दिल्ली वायु प्रदूषण का समाधान राजनीतिक खींचतान नहीं है

दिसंबर में दिल्ली के वायु प्रदूषण संकट के वार्षिक दु:स्वप्न के ख़त्म होने का नाम न लेने के बीच प्रमुख राजनीतिक खिलाड़ियों में पारंपरिक राजनीतिक शब्द-बाण युद्ध भी तेज़ हुआ। अब चूंकि ‘आप’ सत्ता से बाहर है, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को वायु प्रदूषण मसले से निबटने में “पूरी तरह विफल रहने” के आरोपों के साथ निशाना बना रही है। इस साल संकट की भीषणता को देखते हुए रेखा गुप्ता पीछे हटते हुए इसे “विरासती समस्या” बताकर ‘आप’ पर दोष मढ़ रही है।

जैसा कि हर साल दिसंबर में होता है, नागरिकों को साँस लेना मुश्किल हो गया है। वह खामोशी से इस संकट को झेल रहे हैं क्योंकि आख़िर यह उनके लिए कोई नई बात तो है नहीं।

लेकिन इस चिरस्थायी संकट के बीच, राजनीतिक तमाशे की कमी नहीं है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने अधिकारियों को दिल्ली में वायु प्रदूषण स्तर कम करने के लिए यथासंभव प्रयास करने के निर्देश दिए और फिर दावा भी कर दिया की वायु प्रदूषण स्तर कम हो गया है। हालांकि, उनके दावों के उलट, केंद्रीय सरकार के एनसीआर में अपने निगरानी केंद्रों के डेटा ने दिखाया कि वायु प्रदूषण स्तर लगातार दो दिन “गंभीर” श्रेणी में चला गया।

यह गड़बड़ कैसे हुई? क्या उनके अधिकारियों ने उन्हें गुमराह किया? इस दौरान, उनकी पार्टी से ही दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता पड़ोसी पंजाब को, ख़ासकर वाहन के किसानों द्वारा पराली जलाने को, दोष दे रही थीं। क्या पंजाब अकेला दोषी है? दिल्ली में सत्तारूढ़ भाजपा अन्य सभी पड़ोसी राज्यों – हरियाणा, यूपी, राजस्थान और एमपी में शासन कर रही है।इन पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने से भी दिल्ली में स्मॉग बढ़ता है। पर, रेखा गुप्ता इस बारे में एक शब्द नहीं कहतीं। दिल्ली भाजपा सारा दोष पंजाब के मत्थे मढ़ देती है।

इसका मतलब है कि सारा दोष अंतत: पंजाब के किसानों को झेलना पड़ता है। लोग लेकिन हर साल के इस राजनीतिक तमाशे और पार्टियों के एक दूसरे पर दोषारोपण से तंग आ चुके हैं। मीडिया विभिन्न सरकारों के कार्यकालों में एक्यूआई नंबरों की तुलना में लगा है। 

न्यायपालिका भी वायु प्रदूषण को लेकर असहाय ही है

यह वास्तव में निराशाजनक है कि देश की राष्ट्रीय राजधानी में राजनीतिक और प्रशासनिक एलीट अपने साँस लेने के लिए अच्छी हवा भी सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं। दिल्ली वैश्विक कूटनीतिक समुदाय के लिए “पनिशमेंट पोस्टिंग” की जगह के रूप में बदनाम हो चुका है। देश की सबसे बड़ी अदालत चुप कैसे रह सकती है?

सुप्रीम कोर्ट पर भी अपनी प्रासंगिकता ना सही, अपनी ताक़त के प्रदर्शन का दबाव था लेकिन जो सुप्रीम कोर्ट अन्यथा असीमित शक्तियों का दावा करती है, प्रदूषण संकट को लेकर कार्रवाई करने में शक्तिहीन साबित हुई जबकि पिछले एक दशक में अदालत ने तमाम मौकों पर हस्तक्षेप किया है। 

स्मोग टावर का टोकनिज़्म 

यह सच है की पिछले कई सालों की तरह इस बार भी सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक नेताओं और अधिकारियों को वायु प्रदूषण रोकने के लिए प्रभावी कदम न उठाने को लेकर फटकार लगायी। बस, अदालत को ख़ुद पता नहीं था कि यह कदम क्या हो सकते थे। सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से एक ही प्रैक्टिकल प्रस्ताव आया जो 2015 में प्रदूषण से निबटने के लिए स्मोग टावर स्थापित करने का दिल्ली सरकार को दिया निर्देश था। दस साल बाद, इस संदर्भ में हासिल क्या है।

अदालत के निर्देश के छह साल बाद सितंबर 2021 में आनंद विहार में बीस करोड़ की लागत से पहला स्मोग टावर आया। दूसरे टावर का उद्घाटन भी उसी साल दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कनॉट प्लेस में किया जिस पर 22 करोड़ खर्च हुआ। आश्चर्य कि उसके बाद चार साल में तीसरा टावर नहीं लगा। न्यायिक सुझाव को कार्यपालिका का यह प्रतिसाद है!

