तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी हो गयी है दुनिया

जिस नाटो संगठन को मजबूत करने और उसके प्रभाव को विस्तारित करने के लिए यूरोप समेत तमाम उसके घटक देशों ने रूस-यूक्रेन युद्ध का सूत्रपात किया आज खुद वही संगठन और उसके देश एक दूसरे के साथ युद्ध करने पर उतारू हैं। और नतीजा यह है कि दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर है। पहले विश्वयुद्ध के लिए अगर जर्मनी की आकांक्षाएं प्रमुख रूप से जिम्मेदार थीं। तो दूसरे के लिए फासिस्ट तानाशाह हिटलर की महत्वाकांक्षाएं। और उस युद्ध में दुनिया को क्या मिला इसके बारे में किसी को बताना नहीं है। 

खुद जर्मनी तबाह हो गया। और दुनिया पर राज करने की महत्वाकांक्षा पर सवार हिटलर को खुदकुशी करनी पड़ी। लेकिन अब जबकि दुनिया 21वीं सदी में पहुंच गयी है। और इंसान मंगल पर उतरने की तैयारी कर रहा है। तब भी हिटलर की आत्मा अपने पूरे पिछड़ेपन और उसी महत्वाकांक्षा के साथ बहुत सारे लोगों में जिंदा है। इस समय उसका सबसे बड़ा प्रतीक अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनोल्ड ट्रम्प के तौर पर सामने आया है। उसे न तो अपने अमेरिकी संविधान की चिंता है और न ही अंतरराष्ट्रीय कानूनों और नियमों की। 

उसने खुद को इन सारी चीजों से ऊपर समझ लिया है। और एक साथ इतने सारे मोर्चे खोल दिए हैं जिनसे निपटना न अमेरिका के बस में है और न ही उसके सहयोगी देशों यूरोप और इजराइल के। ट्रम्प ने वेनेजुएला पर हमला करने के बाद कोलंबिया, क्यूबा, ग्रीनलैंड से लेकर ईरान तक पर हमलों की धमकी देकर एक ऐसा पैंडोरा बॉक्स खोल दिया है जिसे समेटना किसी भी अंतरराष्ट्रीय शक्ति के लिए बेहद मुश्किल होगा। 

ताजा खबर यह है कि वेनेजुएला के बाद अब अमेरिका ग्रीन लैंड को अपने कब्जे में लेना चाहता है। और उसके लिए उसने पेंटागन को तैयार रहने का निर्देश दे दिया है। दिलचस्प बात यह है कि ग्रीनलैंड यूरोप का हिस्सा है और उस पर डेनमार्क का शासन चलता है। जो खुद एक नाटो का घटक है। जिस नाटो संगठन का सर्वप्रमुख और बुनियादी सिद्धांत यह था कि उसके किसी एक सदस्य देश के ऊपर हमला पूरे नाटो पर हमला माना जाएगा। और नाटो के सारे सदस्य देश उसका मिलकर मुकाबला करेंगे। अब उसी नाटो के देश एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए हैं और आपस में लड़ने पर उतारू हैं। 

यह लड़ाई सबसे पहले यूरोप बनाम अमेरिका होने जा रही है। जिसमें उस इंग्लैंड को जो अभी तक अमेरिका के इशारे पर काम करता था और हालिया कैरेबियन इलाके में वेनेजुएला और रूस के तेल पोतों पर कब्जे की कार्रवाई में उसका साथ दिया था, अब अमेरिका के खिलाफ खड़ा होना होगा। फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी समेत यूरोप के तमाम ताकतवर देशों को अपने ही बड़े भाई और नाटो के अगुआ अमेरिका से युद्ध करना होगा। इस बीच ग्रीन लैंड पर कब्जा करने की कोशिश करने वालों के खिलाफ डेनमार्क ने शूट एट फर्स्ट साइट का आदेश जारी कर दिया है। 

और इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस यूक्रेन को नाटो में शामिल करने और उसके लिए रूस के साथ युद्ध मोल लेने तक यूरोप गया। और अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब उसने अपने साझा सैनिक मोर्चे की यूक्रेन में तैनाती का फैसला लिया है। इसके पहले उसकी हर पहल में अमेरिका उसके साथ था। और एक तरह से यूक्रेन की तरफ से उसकी अगुआई कर रहा था। अब उन्हीं के बीच आपस में मतभेद पैदा हो गया है। अगर ग्रीन लैंड पर अमेरिका और यूरोप आमने-सामने होंगे तो क्या यूक्रेन में दोनों एक दूसरे का साथ दे सकते हैं? 

यह सबसे अहम सवाल बनने जा रहा है। और इसको लेकर अब आवाजें भी उठनी शुरू हो गयी हैं। इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने तो खुले तौर पर यूरोप को सलाह दी है कि उसे रूस से हाथ मिला लेना चाहिए। और अमेरिका बनाम यूरोप की इस जंग में रूस को अपने पक्ष में करने की पहल करनी चाहिए। वैसे भी यूरोप के तमाम देश रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध के बावजूद अपनी जरूरत की गैस को रूस से ले रहे थे।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि इतने सारे मोर्चे खोलकर क्या अमेरिका उनको बरकरार रख सकेगा? एक तरफ उसने वेनेजुएला का मोर्चा खोला है। दूसरी तरफ वह ग्रीनलैंड की तैयारी कर रहा है। तीसरी तरफ इजराइल के साथ मिलकर उसने ईरान का मोर्चा खोल दिया है। और आज की खबर के मुताबिक अमेरिकी रक्षा मंत्री रूबियो ने इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू से ईरान पर हमले की स्थिति में सफल और असफल होने की गुणा गणित लगाने के लिए कहा है। 

