आख़िर क्यों चुप है यूपी का विपक्ष?

यूपी में 2027 का विधानसभा चुनाव में अभी लगभग एक साल का समय शेष है, लेकिन प्रदेश में विपक्ष के क्रियाकलाप देखकर यह कतई नहीं लगता कि वह आगामी चुनाव को लेकर संजीदा है। सत्ता के खिलाफ एक जिम्मेदार विपक्ष लोकतंत्र की जरूरत है लेकिन, प्रदेश में विपक्ष की गतिविधि के नाम पर कुछ खास दिखाई नहीं पड़ता है। चाहे वह किसानों की समस्याएं हों, नौजवानों के रोजगार और संवैधानिक आरक्षण में गड़बड़ी का सवाल हो, या फिर महिला सुरक्षा मुद्दा – विपक्ष कहीं दिखाई ही नहीं पड़ता है।

लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद, उत्तर प्रदेश में विपक्षी दलों ने किसी बड़े सवाल या मुद्दे को लेकर कोई लम्बा आन्दोलन नहीं किया, जिसने आदित्यनाथ सरकार को बैकफुट पर ला दिया हो।

हालाँकि, सत्तारूढ़ भाजपा इस बात से वाकिफ है कि उसे दस साल से प्रदेश की सत्ता में रहने की एक स्वाभाविक एंटी-इनकम्बेंसी से आगामी चुनाव में जूझना पड़ सकता है। इसलिए वह अपने सामाजिक-राजनैतिक जनाधार, हिंदुत्व के कोर मुद्दों को धार देने, जातिगत समीकरणों को दुरुस्त करने के साथ, पार्टी संगठन को बेहतर करने पर गंभीरता से काम कर रही है। प्रदेश में पिछड़ा समुदाय एक बड़ा वोट बैंक और भाजपा का समर्थक है, जिसे जोड़े रखने के लिए पार्टी ने कुर्मी समुदाय के पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है।

प्रदेश भाजपा के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि फ़िलहाल भाजपा में योगी आदित्यनाथ को ‘रिप्लेस’ करने की कोई योजना नहीं है और आगामी विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में यहां लड़ा जायेगा। भाजपा के साथ जो क्षेत्रीय दल यहाँ अलायंस में हैं, फ़िलहाल उनका इस गठबंधन को छोड़ने का कोई इरादा दिखाई नहीं देता है।

गौरतलब है कि प्रदेश में बसपा के पास इस समय केवल एक विधायक है। पिछले विधानसभा चुनाव के बाद, इन चार सालों में प्रदेश में बसपा की राजनीति पार्टी सुप्रीमो मायावती द्वारा योगी-मोदी सरकार के खिलाफ किन्तु-परन्तु मिश्रित प्रेस नोट जारी करने और समाजवादी पार्टी को कोसने के आलावा कुछ खास नहीं रही। पार्टी ने लखनऊ में एक बड़ी रैली कुछ समय पहले भले की, लेकिन उसकी विषयवस्तु सत्ता की जगह विपक्ष को निशाना बनाना था।

पार्टी के जनाधर में लगातार तेज गिरावट आई है और संगठन भी तेजी से सिकुड़ा है। उत्तर प्रदेश में यह आम चर्चा है कि बसपा का सियासी वजूद अब केवल इतने तक केन्द्रित है कि प्रदेश का दलित वोटर सपा-कांग्रेस गठबंधन के साथ जाने नहीं पाए। मायावती की अब प्रदेश में सियासत करने की कोई इच्छा शेष नहीं है। नगीना से सांसद चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी के पास भी फ़िलहाल ऐसा कुछ नहीं है जो योगी सरकार के खिलाफ प्रदेश में विपक्ष के बतौर एक मजबूत ध्यानाकर्षण कर पाए।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन लोकसभा चुनाव के समय से ही चल रहा है। प्रदेश कांग्रेस के दिल्ली स्थित एक बड़े नेता ने इस बात की पुष्टि की है कि पार्टी प्रदेश का आगामी विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर ही लड़ेगी।

