भारत में शिक्षा का हाल बेहाल है। चौतरफा संकटों से घिरी शिक्षा व्यवस्था में सबसे नकारात्मक पहलू यह है कि यह सभी छात्रों के लिए समान रूप से उपलब्ध नहीं है।
सी लैब के एक नए अध्ययन में पाया गया है कि 5 राज्यों राजस्थान, असम, बिहार, कर्नाटक और महाराष्ट्र के 757 गांवों में दस हजार से अधिक लड़कियां स्कूल नहीं जा रही हैं। इनमें बिहार अव्वल है। लड़कियों से ज्यादा लड़के स्कूल नहीं जा रहे हैं। जाहिर है बच्चों की यह ड्रॉप आउट दर शिक्षा के सार्वभौमिकरण में सबसे बड़ी बाधा है।
कहना न होगा कि यह न सिर्फ बच्चों के भविष्य में रोजगार की संभावना को खत्म कर देता है, बल्कि उन्हें बाल श्रम की ओर धकेल देता है और लड़कियों की गरिमा तथा सुरक्षा को भी खतरे में डाल देता है।
शिक्षा के अधिकार कानून के लागू होने के दशकों बाद भी यह संकट बना हुआ है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि प्रायमरी और अपर प्राइमरी की तुलना में सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्तर पर यह ड्रॉप आउट रेट काफी अधिक है। मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून केवल 14 वर्ष तक के बच्चों पर लागू होता है। इसलिए संभव है कि शिक्षा से वंचित बच्चों में वे भी बड़ी संख्या में शामिल हों जो 14वर्ष से ऊपर के हों।
इससे बड़ी बात यह कि और कोई अन्य ऐसा सरकारी प्रावधान नहीं है जो 14 वर्ष से ऊपर आय के बच्चों पर लागू होता हो। इससे उनको विशेषकर लड़कियों को तरह तरह के शोषण का शिकार होना पड़ता है, जैसे जल्दी विवाह। बिहार का मामला थोड़ा भिन्न है जहां लड़कियों का ड्रॉप आउट जल्दी शुरू हो जाता है। 6.6%अपर प्राइमरी में और 6.8% सेकेंडरी स्तर पर। अपर प्राइमरी स्तर पर इतने अधिक ड्रॉप आउट रेट को समझने के लिए और गहरे विश्लेषण की जरूरत है।
इसके अतिरिक्त यू डाइस का आंकड़ा 2019 से 2025के बीच सरकारी स्कूलों की संख्या में उल्लेखनीय कमी दर्शाता है।संभवतः स्कूलों के विलय या बंदी के कारण। एक अनुमान के अनुसार 32500 स्कूल बंद हो गए। जिसमें 23000 बंद हो गए और 9500 स्कूलों का दूसरे स्कूलों में विलय हो गया। इसका 5.3 लाख छात्रों पर असर पड़ा और इससे नामांकन में 7.2% की कमी आई।
स्कूल बंद होने या मर्जर से स्कूल और घर की दूरी काफी बढ़ सकती है जो शिक्षा के अधिकार का कानून (आरटीई) में दर्ज प्रावधानों का खुला उल्लंघन है।
साफ है कि यह शिक्षा तक छात्रों की पहुंच को प्रभावित करता है। स्कूल तक छात्रों की पहुंच में जटिल और परेशान करने वाली बाधाएं हैं। सामाजिक सांस्कृतिक कारकों में, कम उम्र में विवाह अब भी स्कूल न जाने में प्राथमिक प्रेरक तत्व हो सकता है। बाल विवाह अब भी गहरी जड़ जमाए सामाजिक मुद्दा है, विशेषकर बिहार, असम और राजस्थान में। हालांकि 2022 से 2025 के बीच इसमें काफी कमी आई है, फिर भी यह एक बड़ा कारण बना हुआ है विशेषकर छात्राओं के ड्रॉप आउट के पीछे।
सर्वे ने स्कूल न जाने के अनेक कारण गिनाए हैं मसलन खराब आर्थिक स्थिति, सुरक्षा की चिंता, इसे सांस्कृतिक स्तर पर धब्बा समझा जाना, यातायात की असुविधा और अन्य कारण। रिपोर्ट ने इसके लिए अनेक सुझाव दिए हैं ताकि सार्वभौम शिक्षा के लक्ष्य को हासिल किया जा सके। सरकार और नागरिक समाज के समन्वय द्वारा इसके समाधान के लिए इन सुझावों को लागू करने की जरूरत है।
इसके अलावा आरटीई कानून को कड़ाई से लागू करने की जरूरत है ताकि सभी बच्चों को शिक्षा हासिल करने का अवसर मिल सके। आरटीई क़ानून में ऐसे जरूरी संशोधन जरूरी हैं ताकि 18 वर्ष तक की लड़कियों को हायर सेकेंडरी तक जरूरी शिक्षा मिल सके। इससे बाल विवाह रोकने में भी मदद मिलेगी, इसके साथ ही छात्रवृत्ति जैसे प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए ताकि छात्राओं को स्कूल जाने में प्रोत्साहन मिले। और ड्रॉप आउट की समस्या का समाधान हो सके।
