शहादत की 20 वीं वर्षगांठ पर :  जनसंघर्षों की क्रांतिकारी कतारों के अगुआ थे कॉमरेड महेंद्र सिंह

बढ़ते चारित्रिक, राजनीतिक व सामाजिक अवमूल्यन के बीच का. महेंद्र सिंह मूल्यों की एक ऐसी ईमानदार पहल थे, जिन्होंने समाज में चेतना का ऐसा संचार किया कि आज उनके न होने के 20 वें वर्ष में भी उनकी उपस्थिति लोगों के बीच उतनी ही मौजूद है, जितना कि वे अपनी शहादत के पहले उनके बीच में रहे।

उनके स्थापित मूल्यों के किस्से उनके राजनीतिक व वैचारिक विरोधियों के बीच भी उतनी ही चर्चित है, जितना कि उनके समर्थकों के बीच। उनके न होने की कसक जितना उनके चाहने वालों के भीतर आज भी मौजूद है, उतनी ही कसक उनके वैचारिक विरोधियों के भी भीतर है। इसकी वजह साफ है उनका ठोस चारित्रिक मूल्य, जन-सवालों पर दृढ़ता से जनता के साथ खड़ा होना एवं लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ ऐसा कोई भी समझौता नहीं करना जो जनता की हितों के खिलाफ हो।

कहना ना होगा कि जनसंघर्षों की क्रांतिकारी कतारों की जब-जब चर्चा होती है तब कॉमरेड महेंद्र प्रसाद सिंह का नाम पहली कतार में स्वतः स्फूर्त जुड़ जाता है। महेंद्र सिंह के बारे में कुछ लिखने का मतलब जनमानस एवं राजनीतिज्ञों के बीच गिरते राजनीतिक मूल्यों के प्रति यह विश्वास पैदा करना है कि जन-सवालों को लेकर जनसंघर्षों में अगर ईमानदार पहल हो तो जनता हर कदम पर आपके साथ होगी।

कॉमरेड महेंद्र सिंह क्रांतिकारी श्रृंखला के एक ऐसे साहसी योद्धा थे, जिन्होंने न्याय एवं मानवीय मूल्यों को जीवंत बनाये रखने के लिये इंकलाब का रास्ता चुना, जहां से शहादत की राह निकलती है। वे हर जनसभाओं में यह दुहराना नहीं भूलते थे कि “मैं आपके संघर्षों और आपकी हर लड़ाई में आपके साथ हूं, मैं अपने वायदे से पीछे नहीं भाग सकता”, जिसका प्रमाण उन्होंने अपनी शहादत के वक्त तक दिया।

16 जनवरी 2005 को झारखंड विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान जब उनकी हत्या करने आये आताताइयों द्वारा यह पूछे जाने पर कि महेंद्र सिंह कौन है? उन्होंने आगे बढ़कर अपना परिचय दिया, जबकि उन्हें आतताइयों के इरादों का आभास उनके हाथों में एके-47 जैसे हथियार देखकर हो चुका था। मगर उन्हें इस बात की चिंता और भय हो गया था कि कहीं पहचान के फेर में वहां उपस्थित आम जनता आतताइयों का निशाना ना बन जाए और उन्होंने शहादत की परंपरा का बखूबी निर्वहन किया।

बमोदर से लगातार तीन बार विधायक रह चुके कॉमरेड महेंद्र सिंह (अगर हत्या नहीं हुई होती तो वे आगे भी चुने जाते) के बारे यह बताने की जरूरत नहीं है कि अपने क्षेत्र से वे चुनाव नहीं लड़ते थे, बल्कि चुनाव जनता लड़ती थी। यह उनके विरोधियों को रास नहीं आया और एक साजिश के तहत उनकी हत्या कर दी गई।

उनकी जनप्रियता की इससे बड़ी और क्या मिसाल हो सकती है कि उनकी हत्या के 20 वर्ष बीतने के बाद भी उनके हर शहादत दिवस पर उतना जन सैलाब उमड़ पड़ता है जो उनकी हत्या के बाद बदहवास जनसैलाब बगोदर पहुंचा था।

22 फरवरी 1954 को गिरिडीह जिला तत्कालीन हजारीबाग जिला अंतर्गत खंभरा गांव के जगदीश सिंह व प्रमिला देवी के घर मैं जन्मे महेंद्र सिंह को बचपन से ही कुछ नया करने व कुछ पाने की बैचेनी ने उन्हें किशोरावस्था में एक साधु के पीछे लगा दिया, परिवार के लोग उन्हें ढूंढने में असफल रहे वे खुद 4-5 साल के बाद वापस घर लौटे।