सपा ने पीडीए की अवधारणा पर प्रदेश की पिछड़ी, अति पिछड़ी, दलित और अल्पसंख्यक जातियों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश भले की, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि योगी सरकार के बुलडोज़र न्याय, आपरेशन लंगड़ा, मुस्लिम समुदाय के खिलाफ पहचान विरोधी सत्ता समर्थित हिंसा और उग्र हिंदुत्व की राजनीति के खिलाफ पार्टी किसी ठोस राजनैतिक विरोध का साहस नहीं कर सकी।

प्रदेश के किसानों, नौजवानों के सवाल और राज्य में संवैधानिक आरक्षण के कमजोर किये जाने के खिलाफ भी समाजवादी पार्टी ने सड़क पर भाजपा को घेरने की कोई मजबूत इच्छाशक्ति नहीं दिखाई।

हालाँकि, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने भी योगी आदित्यनाथ सरकार के खिलाफ कोई बड़ा प्रदेशव्यापी आन्दोलन नहीं किया। सपा और कांग्रेस के संयुक्त प्रदर्शन तो कभी देखे ही नहीं गए। यह क्यों नहीं हो सका- इसकी एक अलग मज़बूरी कांग्रेस के नेता गिनाते हैं।

गौरतलब है कि कांग्रेस नेता राहुल गाँधी लगातार हिंदुत्व राजनीति के खिलाफ बोलते रहे हैं लेकिन, प्रदेश का आम सपा समर्थक यह मानता है कि राहुल गाँधी का हिंदुत्व के प्रति जो स्टैंड है वह सपा के किसी काम का नहीं है। सपा का आम वोटर योगी आदित्यनाथ को सत्ता से हटाकर अखिलेश यादव को बैठाना चाहता है। हिंदुत्व राजनीति के खिलाफ उसका कोई सियासी स्टैंड नहीं है।

उसे लगता है कि सपा अपने कोर जातिगत वोटर, मुलिम समुदाय के समर्थन और आठ दस परसेंट के फ्लोटिंग वोट से उत्तर प्रदेश की सत्ता में लौट सकती है। बाकी उसके लिए कोई मुद्दा नहीं है। अखिलेश का पीडीए का एजेंडा इसी के इर्दगिर्द घूमकर जातियों को जोड़ने तक सीमित है। सपा को लगता है कि इसी रास्ते से सत्ता में वापसी की जा सकती है, अन्यथा विपक्ष की हैसियत तो बरक़रार ही रहेगी।

लेकिन, कांग्रेस पार्टी अपने अखिल भारतीय कलेवर के कारण हिंदुत्व के मुद्दे को महत्वपूर्ण मानती है। योगी आदित्यनाथ इस समय देश में उग्र हिंदुत्व के एक बड़े चेहरे हैं और उत्तर प्रदेश गुजरात के बाद हिंदुत्व की तीसरी बड़ी प्रयोगशाला है। राहुल गाँधी उत्तर प्रदेश से सांसद भी हैं लेकिन, फिर भी भाजपा को इस मुद्दे पर यूपी कांग्रेस घेर नहीं पायी। आखिर ऐसा क्यों हुआ?

इस सवाल का जवाब कई कांग्रेसी नेता यह कहकर टाल देते हैं कि पार्टी अभी अपने संगठन को बूथ स्तर तक स्थापित करने और मजबूत करने में लगी है, इसलिए यह सरकार को घेरने का काम प्रदेश स्तर पर वैसा नहीं हो पाया।

लेकिन, सपा और कांग्रेस आम जनता के सवालों पर मिलकर सड़क पर क्यों नहीं आतीं?

इस सवाल के जवाब में कांग्रेस के एक नेता कहते हैं कि दोनों दलों के समर्थक अभी इस गठबंधन में सहज नहीं हैं।आम कांग्रेसी सपा समर्थक को अराजक और जातिवादी मानता है, और सपा वाले कांग्रेस समर्थकों को बोझ और ब्राह्मणवादी मानते हैं। इसलिए हम संयुक्त रूप से कोई मजबूत आन्दोलन प्रदेश में नहीं कर पाए हैं। मतलब यह कि इस अविश्वास को पाटने के लिए भी अभी दोनों दलों को बहुत मेहनत करनी है। लेकिन इसपर कोई काम ही नहीं हो रहा है.

