5 जनवरी को आए सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत में यूएपीए जैसे विवादास्पद और दमनकारी क़ानूनों के रहते न्याय वास्तव में संभव है। अदालत ने उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को ज़मानत नहीं दी, जबकि स्वयं यह स्वीकार किया गया कि अब तक उनके ख़िलाफ़ कोई दोषसिद्धि नहीं हुई है। इसके बावजूद उन्हें ट्रायल के नाम पर जेल में ही रखा जाएगा और अगले एक साल तक ज़मानत पर भी विचार नहीं किया जाएगा। ज़मीनी हक़ीक़त में यह वही स्थिति है जिसे आम लोग “पहले जेल, बाद में इंसाफ़” कहते हैं।
दिल्ली दंगों का मामला 2020 का है और आज 2026 की शुरुआत हो चुकी है—यानी लगभग 6 साल बीत चुके हैं। यदि यह मामला वास्तव में उतना ही गंभीर और “राष्ट्रीय सुरक्षा” से जुड़ा हुआ है, जैसा बार-बार दावा किया जाता है, तो फिर अब तक पूरा ट्रायल शुरू क्यों नहीं हुआ?
गंभीर मामलों में त्वरित सुनवाई की बात अक्सर कही जाती है, लेकिन यहाँ तस्वीर इसके ठीक उलट दिखाई देती है। वर्षों तक ट्रायल का आगे न बढ़ना, तारीख़ों का खिंचते जाना और दोष सिद्ध हुए बिना निरंतर हिरासत-यह सब मिलकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
कई नागरिक अधिकार समूहों और क़ानून विशेषज्ञों का यह चिंता जताना स्वाभाविक है कि कहीं यह प्रक्रिया राजनीतिक असहमति, सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाली आवाज़ों, या किसी विशेष समुदाय को लेकर बने पूर्वाग्रहों से प्रभावित तो नहीं हो रही। जब ट्रायल वर्षों तक शुरू ही न हो और क़ैद ही व्यवहार में दंड बन जाए, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था और न्याय की निष्पक्षता- दोनों पर गंभीर प्रश्न चिह्न लगा देता है।
यह जगज़ाहिर है कि दिल्ली दंगों से ठीक पहले, 23 फरवरी, 2020 को मौजपुर–बाबरपुर चौराहे पर सत्ताधारी दल के नेता कपिल मिश्रा ने खुलेआम मंच से भड़काऊ भाषण दिया। कैमरे चल रहे थे, पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी सामने खड़े थे, और शब्द थे- अल्टीमेटम जैसे। उसने कहा कि अगर सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शन नहीं हटे, तो “हम अपने तरीके से सड़कों पर उतरेंगे।” यह सब कुछ सार्वजनिक रूप से वीडियो में दर्ज है। इसके कुछ ही घंटों बाद दिल्ली का बड़ा इलाक़ा हिंसा की चपेट में आ गया। इसके बावजूद न तो कपिल मिश्रा पर यूएपीए लगाया गया, न ही इस भाषण पर वैसी तेज़ क़ानूनी कार्रवाई देखने को मिली, जैसी बाद में दूसरे समुदाय से जुड़े कई छात्रों और कार्यकर्ताओं पर दिखाई गई। जाँच और कार्रवाई का यह भेदभावपूर्ण और दोहरा मापदण्ड अपने आप में कई असहज सवाल खड़े कर देता है।
इसके उलट, उमर ख़ालिद और शरजील इमाम के ख़िलाफ़ आरोप मुख्यतः भाषणों की व्याख्या, चुनिंदा डिजिटल संवाद और एक तथाकथित “बड़ी साज़िश” की परिकल्पना पर आधारित हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई वीडियो या साक्ष्य उपलब्ध नहीं है जिसमें वे सीधे तौर पर हिंसा के लिए उकसाते दिखाई दें। फिर भी, उन पर गैरक़ानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम — यूएपीए के तहत कार्रवाई की गई—एक ऐसा क़ानून, जिसे उसकी कठोरता और दुरुपयोग की आशंकाओं के कारण लंबे समय से आलोचना का सामना करना पड़ता रहा है।
गैरक़ानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम — Unlawful Activities (Prevention) Act, यानी यूएपीए (UAPA) को 1967 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने आतंक-रोधी क़ानून के नाम पर लागू किया था। शुरुआत से ही यह क़ानून विवादों में रहा, लेकिन समय-समय पर किए गए संशोधनों ने इसकी कठोरता को कई गुना बढ़ा दिया। बाद की सभी सरकारों—चाहे यूपीए रही हों या एनडीए—ने न केवल इस क़ानून को बनाए रखा, बल्कि 2004, 2008, 2012 और 2019 में संशोधनों के ज़रिये इसे और अधिक सख़्त तथा आम नागरिकों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किए जाने वाला दमनकारी औज़ार बना दिया।