70 के दशक में उनके पिता ने रोजगार के लिये उन्हें उनके मामा के पास बोकारो जिला तत्कालीन गिरीडीह जिला के जैनामोड़ भेजा। वहीं उनकी मुलाकात उनके मामा के पड़ोसी रहे हीरा सिंह से हुई। वैसे तो हीरा सिंह उम्र में महेन्द्र जी से 3-4 साल के छोटे थे बावजूद दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई। जहां मेरी भी मुलाकात उनसे हुई। मैंने पाया कि महेन्द्र जी की तार्किक क्षमता और अभिव्यक्ति का तरीका काफी सरल व सहज था जो सामने वाले को प्रभावित करता था।  

चूंकि उनके मामा क्षेत्र के दबंग व्यक्तित्व के आदमी थे अतः जैनामोड़ से गुजरने वाली बसों से बतौर एजेंटी पैसे वसुलते थे। रोजगार के नाम पर मामा ने उन्हें जैनामोड़ से गुजरने वाली बसों से एजेंटी वसूलने की जिम्मेवारी सौंप दी। जिसमें उन्हें रूचि नहीं थी, बावजूद पिता के सम्मान को देखते हुए वह उस काम को करने लगे।

जैनामोड़ चौक पर एक चर्चित होटल हुआ करता था। उसी होटल में महेंद्र जी की मुलाकात कुमार मुक्ति मोहन से हुई। कुमार मुक्ति मोहन बोकारो स्टील सिटी स्थित सेक्टर नौ में रहते थे और उनका जैनामोड़ आना जाना हुआ करता था। दरअसल कुमार मुक्ति मोहन भाकपा माले (लिबरेशन) के सदस्य थे। 

उस वक्त भाकपा माले (लिबरेशन) भूमिगत संगठन था।

मुक्ति मोहन जब भी होटल में खाते पीते रहते थे दोस्तों बीच बात करते महेंद्र जी को सुनते। इसी क्रम में महेंद्र जी से दोस्ती गांठ ली और तब शुरू हुई मार्क्सवादी विचारों का क्लास जिससे महेंद्र जी काफी प्रभावित हुए।

मार्क्सवादी साहित्य में रुचि निरंतर बढ़ने लगी, इस अध्ययन का प्रभाव भी उनके जीवन में काफी तेजी से बढ़ने लगा। अब उनका अपने मामा से ही विरोध होने लगा। कभी अपने मामा के हर गलत सही कार्यों को बेहिचक करने वाले महेंद्र सिंह उनके गलत कार्यों की आलोचना ही नहीं, उनका खुलकर विरोध भी करने लगे।

कुछ दिनों बाद महेंद्र जी अपने गांव लौट गए।

तब तक हीरा सिंह ने ठेकेदारी कर दी थी और उन्होंने महेंद्र जी को अपने काम में पार्टनर बनने की सलाह दी, जिसे महेंद्र जी ने ठुकरा दिया यह कहते हुए कि मुझे मेरी मंजिल मिल गई, मैं बगोदर जा रहा हूं।

महेंद्र जी पर मार्क्सवाद-लेनिनवाद का इतना जबरदस्त प्रभाव पड़ा कि उन्होंने आइपीएफ की सदस्यता ग्रहण कर ली क्योंकि तब तक माले के खुला संगठन आइपीएफ का गठन हो चुका था। चूंकि महेंद्र सिंह में चीजों को समझाने एवं उसे लोगों के बीच रखने की एक चमत्कारिक क्षमता थी। अतः पार्टी ने उन्हें खुले संगठन की जिम्मेवारी सौंपी वे अपने गांव बगोदर चले गये वहां वे शोषितों-पीड़ितों के पक्ष खड़े हुए तो क्षेत्र के दबंग और शोषक वर्ग उनके खिलाफ उठ खड़ा हुआ और उन्हें एक हत्या के मामले में फंसा दिया गया। 

5 फरवरी 1985 को महेंद्र प्रसाद सिंह को एक हत्या के आरोप में गिरिडीह जेल भेज दिया गया। महेंद्र सिंह लम्बे समय तक जेल में रहे। क्योंकि जिला और सत्र न्यायालय ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

मगर पटना उच्च न्यायालय ने इस टिप्पणी के साथ कि महेंद्र प्रसाद सिंह समाज के सबसे बड़े कमजोर और गरीब तबके के हित में संघर्ष करते रहे है। अतः इन्हें साजिश के तहत हत्याकांड में फंसाया गया है। बाइज्जत बरी कर दिया।

महेंद्र सिंह जेल में रहकर भी जनसंघर्षों को ऊर्जा देते रहे थे जेल को उन्होंने एक प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल किया परिणाम यह रहा कि जेल की व्यवस्था इतनी सुधर गयी कि कैदी से लेकर सिपाही तक एक दूसरे का सहयोग करने लगे। मुकदमा लड़ने या जमानत करवाने में कैदी आपस में सहयोग करने लगे। खान-पान की व्यवस्था इतनी सुधर गयी मानो घर का खाना हो। महेंद्र सिंह ने समाज के अंतिम कतार के इन लोगों में लोकतांत्रिक मूल्यों का बोध जगाते हुए मार्क्सवादी चेतना का भी विकास किया।

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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