हालाँकि, उत्तर प्रदेश में विपक्ष के इतना हताश होने की क्या वजहें हैं? आखिर विपक्ष के पास सत्ता को घेरने की इच्छाशक्ति क्यों नहीं है? इस सवाल का जवाब देते हुए दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्त्ता, जो नाम नहीं जाहिर होने देना चाहते, कहते हैं कि विपक्ष के पास हिंदुत्व की राजनीति को नकारने का कोई साहस ही नहीं बचा है। इसका प्रमुख कारण इन पार्टियों का अपने समर्थकों की कोई वैचारिक ट्रेनिंग नहीं देने की असफलता है।

वह आगे उदहारण देते हैं कि समाजवादी पार्टी को ही ले लीजिये, उसका समर्थक खुद को हिन्दू मानता है। वह नागरिक बाद में है, पहले हिन्दू है। अब जब भाजपा यहाँ हिन्दू समुदाय को उसका काल्पनिक गौरव बोध कराने का अभियान चला रही है तब इन दलों के समर्थक भी इस अभियान से भला इत्तेफाक क्यों नहीं रखेंगे? इसके बाद अखिलेश के लिए इस सियासत को नकारने का स्पेस कहाँ बचता है? जाति की चेतना वाली सियासत की हिम्मत ही नहीं होती कि वह हिंदुत्व के खिलाफ कोई मजबूत स्टैंड लेने का साहस दिखा सके। इसलिए उत्तर प्रदेश में विपक्ष के स्तर पर बड़ा ‘डेडलॉक’ है।

यही नहीं, भाजपा ने अपने समर्थकों का हिंदुत्व आइडियोलॉजी पर ब्रेन वाश किया और उनका वैचारिक समर्थन हासिल किया, हिंदुत्व के साथ जातिगत प्रतिनिधित्व के मैनेजमेंट ने भाजपा को मजबूत किया..लेकिन विपक्ष के पास जाति की चेतना, जातियों को जोड़ने के अलावा अपने समर्थकों के साथ जुड़े रहने की कोई वैचारिक ट्रेनिंग ही नहीं थी। इसका नुकसान आज उत्तर प्रदेश उठा रहा है।

जैसे भाजपा हिंदुत्व को मजबूत करने, हिन्दू गौरव बोध की वापसी के नाम पर राजनीति कर रही है, विपक्ष के पास उसे नकारने का साहस ही नहीं है। क्योंकि वह अपने समर्थकों को यह बता ही नहीं पाया कि हिंदुत्व और हिन्दू धर्म दो अलग अलग चीजें हैं। भाजपा हिंदुत्व और मुस्लिम विरोध की लाइन पर हिन्दू समुदाय की सभी जातियों को एड्रेस करने की कोशिश कर रही है, वहीँ विपक्ष के पास कोई पोलिटिकल लाइन ही नहीं है। इसलिए विपक्ष के पास हिंदुत्व के खिलाफ कोई दिशा ही नहीं बची है। इस चुप्पी को आप इसी कारण देख पा रहे हैं।

कानपुर के अब्दुल आलम, इस पर आगे जोड़ते हैं कि यूपी में आज जो पार्टियाँ जाति को जोड़ने की राजनीति कर रही हैं, वह भाजपा को कभी नहीं हरा पाएंगी।आज भाजपा के पास प्रदेश की सभी जातियों का प्रतिनिधित्व है। जाति की चेतना ऐसे कार्यकर्ता तैयार करती है जो अपनी जात का दबदबा बचाने के लिए लड़ेंगे। इसलिए विपक्ष के पास अब कोई हथियार ही नहीं बचा है क्योंकि लोकतंत्र उसका कंसर्न ही नहीं है। उत्तर प्रदेश में विपक्ष की चुप्पी इसी कारण है।

कुल मिलकर आज उत्तर प्रदेश में आक्रामक हिंदुत्व राजनीति का जो संस्करण चल रहा है, उसके खिलाफ विपक्ष की चुप्पी यह बताती है कि विपक्ष कितना असहाय हो चुका है। यदि उसका डब्बा आगामी विधानसभा चुनाव में फिर गुल हो जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। शायद यह चुप्पी इसी नतीजे की पटकथा लिख रही है। भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने नुकसान से उबरने पर काम किया है, लेकिन क्या विपक्ष अपनी इस बढ़त को बरकरार रख पायेगा? इस चुप्पी को क्या समझा जाये?

(हरे राम मिश्र का लेख। मिश्र फाफामऊ, प्रयागराज से पत्रकार हैं।)

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