कोर्ट के आदेश का पालन करे सरकार, अनुज चौधरी पर एफआईआर दर्ज कर भेजे जेल- शाहनवाज़ आलम

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव शाहनवाज़ आलम ने संभल पुलिसिया हिंसा की जांच हाई कोर्ट के न्यायाधीश से न्यायिक जांच के ज़रिए कराने न्यायिक प्रक्रिया को बाधित होने से बचाने के लिए संभल के तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी और एसएचओ अनुज तोमर को तत्काल निलंबित कर जेल भेजने की माँग की है।

आलम ने शुक्रवार को प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि संभल के सीजेएम कोर्ट का फैसला सरकार द्वारा संभल हिंसा की कराई गई मजिस्ट्रेट जांच पर भी सवाल खड़ा करता है कि पूरे प्रकरण में पुलिस को बचाने के लिए जांच में पुलिस को क्लीन चिट दी गई थी।

उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले में पुलिस ने प्रमुख तौर पर तीन बिंदु उठाए हैं, जो तथ्यहीन और तर्कहीन हैं।  

पहला, यह कि उपद्रव 7:45 से पहले शुरू हो गया था तो आलम वहाँ 8 बजे कैसे पहुँच गया। यह एक तकनीकी बहाना है, जिसकी आड़ में पुलिस सच्चाई को छिपाना चाहती है। 

दूसरा, पुलिस मीडिया ट्रायल के ज़रिए पीड़ित पर अपनी पहचान छिपाकर इलाज कराने का आरोप लगाकर पीड़ित द्वारा अपना इलाज कराने को भी अपराध ठहराने की कोशिश कर रही है। जबकि पीड़ित के पिता यामीन ने कोर्ट में बताया है कि जब वह अपने घायल बेटे को पड़ोसी जिलों के अस्पतालों में लेकर गए तो पुलिसिया दबाव के चलते उसे भर्ती ही नहीं किया गया। इसके बाद उसे अपनी पहचान छिपाकर मेरठ में इलाज कराना पड़ा।

यह साबित करता है कि यूपी में पुलिस हिंसा का शिकार व्यक्ति सरकारी दबाव के चलते किसी अस्पताल में इलाज भी नहीं करा सकता। यह सांप्रदायिक पुलिस और अस्पतालों के आपराधिक गठजोड़ को भी उजागर करता है। पीड़ित ने कोर्ट में यह भी बताया है कि उसने 2024 में साल दिसंबर में पुलिसकर्मियों पर आरोप दर्ज कराने की अर्जी दी थी, उसके बाद उसने 1 जनवरी 2025 को संभल एसएसपी, डीआईजी मुरादाबाद, महानिदेशक उत्तर प्रदेश पुलिस और मुख्यमंत्री को भी अर्जी दी थी लेकिन पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की।

इसके बाद फरवरी में सीओ अनुज चौधरी और एसएचओ अनुज तोमर के ख़िलाफ़ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173(4) के तहत कोर्ट का रुख किया, जो पुलिस द्वारा कार्रवाई न करने पर व्यक्ति को अदालत जाने का अधिकार देती है। 

तीसरा, पुलिस का दावा है कि आलम के शरीर से जो गोली निकली वह 7.65 एमएम यानी 32 बोर की है, जिसे पुलिस इस्तेमाल नहीं करती।

शाहनवाज़ आलम ने कहा कि पुलिस का यह दावा सही है और कांग्रेस पार्टी एवं अन्य स्वतंत्र जांच समूहों के दावों को पुष्ट करता है कि आंदोलनकारियों के ख़िलाफ़ बल प्रयोग में पुलिस ने आरएसएस से जुड़े बाहरी अराजक तत्वों का इस्तेमाल किया, जो पुलिस की वर्दी में निजी हथियारों से प्रदर्शनकारियों पर गोली चला रहे थे, ताकि किसी जांच की स्थिति में पुलिसकर्मियों को फंसने से बचाया जा सके।