वैसे भी स्मोग टावर की वायु प्रदूषण रोकने में अपनी सीमाएँ हैं। यह दावा किया गया था कि टावर की खिंचाव प्रणाली स्वास्थ्य प्रभावित करने वाले पीएम10 पार्टिकल का 70 फ़ीसदी और पीएम2.5 पार्टिकल का 50 फ़ीसदी फ़िल्टर कर सकती है। पर वास्तव में, देखा गया कि यह टावर केवल एक वर्ग किलोमीटर के दायरे में हवा को साफ़ कर सकते थे। दिल्ली का भौगोलिक क्षेत्र 1483 वर्ग किलोमीटर है और समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का 34,444 वर्ग किलोमीटर।

मात्र दो टावर वायु प्रदूषण पर कितना असर कर पाएंगे, यह कोई भी समझ सकता है। यह यही दर्शाता है कि शक्तिशाली संस्थाओं की दिखावे और पोस्चरिंग की कोई सीमा नहीं है।

2011 की जनगणना के अनुसार, दिल्ली की आबादी एक करोड़ 63 लाख थी और एनसीआर की तीन करोड़ 30 लाख थी। अब यह बढ़कर क्रमश: दो करोड़ और चार करोड़ हो गई होगी। चार करोड़ लोगों का हर जाड़े के मौसम में साँस लेने के लिए संघर्ष करना राष्ट्रीय आपदा से कम नहीं है, यह एक बड़ी आपदा है जो आपातकालीन उपायों की माँग करती है। इसमें दोष पंजाब पर डालना और उस पर भी पंजाब के किसानों के पराली जलाने पर दोष मढ़ना वायु प्रदूषण संकट से निबटने में कोई मदद नहीं करने वाला। 

पंजाब और पंजाब के किसान दिल्ली के वायु प्रदूषण में कितना योगदान करते हैं? प्रदूषण के और स्रोत क्या हैं और इनसे कैसे निबटा जाए? हालांकि दिल्ली सरकार ऑटो उत्सर्जन पर पाबंदियाँ लगाती है, निर्माण गतिविधियों पर अंकुश लगाती है और औद्योगिक उत्सर्जन भी सीमित करती है लेकिन इनके नतीजे मामूली ही होते हैं। एक हालिया वैज्ञानिक अध्ययन राजनीतिक दोषारोपण के खेल को बढ़ावा देने वाली काफ़ी धुंध ढूँढ हटाता है और दिल्ली के वायु प्रदूषण के विभिन्न ठोस स्रोत का निर्धारण करता है। 

हालिया अध्ययन के नतीजे 

यह अध्ययन जर्नल एन्वायरनमेंटल साइंस एटमॉस्फ़र्स में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने प्रकाशित किया है।(Environ. Sci.: Atmos., 2025, DOI: 10.1039/D5EA00052A)। अक्टूबर-नवंबर में पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने (सीआरबी) की घटनाएँ दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पीएम2.5 बढ़ने के प्रमुख कारणों में से एक है।

दिल्ली-एनसीआर में पीएम2.5 लेवल में सीआरबी उत्सर्जन के सटीक योगदान का अनुमान लगाना मौसम विज्ञान, वायुमंडलीय रसायन विज्ञान और उत्सर्जन में अनिश्चितताओं, और अच्छी क्वालिटी के ऑब्ज़र्वेशन की कमी के कारण मुश्किल है।

वैज्ञानिकों की टीम ने 30 ऑब्ज़र्वेशनल केंद्रों से डेटा का इस्तेमाल कर एक डब्ल्यूआरइफ़-केम सिमुलेशन मॉडल बनाया. यह मौसम अनुसंधान और भविष्यवाणी का मॉडल रसायन शास्त्र के साथ मिलकर बना एक ऐसी विकसित प्रणाली है जो वायु प्रदूषण के अध्ययन और मौसम और जलवायु से इसके संवाद के लिए इस्तेमाल होती है। इस मॉडल से उत्तर पश्चिम भारत में सीआरबी उत्सर्जन के पीएम2.5 स्तर पर प्रभाव का आकलन और अध्ययन किया जाता है। 

आधिकारिक डेटा के अनुसार सीआरबी उत्सर्जन पंजाब और हरियाणा में घट रहा है जिससे सीआरबी के दिल्ली पीएम2.5 स्तर पर प्रभाव 2022 के 18 फ़ीसदी से घटकर 2023 में 16 फ़ीसदी और 2024 में 9 फ़ीसदी रह गया। लेकिन दिल्ली में एक्यूआई में कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ। क्यों?

