जब पढ़ना बेचैन करे और लिखना अर्थहीन लगने लगे, तब क्या करें?

रविवार की सुबह जब मैंने ‘द संडे एक्सप्रेस’ को उठाया तब सबसे पहले वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो के छपे फोटो को देखा। उनकी आंखों पर काला चश्मानुमा आवरण था और हाथ एक दूसरे से जुड़े से थे। हथकड़ी तो नहीं दिख रही थी, लेकिन मुद्रा वैसी ही थी। उनके एक हाथ में पानी की बोतल थी। उन्हें हथकड़ी लगाई गई थी, यह बाद के दृश्यों में दिखाई दिया।

‘द संडे एक्सप्रेस’ का शीर्षक थाः ‘‘मदुरौ कैपचर्ड, फ्लोन आउट; यूएस टू रन वेनेजुएला: ट्रंप।” अमेरीकी राष्ट्रपति के हवाले से दिए गए इस शीर्षक ने बेचैनियों से भर दिया। यह शीर्षक मुझे पूरा दिन बेचैन किये रहा। मैं यही सोचता रहा, इस अखबार के संपादक ने ट्रंप के हवाले से क्यों इस तरह का शीर्षक बनाया!

अमेरीकी राष्ट्रपति ने भारत के बारे में और खासकर प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ भी कई तरह के बयान दिये हैं और उसमें कई बयान इस तरह के थे जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर की खबर का दर्जा रखते थे। लेकिन, इस अखबार के संपादक ने उस तरह के बयान को अखबार का मुख्य शीर्षक नहीं बनाया। लेकिन, वेनेजुएला के राष्ट्रपति को लेकर अख़बार ने यह ख़बर बनाई।

इस अखबार में ट्रम्प के हवाले से बनाया गया उपरोक्त शीर्षक एक देश की संप्रभुता और अंतर्राष्ट्रीय नीतियों का खयाल नहीं करता। यह शीर्षक वेनेजुएला और किसी भी संप्रभु राष्ट्र का अपमान है। इस अखबार ने यह अपमान क्यों किया? अखबार का संपादक कह सकता है कि यह ट्रम्प का बयान है। मेरी बेचैनी यही है कि संपादक ने इस बयान को अखबार का शीर्षक क्यों चुना?

इस शीर्षक में ‘कैपचर्ड’ शब्द पर जितना ही जोर देंगे उतना ही आपकी बेचैनी बढ़ती जाएगी। निकोलस मदुरो वेनेजुएला के राष्ट्रपति थे। वेनेजुएला एक संप्रभु राष्ट्र है। ठीक उसी तरह जिस तरह ट्रम्प अमेरीका के राष्ट्रपति हैं और अमेरीका एक संप्रभु राष्ट्र है। संप्रभु राष्ट्रों के बीच संबंधों से ही अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और संस्थाओं की व्यवस्था बनी हुई है।

हम जानते हैं कि अमेरिका इस तरह के संबंधों और संस्थाओं को नहीं मानता है और दूसरे देशों की संप्रभुता को रौंदता रहा है और उनकी संप्रभु राजनीतिक प्रतिनिधि संस्थाओं और नेतृत्व को रौंदता रहा है। उनकी हत्याएं कराता रहा है। राजनीतिक सिद्धांतों में इस अमेरिकी साम्राज्यवाद कहा जाता है जिसे हाल के दिनों कई और नाम भी दिये गये।

हम उसे जो भी नाम दें, अमेरीका ने अपने अस्तित्व में आने के साथ ही अपने पड़ोसी देशों पर कब्जा अभियानों की नीति पर चलना शुरू कर दिया था और आज वह पूरी दुनिया पर कब्जा करने की नीति पर चल रहा है। यह अलग बात है कि साम्राज्यवाद का यह रूप उसके पहले यूरोपीय देशों ने अख्तियार कर रखा था और बाद के दिनों में रूस ने भी यही रास्ता अपना लिया।

साम्राज्यवादियों के बीच की यह होड़ दो विश्वयुद्ध करा चुकी है और अब आगामी युद्ध की तैयारियां एक नये तरह से तबाही के मंजर के साथ आगे बढ़ती जा रही हैं।

यहां समस्या ‘द संडे एक्सप्रेस’ का वह शीर्षक है जिसे ट्रंप के बयान में पेश किया गया। इस अखबार ने यह शीर्षक क्यों बनाया? इसने अगले दिन, 5 जनवरी, 2026 को अपने संपादकीय का शीर्षक इस तरह से बनाया: ‘‘ट्रंप्स लाॅलेस ग्रैब ओपेन रिस्की न्यू चैप्टर।” तो क्या नियम के तहत वेनेजुएला पर ट्रम्प का कब्जा सही होता? और यदि इस ‘‘लाॅलेस ग्रैब’’ से नया चैप्टर यदि खुलता भी है तब इसमें किस तरह का रिस्क है?

रूस पहले से ही यूक्रेन पर कब्जा करता हुआ आगे बढ़ रहा है। रूस और अमेरीका के अलावा और कौन से देश हैं जो इस तरह के नये चैप्टर खोल सकते हैं? इजरायल गाजा पर कब्जा बढ़ाता जा रहा है? लेकिन ये तो पुराने अध्याय बनते जा रहे हैं। तब क्या संपादक को चीन का डर सता रहा है कि वह भी इस दिशा में बढ़ जाएगा?