उन्होंने कहा कि बिजनौर समेत अन्य जिलों में सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के दौरान आंदोलनकारियों के ख़िलाफ़ पुलिस ने यही आपराधिक और शातिर तरीका अपनाया था, जिसकी स्वीकारोक्ति ख़ुद बिजनौर के तत्कालीन एसएसपी और फ़िलहाल जाँच के दायरे में चल रहे संजीव त्यागी ने कारवां पत्रिका को दिए साक्षात्कार में की थी कि उन्होंने पुलिस कार्रवाई में “बाहरी तत्वों” का सहयोग लिया था।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि बिजनौर में मारे गए अनस की पेट से 32 एमएम की गोली निकाली गई थी, जिसे पुलिस इस्तेमाल नहीं करती। उस मामले में भी पुलिस ने कथित आपराधिक तत्वों पर अनस नाम के युवा की हत्या का आरोप लगाया था। ठीक वैसे ही संभल मामले में आलम को गोली मारने के लिए पुलिस एक शारिक साटा नामक कथित गिरोह को ज़िम्मेदार बता रही है।

शाहनवाज़ आलम ने कहा कि सांप्रदायिक पुलिस और आरएसएस के गुंडों के इस गठजोड़ को उजागर करते हुए राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने 27 जनवरी 2020 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को रिपोर्ट सौंपी थी, जिस पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव शाहनवाज़ आलम ने कहा कि सीओ अनुज चौधरी और अनुज तोमर की संपत्ति की भी जांच होनी चाहिए, क्योंकि संभल हिंसा में लोगों के नाम जोड़ने और हटाने के नाम पर अवैध वसूली की चर्चा आम जनमानस में है।

कांग्रेस के प्रदेश महासचिव अनिल यादव ने कहा है कि उत्तर प्रदेश में पुलिस की सांप्रदायिकता अब व्यक्तिगत आचरण तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह सत्ता के संरक्षण में एक संस्थागत रूप ले चुकी है। हाल ही में जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से पुलिस अधिकारी अनुज चौधरी को लेकर सवाल पूछा गया, तो उनका बयान न केवल असंवैधानिक था बल्कि स्वयं पुलिस की सांप्रदायिक मानसिकता को वैध ठहराने वाला भी था।

यादव ने कहा कि मुख्यमंत्री का यह कहना कि “वह पहलवान रहा है, तो पहलवानी की भाषा बोलेगा”—दरअसल पुलिस को कानून से ऊपर रखने और हिंसक, सांप्रदायिक भाषा को सही ठहराने का प्रयास था। पुलिस कोई अखाड़े का पहलवान या सत्ता का लठैत नहीं होती, बल्कि वह एक संवैधानिक, पेशेवर और कानून से बंधी हुई संस्था होती है, जिससे निष्पक्षता, संयम और संवैधानिक भाषा की अपेक्षा की जाती है।

उन्होंने कहा कि अनुज चौधरी पुलिस की भाषा के बजाय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ही असंवैधानिक भाषा बोल रहे थे।  

कांग्रेस नेता ने कहा कि इसी तरह की सांप्रदायिक सोच और उसके संस्थानीकरण का नतीजा है कि उत्तर प्रदेश में हिरासती मौतों के मामले देश में सबसे अधिक रहे हैं। फर्जी मुठभेड़ों में लगातार दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों को निशाना बनाया गया।

अनिल यादव ने आरोप लगाया कि योगी सरकार नहीं चाहती कि अनुज चौधरी जैसे सांप्रदायिक मानसिकता वाले अधिकारी किसी भी न्यायिक प्रक्रिया में फँसें। क्योंकि यदि ऐसे अधिकारियों पर कानूनी कार्रवाई होती है, तो उनके राजनीतिक संरक्षकों की भूमिका भी उजागर होगी और वे भी आरोपों के दायरे में आ जायेंगे. यही कारण है कि मुख्यमंत्री स्वयं ऐसे अधिकारियों को बचाने में लगे हुए हैं।

उन्होंने कहा कि जब कार्यपालिका खुले तौर पर पुलिस की असंवैधानिक भाषा और आचरण का बचाव करेगी तो न्यायिक स्वतंत्रता पर भी दबाव बनेगा। ऐसे में संभल के सीजेएम विभांशु सुधीर को तत्काल प्रभाव से विशेष सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए, ताकि उनकी स्थिति जस्टिस लोया जैसी न हो जाए।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)

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