सैटेलाइट की पकड़ में आने से बचने के लिए किसान शामों में जलाते हैं पराली 

ऐसा इसलिए की सीआरबी दोपहर बाद समय में हो रहा है लेकिन इन इलाक़ों में देर शाम को सैटेलाइट ओवरपास अनुपस्थित रहता है। सीआरबी डेटा का अनुमान इलाके में आग की घटनाओं की संख्या के आधार पर और खेत विशेष से संबद्ध उत्सर्जन कारकों से लगाया जाता है। लेकिन अक्सर आग की घटनाएँ सैटेलाइट ट्रांजिट समय और बादलों के कारण सैटेलाइट की पकड़ में नहीं आ पातीं। मंत्री भूपेंद्र यादव के अतिश्योक्तिपूर्ण दावे इस त्रुटि के कारण हो सकते हैं।

यह अध्ययन इन कमियों को दूर करता है और इसमें दोपहर के ढाई बजे से शाम साढ़े छह बजे के बीच और बादलों के समय आग की घटनाओं को शामिल करता है। 

इस अध्ययन में उत्सर्जन डेटासेट ने प्रकृति से उत्सर्जित गैस और एयरोसोल्ज़, मानवजनित उत्सर्जन जैसे मानव गतिविधियों से माहौल में जारी किए जाने वाले प्रदूषक तत्वों और फिन फायर उत्सर्जन, खुले बायोमास जलाने के मामलों को भी ध्यान में रखा गया जो नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक रिसर्च द्वारा विकसित हाई रेजोल्यूशन फायर इन्वेंटरी मॉडल पर आधारित है।

अध्ययन संकेत देता है की किसान दोपहर के बजाय शाम को पराली जलाने लगे हैं। यह भी बताया गया है की गीली पराली (शाम में) सूखी पराली (दोपहर में) के मुक़ाबले ज़्यादा प्रदूषक उत्सर्जित करती है। शाम को पराली जलाने की यह घटनाएँ सैटेलाइट पकड़ नहीं पता और इसलिए सरकार के अनुमान सही नहीं होते। 

अध्ययन बताता है की वायु प्रदूषण दक्षिण पश्चिमी पंजाब में ज़्यादा विकट है। इसका मतलब है कि दिल्ली के निवासी ही नहीं, पंजाब के किसान ख़ुद भी पराली जलाने से प्रभावित होते हैं। इसका मतलब है कि पंजाब को दिल्ली के लोगों ही नहीं बल्कि, अपनी आबादी के हित में भी इस दिशा में कुछ करना चाहिए। 

इसके अलावा, अध्ययन एक और विसंगति को सामने लाता है। आधिकारिक डेटा के अनुसार, 2024 में आग की घटनाओं और आग के क्षेत्र में 2023 की तुलना में क्रमश: 53 व 58 फ़ीसदी की कमी आई। सीआरबी में भारी कमी का वायु प्रदूषण पर प्रतिक्रिया में भी बड़ा असर दिखना चाहिए। लेकिन अध्ययन टीम के पीएम 2.5 के आकलन में पंजाब क्षेत्र में ज़्यादा कमी नहीं दर्शाते। वास्तव में नवंबर में 2023 के मुक़ाबले 2024 में ज़्यादा सांद्रता है।

अध्ययन टीम इसके लिए किसानों का दोपहर के बजाय शाम को पराली जलाने को करण मानती है जिसकी वजह से कई घटनाएँ पकड़ में नहीं आ पातीं। इससे यह भी पता चलता है की शाम में उत्सर्जन का प्रभाव पीएम2.5 स्तर पर सतह पर ज़्यादा पड़ता है, दोपहर में उसी मात्र में उत्सर्जन से तुलना की जाए तो।

इससे पराली जलाने के मामलों की शिनाख्त और रोक के लिए प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर नीति के मामले में सबक लिया जा सकता है। अध्ययन सुझाता है कि किसानों को बताया जाये कि शाम में पराली जलाने से प्रदूषण रात भर बना रहता है और इसलिए इससे बचना चाहिए। 

अध्ययन के नतीजे वास्तव में बहुत विस्तृत और जटिल हैं और इस तरह के संक्षिप्त लेख में पूरी तरह नहीं दिए जा सकते। बेहतर है कि जिज्ञासु पाठक मूल अध्ययन पर ख़ुद एक नज़र डालें। यह भी उम्मीद की जानी चाहिए कि अध्ययन के नतीजे अधिकारियों को दिल्ली वायु प्रदूषण से निबटने की अपनी रणनीति में आवश्यक सुधार करने में सक्षम बनायेंगे, ख़ासकर किसानों को पराली जलाने के बजाय और तरीके से निस्तारण करने के लिए और वायु प्रदूषण के ख़िलाफ़ लड़ाई में किसानों को शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए।

(लेखक शोधकर्ता और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं। अंग्रेज़ी से अनुवाद : महेश राजपूत)

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