बिहार विधान सभा में प्रेस सलाहकार समिति की घोषणा हुई है। लिस्ट में कुल 41 लोग हैं। अलग-अलग प्रिंट और टीवी मीडिया के लोगों को सदस्य बनाया गया। राजद की प्रवक्ता प्रियंका भारती के मुताबिक इस लिस्ट में दलित, आदिवासी पिछड़ा, अति पिछड़ा और महिला की संख्या एक भी नहीं है।
बिहार विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने प्रेस सलाहकार समिति का गठन किया है। इस समिति के सभापति स्वयं डॉ. प्रेम कुमार होंगे। विभिन्न समाचार पत्रों, टीवी चैनलों, समाचार एजेंसियों और डिजिटल मीडिया से जुड़े 15 पत्रकारों को समिति के सदस्य बनाया गया है। इसके अतिरिक्त सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के निदेशक सहित 27 पत्रकारों को समिति के विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में नामित किया गया है। प्रभारी सचिव डॉ. ख्याति सिंह ने बताया कि यह समिति कार्य संचालन नियमावली के प्रावधानों के तहत गठित की गई है।
इस विषय पर वरिष्ठ पत्रकार लिखते हैं कि बिहार विधानसभा ने एक बार फिर से सवर्ण पुरुषों वाली 43 सदस्यीय प्रेस सलाहकार समिति की घोषणा कर दी है। इस लिस्ट में आपको किसी महिला पत्रकार का नाम तो नहीं ही मिलेगा, कोई पिछड़ा, अति पिछड़ा या दलित पत्रकार शायद ही इस सूची में होगा। ऐसा नहीं है कि बिहार में अच्छी महिला पत्रकार नहीं है या दलित पिछड़ा वर्ग में अच्छे पत्रकार नहीं है। मगर लोगों का ध्यान उधर नहीं जाता।
दिलचस्प है कि यह सूची अति पिछड़ा वर्ग से आने वाले अध्यक्ष महोदय की सरपरस्ती में जारी हुई है। जिनका इस सूची में नाम है उनसे कोई असहमति नहीं है, मगर सूची तैयार करने वाले इस बारे में क्यों बिल्कुल नहीं सोचते यह बात परेशान करती है।
आरा के महेश कुमार सिंह कहते हैं कि,” यह बेहद ही शर्मनाक कदम माना जाएगा । बिहार विधान सभा के अध्यक्ष जो खुद ही अति पिछड़ा वर्ग से आते हैं। बिहार में विगत बीस वर्षों से पिछड़ा वर्ग से माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी विराजमान हैं। उसके बावजूद भी प्रेस सलाहकार समिति में एक भी दलित, पिछड़ा, अति पिछड़ा और महिला का नहीं होना आश्चर्यजनक है।”
मधेपुरा के इंजीनियर संतोष यादव लिखते हैं कि, “कभी डॉ राम मनोहर लोहिया ने कहा था भारत में एक नंबर की सरकार तो बदलते रही है लेकिन पिछले पांच हज़ार साल में दो नंबर सरकार कभी नहीं बदली है। जब तक भारत में व्यवस्था परिवर्तन नहीं होगा तब तक सारे स्थानों का सामाजिक चरित्र बहुत हद तक ऐसे ही रहेगा।”
इस लिस्ट को आने के बाद सोशल मीडिया पर खुलकर लिखा जा रहा है कि इस सरकार को एक भी बहुजन पत्रकार नहीं मिला है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इस सरकार का नारा “सबका साथ सबका विकास” क्या वाकई धरातल पर देखने को मिलता है?