जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) और सदभाव मंच ने देश के विभिन्न हिस्सों में क्रिसमस के मौके पर हुई नफरती हिंसा और गुंडागर्दी की निंदा की है।
संगठनों ने संयुक्त बयान में कहा कि देश में ईसाई और मुस्लिम समुदायों के खिलाफ़ नफ़रत का जो माहौल बनाया जा रहा है, वह बेहद चिंताजनक है। एक तरफ प्रधानमंत्री क्रिसमस के कार्यक्रमों में शामिल होकर दिखावा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ़ जमीन पर अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ रहे हैं। हम राज्य से यह मांग करते हैं कि वह अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए, धार्मिक अल्पसंख्यकों की संवैधानिक व मानव अधिकार, खासकर सुरक्षा, सम्मान और निडरता से अपने धर्म की अभिव्यक्ति के अधिकार को सुनिश्चित करे।
बयान में कहा गया है कि भारत में ईसाइयों का उत्पीड़न पिछले एक दशक से बढ़ती हुई चिंता का विषय रहा है। दिसंबर 2025 के महीने में ही, जब क्रिसमस पर्व की तैयारियाँ चल रही थीं, तब दक्षिणपंथी ताकतों ने उन्हें निशाना बनाया। उन्होंने भारत के अलग-अलग राज्यों में कैरोल गायन और चर्च की प्रार्थनाओं में विघ्न डाला । सड़कों पर अपनी आजीविका के लिए सांता क्लॉज़ की टोपियाँ बेचने वाले गरीब रेहड़ी-पटरी वालों को बेरहमी से पीटा गया।
लोगों और दुकानदारों से ईसाई त्योहारों का बहिष्कार करने को कहा गया। इस नफ़रत, हिंसा और डराने-धमकाने का कार्य काफी हद तक घृणा-भरी ‘हिंदुत्व विचारधारा’ में विश्वास रखने वाले समूहों ने किया, जो ‘भारतीय संस्कृति बचाने’ का दावा करते हैं। कई जगहों पर इन कोशिशों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आधिकारिक संरक्षण भी प्राप्त हुआ।
दोनों संगठनों ने कहा कि ये घटनाएँ सामूहिक रूप से भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19, 21 और 25 से 28 का सीधा उल्लंघन हैं। हम सत्ता में बैठे लोगों की बातों और उनके काम के बीच के इस बड़े फर्क की कड़ी निंदा करते हैं।
बयान में कहा गया है कि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर आधारित है और सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह सभी धर्मों से एक समान दूरी बनाए रखे। लेकिन सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा की बार-बार होने वाली घटनाएं एक अलग ही हकीकत बयां करती हैं।
दक्षिणपंथी संगठन ईसाई त्योहारों पर हमले कर रहे हैं, उन्हें भारतीय संस्कृति के लिए ‘अजनबी’ बता रहे हैं, और हर सामूहिक प्रार्थना, कैरोल गायन और कार्यक्रम को ‘जबरन धर्मांतरण’ की कोशिश करार दे रहे हैं। ‘जबरन धर्मांतरण’ का यह गलत डर फैलाना, धर्मांतरण विरोधी कानूनों का लगातार दुरुपयोग, मनमानी गिरफ्तारियां, त्योहार मनाने के लिए अनुमति न देना और धार्मिक आयोजनों के दौरान अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में विफलता—ये सब मोदी सरकार के तहत देश में संवैधानिक शासन की नाकामी को दर्शाते हैं।
बयान में केंद्रीय गृह मंत्री से बिना किसी देरी के हस्तक्षेप करने और सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्पष्ट निर्देश जारी करने की मांग की गई है जो निम्न प्रकार है:
1. ईसाईयों या मुसलमानों के त्योहारों के दौरान, या किसी भी समय, उनके खिलाफ़ होने वाली हिंसा, धमकी और उत्पीड़न को रोका जाए।
2. द्वेष-पूर्ण भाषण, घृणा अपराध, धमकी और हिंसा में शामिल समूहों और व्यक्तियों के खिलाफ सख्त, त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित करें।
3. चर्चों, मस्जिदों, प्रार्थना स्थलों, कैरोल समूहों और सामुदायिक कार्यक्रमों को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराई जाए।
4. उन सभी श्रमिकों, नागरिकों और अल्पसंख्यक समुदायों को मुआवज़ा दिया जाए जिन्हें नफ़रत भरे अपराधों की वजह से अपनी आजीविका का नुकसान उठाना पड़ा है या जिनके धार्मिक स्थलों पर हमला हुआ है।
5. अवैध हिरासत, मौलिक अधिकारों के हनन और भीड़ की हिंसा को रोकने में नाकाम रहने वाले पुलिस और जिला प्रशासन की जवाबदेही तय की जाए।
6. धर्मांतरण विरोधी कानूनों के दुरुपयोग को रोका जाए, जिनका इस्तेमाल केवल अल्पसंख्यकों को डराने के लिए किया जा रहा है और जिनमें सजा की दर शून्य है। बिना पूरी जांच, सबूत और अदालती निगरानी के कोई गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। संवैधानिक न्याय के नज़रिए से इन सभी कानूनों की समीक्षा की जाए।
(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)