाइल और ‘स्पीड मनी’ के ज़रिए एक व्यवस्थित वसूली तंत्र चलाया जा रहा था।
यह कार्रवाई एक निजी शिकायत के आधार पर की गई है। इसी शिकायत के आधार पर राज्य एंटी करप्शन ब्यूरो ने भी ज़िला कलेक्टर राजेश पटेल, डिप्टी मामलातदार चंद्रकांत मोरी और अन्य 2 सहयोगियों के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया है।
हालांकि, नायब मामलातदार की गिरफ्तारी के बावजूद कलेक्टर राजेश पटेल के खिलाफ अब तक कोई आपराधिक कार्रवाई न होने से सवाल खड़े हो रहे हैं। राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि क्या सरकार कलेक्टर को बचा रही है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि पाटीदार समुदाय से होने के कारण सरकार ने कड़ी कार्रवाई के बजाय केवल तबादले तक मामला सीमित रखा है।
जबकि वर्ष 2022 में इसी तरह के ज़मीन घोटाले में तत्कालीन सुरेन्द्रनगर कलेक्टर को निलंबित किया गया था। वहीं 2024 में आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा को भी इसी तरह के मामले में लोकल क्राइम ब्रांच ने गिरफ्तार किया था, जो अब भी जेल में हैं।
कलेक्टर राजेश पटेल ने मीडिया में अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि उनके निवास पर ईडी ने छापा मारा और पूछताछ की, लेकिन कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला और न ही कोई फाइल ज़ब्त की गई। वहीं दिव्य भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, गिरफ्तार नायब मामलतदार ने ईडी को दिए अपने बयान में दावा किया है कि ज़िला कलेक्टर राजेश पटेल, क्लर्क मयूर गोहिल और पी.ए. जयराज सिंह झाला इस ज़मीन घोटाले में कथित रूप से साझेदार हैं और इनके द्वारा रिश्वत की रकम ली गई है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जांच एजेंसी को दस्तावेज़ी सबूत मिले हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि ज़मीन से जुड़े मामलों में प्रति मीटर 10 रुपये की दर से कमीशन वसूला जाता था।
गौरतलब है कि सुरेन्द्रनगर ज़िला सोलर एनर्जी, सिरेमिक और ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए जाना जाता है। कच्छ के बाद यहां सोलर उद्योग के लिए सबसे अधिक सरकारी ज़मीन उपलब्ध है। आरोप है कि इसी कारण सरकारी ज़मीन की बंदरबांट में कई औद्योगिक समूह सक्रिय हैं। ज़मीन के इस खेल में केवल उद्योगपति और अधिकारी ही नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के मंत्री और नेता भी शामिल बताए जा रहे हैं।
पिछले दो दशकों से ज़मीन को लेकर औद्योगिक घरानों के बीच गुटबाज़ी चल रही है। माना जा रहा है कि इसी गुटबाज़ी के चलते सुरेन्द्रनगर ज़मीन घोटाला पीएमओ तक पहुंचा और ईडी को कार्रवाई करनी पड़ी।
ज़िला कांग्रेस अध्यक्ष नौशाद सोलंकी का कहना है कि “ज़िला कलेक्टर को केवल 1 हेक्टेयर तक ज़मीन आवंटन की शक्ति होती है, जबकि इससे अधिक ज़मीन का आवंटन सरकार द्वारा किया जाता है। उनके अनुसार, ऐसे घोटाले गुजरात के लगभग हर ज़िले में हो रहे हैं, जिसकी ज़िम्मेदारी सरकार की है।
उन्होंने यह भी कहा कि ईडी सीधे प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के अधीन काम करती है और सुरेन्द्रनगर में कार्रवाई दो बड़े सोलर उद्योगपतियों के बीच प्रतिस्पर्धा का नतीजा भी हो सकती है” अडानी ग्रीन और अन्य एक दिल्ली स्थित सोलर कंपनी है| यही दो बड़ी कंपनी है जिनके बीच प्रतिस्पर्धा हो सकती है। बाकी तो छोटी छोटी सोलर कम्पनियाँ है।” आपको बता दें नौशाद सोलंकी कांग्रेस पार्टी से विधायक भी रह चुके हैं। यह मामला भी इन्हीं की विधानसभा दसाड़ा का है|
आम आदमी पार्टी भी इस मामले में बहुत ही संतुलित बयान दे रही है। माना जा रहा है कि आम आदमी पार्टी को पाटीदार समाज और खोडल धाम का आशीर्वाद रहता है। गुजरात में पाटीदारों की पहली पसंद बीजेपी और दूसरी पसंद आम आदमी पार्टी है।
आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता विक्रम दवे ने कहा कि “एग्रीकल्चरल लैंड को नॉन-एग्रीकल्चरल करने के नाम पर भ्रष्टाचार हुआ है। 2022 में भी इसी प्रकार के कौभांड में तत्कालीन जिला कलेक्टर के. राजेश (आईएएस अधिकारी) को निलंबित किया गया था। निलंबन में डेढ़ महीने लगे थे और किसी वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई में समय लगता है।
दवे ने यह भी कहा कि यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि पाटीदार होने के कारण राजेश पटेल को बचाया जा रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि ज़मीन घोटाला कलेक्टर की नाक के नीचे हुआ है”।
वहीं गुजरात प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता परेश धनानी जो पाटीदार समुदाय से हैं से जब इस मुद्दे पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें मामले की पूरी जानकारी नहीं है और इस पर सुरेन्द्र नगर ज़िला कांग्रेस अध्यक्ष या पार्टी प्रवक्ता ही आधिकारिक बयान दे सकते हैं। दूसरी ओर, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष जगदीश विश्वकर्मा ने भी बयान देने से बचते हुए कहा कि “इस विषय में ज़िला कलेक्टर या सरकार से ही बात की जानी चाहिए”।
कथित 1500 करोड़ रुपये के ज़मीन घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय के सुरेन्द्रनगर पहुंचने पर विधायक जिग्नेश मेवाणी ने एक वीडियो जारी कर एक पूर्व आईपीएस अधिकारी पर निशाना साधा। मेवाणी ने कहा कि ज़मीन घोटाले की जांच के सिलसिले में सुरेन्द्रनगर आए ईडी अधिकारियों को वे यह जानकारी देना चाहते हैं कि मेहसाणा ज़िले के सिदोसना, बाल्यासन और खदरपुर गांवों में ब्रह्मभट्ट की कथित अरबों रुपये की बेनामी संपत्तियों की जांच की जानी चाहिए।
उन्होंने दावा किया कि यदि इन मामलों की जांच की जाए तो ईडी को खाली हाथ नहीं लौटना पड़ेगा। इसके अलावा मेवाणी ने श्रेया इंफ्रास्ट्रक्चर में किए गए निवेश और बनासकांठा ज़िले में कथित 800 बीघा ज़मीन की भी जांच की मांग की, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी ब्रह्मभट्ट का निवेश उनकी सरकारी आय के अनुपात में है या नहीं।
12 मार्च 2024 को ज़मीन घोटाले में आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा की गिरफ्तारी हुई थी। शर्मा को इससे पहले 2016 में भी गिरफ्तार किया जा चुका है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राजेश पटेल की गिरफ्तारी न होना केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक शक्ति-संतुलन का सवाल बन गया है। राज्य के मुख्यमंत्री स्वयं पटेल समुदाय से आते हैं और गुजरात की सत्ता व प्रशासन में पाटीदार समुदाय का प्रभाव लंबे समय से रहा है।
आलोचकों का आरोप है कि इसी प्रभाव के चलते राजेश पटेल के मामले में जांच एजेंसियों ने सख़्त आपराधिक कार्रवाई से परहेज़ किया, जबकि अन्य अधिकारियों पर कानून पूरी सख़्ती से लागू हुआ। यह स्थिति जांच की निष्पक्षता और सत्ता के प्रभाव पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
शर्मा के अलावा गांधीनगर के पूर्व कलेक्टर एस.के. लंगा भी इस समय जेल में हैं। लंगा पर आरोप है कि 2018-19 में ज़िला कलेक्टर रहते हुए कलोल तहसील, ज़िला गाँधी नगर के मुलसाना गाँव के आस पास की भूमि को गैर कृषि भूमि का दर्जा गलत तरीके से लाभ पहुँचाया गया, दस्तावेजों में गड़बड़ी कर नियमों के विरुद्ध फैसले लिए गए। यह मामला भी सुरेन्द्र नगर जैसा ही हैl लेकिन सरकारी कार्यवाही का मापदंड दोहरा जहां कार्यवाही जाति देख कर होती है।
(कलीम सिद्दीकी पत्रकार, ऐक्टिविस्ट हैं।)