वेनेजुएला में अमेरिकी हमले और राष्ट्रपति तथा उनकी गिरफ्तारी से पूरी दुनिया सकते में है। इसमें सौ से अधिक सुरक्षाकर्मी मारे गए। यहां तक कि राष्ट्रपति के साथ उनकी पत्नी को भी “गिरफ्तार करके” अमेरिका ले जाया गया। यह बात सच हो सकती है कि वेनेजुएला में लोकतंत्र की सेहत अच्छी नहीं थी लेकिन यह भी उससे बड़ा सच है कि अमेरिका ने कोई लोकतंत्र की स्थापना के लिए हमला नहीं किया है।
इसके पहले सद्दाम हुसैन, कर्नल गद्दाफी जैसों को खत्म करने के बाद उन देशों के हालात इसके गवाह हैं। ड्रग तस्करी में वहां की सरकार की संलिप्तता की बात भी खोखला बहाना मात्र लगती है।इसी तरह इराक पर जब हमला किया गया तो बहाना बनाया गया कि वहां रासायनिक हथियार बनाए जा रहे हैं। जिसे बाद में खुद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया कि वह सच नहीं था। दरअसल अमेरिका की नज़र वेनेजुएला के अकूत तेल भंडार और सोना तथा रेयर मिनरल्स पर है। यह लड़ाई पुरानी है।
इस अवसर पर यह याद करना मौजूं होगा कि पूर्व राष्ट्रपति शावेज़ के नेतृत्व में वेनेजुएला ने अमेरिका को जबरदस्त चुनौती दी थी। यूएनओ में अमेरिकी राष्ट्रपति बुश के एक दिन बाद ही बोलते हुए शावेज़ ने वह चर्चित वक्तव्य दिया था कि यहां से अभी शैतान गया है मुझे उसकी गंध आ रही है।
वेनेजुएला में तेल का सबसे बड़ा भंडार है। उसके पास तेल के 303 अरब बैरल तेल है जिसकी कीमत 14 ट्रिलियन डॉलर है जो अमेरिका के तेल भंडार से कई गुना ज्यादा है। वेनेजुएला पर कब्जे के बाद अब तेल के विराट भंडार जो पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है, उस पर अमेरिका का कब्जा हो जायेगा और उसकी कमाई वह अपने पास रखेगा। ट्रंप ने स्वयं कहा है कि इससे हमारी निजी कंपनियां अच्छा बिजनेस करेंगी।
इसके अलावा स्टील, कई तरह के खनिज, कई अहम क्रिटिकल मिनरल वहां पाए जाते हैं जिन पर अमेरिका कब्जा करना चाहता है। अन्य जगहों पर पाया जाने वाला तेल हल्का होता है लेकिन वेनेजुएला का तेल गाढ़ा और भारी होता है जिसके शोधन की तकनीक अमेरिका के पास है। जाहिर है वेनेजुएला के अकूत तेल भंडार का दोहन अब अमेरिका के हाथ में है। वेनेज़ुएला के पास 5.5 ट्रिलियन क्यूबिक मीटर ज्ञात गैस का भंडार है। यह अमेरिका के 75% के बराबर है। दक्षिण अमेरिका में सबसे ज्यादा सोने का भंडार है।
वेनेज़ुएला के पास 23 अरब डॉलर कीमत का 644 मीट्रिक टन सोना है। रेयर अर्थ मेटल भी वहां बड़े पैमाने पर है। बड़े पैमाने पर बॉक्साइट लौह अयस्क और निकेल का भी वहां भंडार है। अमेरिका का कहना है कि यह सब वह वहां की सरकार को सौंप देगा लेकिन कब और कैसे इसका पता नहीं है। आधी रात में किया गया अमेरिका का यह कारनामा युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है जिसमें क्यूबा के रिवॉल्यूशनरी आर्म्ड फोर्सेज के सैनिक भी मारे गए है जो राष्ट्रपति की सुरक्षा और गृह मंत्रालय की सुरक्षा में लगाए गए थे।
अमेरिका में 40 % लोग कार्रवाई के पक्ष में हैं और 40% लोग इसके खिलाफ हैं, 20% असमंजस में हैं। 45% लोग वहां दूसरी सरकार थोपे जाने के खिलाफ हैं।। 90% इस पक्ष में हैं कि वहां की जनता को अपना भविष्य तय करना चाहिए। वैसे अमेरिकी विदेश नीति के तहत यह कोई अनहोनी बात नहीं है। अनेक डेमोक्रेट भी इसका समर्थन कर रहे हैं। यहां तक कि पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन भी ऐसे ऑपरेशन के पक्ष में थे। पूरे ऑपरेशन में अमेरिका के भी कई सैनिक घायल हुए हैं।
जाहिर है खुद अमेरिका के अंदर इसकी भारी आलोचना हो रही है। स्वयं अमेरिका के अपने संविधान के अनुसार ऐसी कार्रवाई तभी की जा सकती है जब न्याय विभाग किसी को अभियुक्त करार दे। इसलिए आम तौर पर यह माना जा रहा है कि ऐप्सटीन फाइल के विस्फोटों और अमेरिका की बिगड़ती अर्थव्यवस्था से ध्यान भटकाने के लिए यह कार्रवाई की गई है।अमेरिका की वहां कानून का राज बनाने की कार्रवाई सफेद झूठ है।
जाहिर है अब उस देश को अमेरिका अपने ढंग से चलाएगा और वह वहीं जम जा सकता है, जैसा ट्रंप ने खुद कहा है। वास्तव में यह पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए किया जा रहा है। मुनरो डॉक्ट्रिन की तरह डॉन रो डॉक्ट्रिन की बात ट्रंप खुद कर रहे हैं। वामपंथी सरकारों की जगह अपनी समर्थक सरकारें बनाने की उसने खुले आम धमकी दी है। उसने कोलंबिया क्यूबा मैक्सिको को इसी तरह की धमकी दी है।
होंडुरास जिसके ऊपर ड्रग तस्करी का का आरोप है उसको उसने धमकी दी कि अगर जनता ने उसकी समर्थक पार्टी को जो ड्रग तस्करी की जिम्मेदार मानी जाती है, नहीं जिताया तो उसे वह तबाह कर देगा।यही उसने अर्जेंटीना में किया।जहां तक वेनेजुएला से कोकीन की तस्करी का सवाल है, यूएनओ की रिपोर्ट में उसका कोई जिक्र नहीं है।स्वयं अमेरिका की रिपोर्ट में उसका एक पैरा में जिक्र है।यूरोपियन यूनियन की रिपोर्ट में इसका कहीं कोई जिक्र नहीं है।
इस पूरे मामले में भारत सरकार की भूमिका निंदनीय है। भारत सरकार इसकी निंदा तक नहीं कर सकी। उसने बस चिंता व्यक्त कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली। जबकि दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे ब्रिक्स के देशों ने भी इसकी कटु आलोचना की है और अमेरिका को वहां से हटने की मांग बुलंद की है।
यह साफ है कि यह ट्रंप सरकार की खुले आम दादागिरी है। बताया जा रहा है कि ईरान में चल रहे व्यापक जन विक्षोभ में भी घुसपैठ करने और वहां सत्ता बदलने की कोशिश में वह लगा हुआ है। दुनिया का दरोगा बन रहे अमेरिका को तमाम देशों की संप्रभुता का सम्मान करने के लिए विश्व जनमत को बाध्य करना होगा।
(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)