बहरहाल, ‘द संडे एक्सप्रेस’ का शीर्षक अगले दिन के संपादकीय में खुलता है। इस दिन संपादक ने साफ तौर पर लिखा है कि ‘चंद लोग ही होंगे जो निकोलस मदुरो पर आंसू बहायेंगे’ क्योंकि इसने वेनेजुएला की संस्थाओं, असहमतियों, चुनावों को अपनी तानाशाही से खोखला और दमन का शिकार बनाया और मानवाधिकारों का उल्लंघन किया। तब क्या ट्रम्प उपरोक्त सारी बातों के उल्लंघन के दोषी नहीं हैं? वह तो अंतर्राष्ट्रीय नीति-नियमों के उल्लंघन के भी दोषी हैं।

उन्होंने भारत से गये लोगों को जिस तरह से हथकड़ियों में बांधकर सेना के वायुयानों से वापस भेजा, क्या वह मानवाधिकारों का उल्लंघन और अंतर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन नहीं था? उसने गाजा में हो रहे जनसंहार में जिस तरह से इजरायल का साथ दिया, क्या वह उल्लंघन की श्रेणियों में नहीं गिना जाएगा? ट्रम्प खुद जिन नीतियों को अमेरिका में लागू कर रहे हैं उससे अमेरिका के लोकतांत्रिक मूल्य मजबूत हो रहे हैं?

यह मेरी मुख्य चिंता संपादक के ट्रम्प के बयान को शीर्षक बना देने को लेकर है जिसमें एक संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति को ‘कैप्चर’ किया गया है। ऐसे लगता है कि वह एक भगोड़ा अपराधी हो, जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया है और यह भी कि वह इंसान से कम और खतरनाक कम बन गया जानवर हो जिसे और छोड़ना खतरा हो, उसे अंततः ‘कैप्चर’ कर लिया गया है।

यह खतरनाक भाषा भारत के सबसे प्रबुद्ध माने जाने वाले अखबार का शीर्षक था। यह खतरनाक भाषा फासिस्ट चिंतन के काफी करीब बैठती है। इसे पढ़ना और इससे होकर गुजरना एक भयावह अनुभव और भावी की चिंता से सराबोर करती है। इस भाषा और चिंतन को एक बड़े अखबार में शीर्षक में पढ़ना एक भयावह अनुभव से गुजरना है।

ऐसा नहीं है कि इस भाषा का प्रयोग पहली बार हो रहा है? अपने देश के हुक्मरान आजकल इस भाषा का प्रयोग खुलकर कर रहे हैं और इस व्यवहार में लागू भी कर रहे हैं। लेकिन, अब यह चलते हुए उस अखबार के मुखपृष्ठ पर दिखाई दे रहा है जहां से उम्मीद बांधी जाती रही है।

साम्राज्यवाद सिर्फ एक राजनीति और युद्ध का रूप ही नहीं है, यह अपनी भाषा भी गढ़ते हुए आता है और भाषा के माध्यम से अपने लिए आधार बनाता है। साम्राज्यवाद सिर्फ पूंजीवाद की चरम अवस्था ही नहीं है, यह पूंजीवाद की आधारभूमि लोकतंत्र को खत्म करते हुए फासीवाद का रास्ता भी बनाता है और अनुकूल स्थितियों में फासीवादी राज कायम करता है। इस राज के निर्माण में धर्म, इतिहास, संस्कृति और भाषा की भूमिका महत्वपूर्ण होती है और इस राज्य की स्वीकृति का रास्ता साफ करती है।

ऐसे में, लिखना सिर्फ लिखना नहीं होता है। उसे भाषा के साथ जोड़ना भी होता है। यह तय करना होता है कि भाषा किस राजनीतिक निहितार्थों के साथ खड़ी है। इसे हम अपने बचपन को याद करते हुए इसे और साफ कर सकते हैं। हम अपने घरों से बाहर जाकर जिस भाषा को सीख कर आते थे उसमें मां, पिता या बड़े लोग सुधारते थे। यह प्रक्रिया किताबों को पढ़ने और पाठ्यक्रमों के साथ जूझने में भी चलती रहती थी।

लेकिन, जब हम खुद अपने विचार प्रकट करने की ओर बढ़ते हैं तब हम सबसे अधिक सतर्क होते हैं। आज हमें न सिर्फ सतर्क रहना होगा, अपने विचारों के प्रति भी सतर्क रहना होगा। लिखने की सार्थकता तभी संभव है जब वह साम्राज्यवादी, फासिस्ट भाषा को चुनौती देते हुए जनवादी मूल्यों से भरे शब्दों को नया अर्थ मिले और प्रतिरोध के शब्दों को जगह मिले।

लिखना सिर्फ लिखना है नहीं होता है। लिखते हुए हम सिर्फ अपने विचार ही सामने नहीं रखते। इसमें हमारी परवरिश और हमारी पक्षधरता अभिव्यक्त होती है। आज के दौर में जब फासिस्ट शब्दावलियां नये अर्थ लिए गूंज रही हों, शीर्षक बनकर छप रही हों और उन्हें पढ़ा जा रहा हो, तब निश्चित ही इससे होने वाली बेचैनियाँ निराशा की ओर ले जाती हैं।

लेकिन, ये बेचैनियां हम सभी से नई भाषा की मांग कर रही हैं जो जनवाद और इंसानियत के मूल्यों को अभिव्यक्त कर सकें। हमें बेहद सतर्कता के साथ अपनी भाषा का चुनाव करना होगा।

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