जिस स्तर का ईरान के भीतर विद्रोह खड़ा हो गया है उसमें अमेरिका और इजराइल अभी तक हमला कर दिए होते। लेकिन उनके रास्ते में दो चीजें आड़े आ रही हैं। पहला इस हमले को न केवल साम्राज्यावादी बल्कि जियोनिस्ट हमला माना जाएगा लिहाजा देश को इन काली ताकतों से बचाने के लिए न केवल पूरी ईरानी जनता खड़े हो जाने की संभावना है बल्कि इस्लामिक देशों को भी इजराइल के खिलाफ उतरना पड़ सकता है। जिससे पूरे इलाके के एक और इजराइल बनाम अरब युद्ध में तब्दील होने की आशंका खड़ी हो गयी है। 

दूसरा ईरान ने कहा है कि वह 24 घंटे के भीतर परमाणु बम बनाने की क्षमता रखता है। और एकबारगी अगर यह बात सच हो गयी तो फिर दुनिया तबाही के एक दूसरे मुकाम पर खड़ी हो जाएगी जिसमें न्यूक्लियर संपन्न देशों के बीच यह युद्ध कहां तक जाएगा उसका अंदाजा लगाना किसी के लिए मुश्किल हो जाएगा। 

इस बात में कोई शक नहीं कि दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ी है। लेकिन असली वजह क्या है इस तीसरे युद्ध की उसको समझना ज़रूरी है। यह कुछ और नहीं बल्कि अमेरिका द्वारा दुनिया में अपनी बादशाहत को बचाने की आखिरी कोशिश है। दरअसल पिछले तीस सालों में चीन ने जितनी तेजी से तरक्की की है उससे दो चीजें हुई हैं। एक तरफ उसने अमेरिका से उसके बाजार छीन लिए और दूसरी तरफ सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाला मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र भी अमेरिका के हाथ से जाता रहा। और ब्रिक्स के जरिये उसके घटक देशों के बीच एक दूसरे की मुद्रा में आपसी लेन-देन की सुविधा ने अंतरराष्ट्रीय करेंसी के तौर पर मौजूद डॉलर की बादशाहत को भी चुनौती दे दी है। 

अब ऐसे में अगर पैसा और पूंजी नहीं रहेगी तो फिर भला बादशाहत कैसे बचेगी? लोकतंत्र, मानवाधिकार, संप्रभुता और स्वतंत्रता के मूल्य भी उसकी भरपाई नहीं करने वाले हैं। लिहाजा उसने इन सबको अपनी पीठ से उतार फेंका है। इस कड़ी में उसने न केवल दुनिया की 66 संस्थाओं से अपने नाम वापस लिए हैं बल्कि अमेरिकी हेमिस्फीयर की रक्षा को अपने प्राथमिक क्षेत्र के तौर पर चिन्हित किया है। जिसकी घोषणा उसने अपनी हाल में जारी नई सुरक्षा रणनीति में की है। अब उसके पास अपनी ताकत दिखाने और नई ताकत हासिल करने के लिए दो ही क्षेत्र हैं। 

एक है सैन्य शक्ति और दूसरा ऊर्जा के तौर पर तेल। लिहाजा पहली ताकत का इस्तेमाल कर दूसरी ताकत को कैसे बढ़ाया जाए इस समय वह इसी रणनीति पर काम कर रहा है। और इसी के साथ उसकी यह भी कोशिश है कि उसकी बादशाहत को खुली चुनौती देने वाले चीन और रूस को इस लाभ से कैसे वंचित कर दिया जाए। लिहाजा इसके लिए सबसे पहले उसने अपनी प्राथमिकता के क्षेत्र में स्थित उस वेनेजुएला पर हमला किया है जिसके पास सबसे ज्यादा तेल भंडार है। 

उसके बाद वह उस ग्रीन लैंड पर कब्जा करने की फिराक में है जहां स्थित बंदरगाहों से नई कमाई का रास्ता खुल सकता है साथ ही मिनरल्स के रूप में मौजूद उसके संसाधनों का दोहन किया जा सकता है जो उसकी समृद्धि के नये आधार बन सकते हैं। इस कड़ी में उसका तीसरा शिकार ईरान है। जो खुद में तेल का बड़ा भंडार है। लिहाजा अमेरिका तमाम क्षेत्रों में हुए अपने घाटे को दुनिया में तेल बेचकर पूरा करना चाहता है।

लेकिन यहां एक चीज हमें समझनी चाहिए कि इतना सब कुछ करने और इच्छित लक्ष्य को हासिल करने के लिए जो युद्ध और तबाही होगी उससे उबर पाना किसी भी देश के लिए बहुत मुश्किल होगा। ट्रम्प को यह समझना चाहिए कि इस रास्ते से न तो उनकी सत्ता बचेगी और न ही दुनिया में अमेरिका की बादशाहत। खुद अमेरिका के घरेलू मोर्चे पर भी इसके संकेत मिलने शुरू हो गए हैं। 

न्यूयार्क ने ट्रम्प विरोधी ममदानी को मेयर का चुनाव जिताकर यह संकेत दे दिया है। तो दूसरे राज्य ट्रम्प प्रशासन की तानाशाही के खिलाफ खड़े होकर दे रहे हैं। उसी कड़ी में ट्रम्प की फेडरल फोर्स आईसीई के खिलाफ अलग-अलग राज्यों में प्रदर्शन यह बताता है कि आने वाले दिनों में या तो ट्रम्प के शासन के तौर पर तानाशाही रहेगी या फिर लोकतंत्र। दोनों एक साथ कतई नहीं चल सकते।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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