2019 से 2023 के सरकारी आँकड़े इस ख़तरे को और साफ़ करते हैं। इस अवधि में यूएपीए के तहत 10,000 से अधिक लोगों को गिरफ़्तार किया गया, जबकि दोषसिद्धि की दर महज़ 3 से 5 प्रतिशत रही। यानी बड़ी संख्या में लोग वर्षों तक जेल में रहने के बाद अंततः बरी हुए—बिना किसी अपराध सिद्ध हुए, बिना किसी क़ानूनी सज़ा के। इससे यह धारणा मज़बूत होती है कि यूएपीए व्यवहार में सज़ा को अंत में नहीं, बल्कि प्रक्रिया की शुरुआत में ही थोप देता है, भले ही आरोपी बाद में निर्दोष साबित हो।
यह स्थिति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 से सीधे टकराती है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। सुप्रीम कोर्ट कहता है कि आज़ादी नियम है और जेल अपवाद। लेकिन यूएपीए के प्रयोग में यह संतुलन उलटता हुआ दिखाई देता है—जहाँ जेल नियम बन जाती है और आज़ादी अपवाद। अदालतें भी अक्सर यह कहकर हिरासत को जायज़ ठहरा देती हैं कि “प्रथम दृष्ट्या मामला बनता नज़र आता है”, जबकि आँकड़े बता रहे हैं कि अंततः अदालत में वही मामले ज़्यादातर टिकते ही नहीं।
दिल्ली दंगों की जाँच प्रक्रिया भारत के न्यायिक प्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर देती है। एक तरफ़ कैमरे पर दर्ज उकसावे, जिन पर कार्रवाई ठंडी। दूसरी तरफ़ असहमति और सवाल उठाने वालों पर UAPA का शिकंजा। ऐसा लगता है जैसे क़ानून की धार बेक़सूरों पर तेज़ और असल गुनाहगारों पर कुंद हो जाती है।
जब आँकड़े खुद चीख़-चीख कर बता रहे हों कि यूएपीए ज़्यादातर निर्दोष लोगों को दंडित करने का औजार बन चुका है, तब यह पूछना बिल्कुल जायज़ है—क्या हम न्याय देख रहे हैं, या सिर्फ़ क़ानून का दुरुपयोग?
आख़िर में सवाल बहुत सीधा है—
क्या किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में क़ानून को इतना दमनकारी होना चाहिए कि वह आज़ादी को ही कुचल दे?
क्या ऐसे दमनकारी जनविरोधी कानूनों की आड़ में चलने वाली व्यवस्था को लोकतांत्रिक व्यवस्था कहा भी जा सकता है?
आज ज़रूरत इस बात की है कि यूएपीए जैसे क़ानूनों पर केवल बहस तक सीमित न रहा जाए, बल्कि उन्हें रद्द करने की माँग पुरज़ोर तरीक़े से उठाई जाए। ऐसे क़ानून, जो दोष सिद्ध होने से पहले ही नागरिकों को वर्षों तक जेल में डाल देते हों, किसी भी लोकतांत्रिक समाज में स्वीकार्य नहीं माने जा सकते।
इसीलिए यह माँग उठना जायज़ और आवश्यक है कि यूएपीए जैसी दमनकारी कानूनों को निरस्त किया जाए, या कम-से-कम उन्हें इस तरह बदला जाए कि वे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न करें और न्याय की मूल भावना के अनुरूप हों।
लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं होती।
न्याय माँगना देशद्रोह नहीं होता।
और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करना हर नागरिक का केवल अधिकार ही नहीं, बल्कि उसका कर्तव्य भी है।
जब सवाल पूछना अपराध की तरह देखा जाने लगे,
जब बिना दोष सिद्ध हुए जेल को नियति बना दिया जाए,
और जब क़ानून सत्ता के हित में सवाल उठाने वालों और विरोध की आवाज़ को दबाने का औज़ार बनता हुआ प्रतीत हो—
तो लोकतंत्र एक खोखला शब्द बनकर रह जाता है।
हर न्यायप्रिय और संवेदनशील नागरिक का यह दायित्व है कि वह यह समझे—यूएपीए जैसे क़ानून किसी एक व्यक्ति, किसी एक विचार या किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहते। आज वे जिन पर लागू हैं, कल वही क़ानून किसी और के दरवाज़े पर दस्तक दे सकते हैं। इतिहास बार-बार यह सिखाता है कि दमनकारी क़ानून अंततः समाज के हर हिस्से को प्रभावित करते हैं।
न्याय माँगना अपराध नहीं है। अभिव्यक्ति और जीने की आज़ादी की रक्षा करना देशद्रोह नहीं है।और चुप रह जाना कभी भी समाधान नहीं हो सकता।
(धर्मेन्द्र आज़ाद लेखक और कवि हैं।)