दरअसल। संविधान की धारा 21A (86वा संशोधन 2002 6 से 14 वर्ष के बच्चों को सरकार के लिए अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है। इसे NEP 2020 में 3 साल से 18 साल तक कर दिया गया। इसे पूरा करने के लिए 2030 तक का लक्ष्य रखा गया। बहरहाल वस्तुस्थिति यह है कि अधिकांश बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं, जहां पढ़ने के अलावा उन्हें कोचिंग भी करनी पड़ती है, जिससे जो सरकार की जिम्मेदारी है उसकी भारी कीमत छात्र और अभिभावक चुका रहे हैं।
इस समय देश में कुल बच्चों में 55.9% सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं तो 11.3% प्राइवेट एडेड स्कूलों में और 31.9 प्रतिशत प्राइवेट स्कूलों में। जाहिर है शहर में गांव के अनुपात में अधिक बच्चे प्राइवेट स्कूलों में हैं। शहर में 51.4 छात्र तो 24.3% छात्र गांव में प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे हैं।
गांव में प्राइवेट स्तर से लेकर हायर सेकेंडरी तक क्रमशः 28.1%, 25.9%, 21%, 25.8% छात्र प्राइवेट स्कूलों में हैं तो शहरों में यह संख्या 62.9%, 55.3%, 44%, 42.3% है। 2017-18 में हुए सर्वे की तुलना में यह संख्या बढ़तो ही जा रही है।
जेंडर गैप कम है। शहर में 34.9% तो गांव में 29.9% लड़कियां पढ़ रही है। बहरहाल शहर और गांव दोनों जगह यह संख्य बढ़ती जा रही है। गांव में 25.3% सरकारी स्कूलों में और 98.2% प्राइवेट स्कूलों के छात्र फीस देकर पढ़ाई करते हैं तो शहर में 34.% सरकारी स्कूलों के छात्र फीस देते हैं, तो 98% प्राइवेट स्कूलों के छात्र प्राइवेट स्कूलों में छात्र फीस देकर पढ़ाई करते हैं।
शहरी स्कूलों के छात्र जहां स्कूलों में 26880 से 49075 रुपए तक देते हैं, वहीं ग्रामीण स्कूलों में 17988 से33557 रूपए तक देते हैं। सरकारी ग्रामीण स्कूलों के छात्र 829 रूपए से लेकर 7308 रूपये तक खर्च करते हैं, वहीं शहरी सरकारी स्कूलों के छात्र 1630 रूपये से लेकर 7704 रूपए तक खर्च करते हैं। यह खर्च 5% गरीब परिवारों की कुल आय के बराबर है।
इसी तरह 25.5% छात्र ग्रामीण क्षेत्र में और 30.7% छात्र शहरी क्षेत्र में कोचिंग लेते हैं जिसका औसत खर्च 13026 रूपए शहरी क्षेत्र में तथा 7066 रूपये ग्रामीण क्षेत्र में पड़ता है। दरअसल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का कुल खर्च आम परिवारों की पहुंच के बाहर है।
एनएसएस के 80वें राउंड के सर्वे के अनुसार गांवों में 24.3% और शहरों में 51.4% बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं। बड़े तबके के लिए अच्छी शिक्षा अनुपलब्ध है। अच्छे परिवारों के बच्चे अच्छे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं, उसके ऊपर से वे अच्छी कोचिंग में भी पढ़ रहे हैं।
थॉमस पिकेटी ने जो भारत को सर्वाधिक गैर बराबरी वाला समाज कहा तो वह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। शिक्षा की असमानता इस अतिशय गैर बराबरी का एक प्रमुख कारण है। इसको ठीक करने का एक ही तरीका है कि कम से कम शिक्षा को एक समान और गुणवत्तापूर्ण बनाया जाय। चीन आज अगर एक महाशक्ति के रूप में उभर गया है तो उसके पीछे सबसे बड़ा कारक यही है।
जाहिर है इसके लिए सरकार को शिक्षा को अपनी महत्वपूर्ण प्राथमिकता बनाना होगा, सरकार को शिक्षा पर खर्च बड़े पैमाने पर बढ़ाना होगा। इसके लिए बड़े कार्पोरेट घरानों पर टैक्स बढ़ाना होगा और जरूरत होने पर वित्तीय घाटे की 3%की पवित्र सीमा रेखा का अतिक्रमण करना होगा। सबसे बढ़कर इतिहास को जिस तरह तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है, तमाम संस्थाओं में संघी विचारधारा के लोगों को भरकर उसका भगवाकरण किया जा रहा है, उस पर रोक लगाना होगा।
(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)