दावोस (स्विट्जरलैंड) में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में अब तक सबसे बुरा, अतार्किक और तथ्यहीन भाषण निश्चय ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रहा! वह काफी समय से अपने बुरे, तथ्यहीन, हास्यास्पद और अहंकार भरे भाषणों के लिए जाने जा रहे हैं! दावोस में बुधवार को उन्होंने फिर ऐसा ही किया। ग्रीनलैंड को डेनमार्क से छीनने के अपने संकल्प को उन्होंने फिर दोहराया।
सिर्फ एक ही नयी बात उन्होंने कही कि ग्रीनलैंड हासिल करने के लिए वह सैन्य बल का इस्तेमाल नहीं करेंगे। लेकिन साथ में यह भी जोड़ा कि वह चाहते हैं कि ग्रीनलैंड के अमेरिकी नियंत्रण में लेने की प्रकिया पर तत्काल बातचीत शुरू हो। किसी का नाम लिये बगैर ट्रंप ने डेनमार्क और अन्य यूरोपीय देशों को धमकाते हुए कहा: ‘आपके पास विकल्प हैं: आप हमारी बात पर ‘हां’ कहिये या फिर ‘ना’ कहिये! आपकी ‘हां’ की प्रशंसा करेंगे लेकिन आपने अगर ‘ना’ की तो हम उसे याद रखेंगे!’
वेनेजुएला में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के जरिये अपह्रत कर जिस तरह न्यूयॉर्क ले जाया गया; उससे राष्ट्रपति ट्रंप के दुस्साहस में इजाफ़ा होता दिख रहा है। शायद उनको लग रहा है कि अब वह रूस और चीन को छोड़कर किसी के साथ कुछ भी कर सकने की स्थिति में आ गये हैं। लेकिन ट्रंप को वक्त जरूर बतायेगा कि उनका ऐसा सोचना कैसे और क्यों गलत था!
दावोस में अगर सबसे वाहियात और फूहड़ भाषण डोनाल्ड ट्रंप का रहा तो सबसे सधा और आज के दौर के लिए बेहद प्रासंगिक भाषण दिया कनाडा के प्रधान मंत्री मार्क कार्नी ने! कोई जरूरी नहीं कि उनके भाषण के हर विचार और हर शब्द से सभी सहमत ही हों पर निश्चय ही कार्नी ने अपने तथ्यपूर्ण और विचारोत्तेजक भाषण से सिर्फ यूरोपीय देशों के प्रतिनिधियों का ही नहीं, विकासशील देशों के नेताओं का भी मन मोह लिया। सच पूछिये तो अपने इस एक भाषण से कार्नी एक भरोसेमंद नेता और स्टेट्समैन के तौर पर उभरे हैं।
वैश्विक बिरादरी में वह एक महत्वपूर्ण नेता माने जाने लगे हैं। उनकी दावोस स्पीच को दुनिया भर में पढ़ा जा रहा है।
मार्क कार्नी ने अपने संबोधन के शुरू में ही पुराने चेकोस्लाविया के बड़े नेता वाक्लाव हावेल के लेख में दर्ज एक दिलचस्प कथा सुनाई कि किस तरह प्रोपेगेंडा और लोगों के दिमाग में राजनीतिक स्थायित्व का विचार भरकर कम्युनिस्टों ने अपने शासन को लंबे समय तक बनाये रखा।
डोनाल्ड ट्रंप का नाम लिये बगैर उन्होंने मौजूदा विश्व व्यवस्था पर अमेरिका की तरफ से मंडराते खतरे पर विस्तार से प्रकाश डाला। उनके भाषण के मूल में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के तीखे मन-मिजाज से उभरते खतरे के अनेक पहलुओं की चर्चा थी पर कहीं भी ट्रंप का नाम नहीं लिया गया।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा: ‘दुनिया अब किसी नियम-आधारित व्यवस्था में नहीं जी रही। यह एक भ्रम था, जिसे लंबे समय तक सच की तरह स्वीकार किया गया। आज की दुनिया में ताकतवर जो चाहता है कर देता है। जो कमज़ोर है वह उसे झेलने के लिए अभिशप्त सा है। यह कोई नया सत्य नहीं है। अब इसे ढकने की कोशिश भी बेकार हो चुकी है।
कनाडा जैसे मध्यम शक्ति वाले देशों के पास हथियार नहीं, लेकिन उनके पास ईमानदारी है और ईमानदारी की शुरुआत होती है ढोंग करना बंद करने से। हम वर्षों तक यह मानते रहे कि नियम सबके लिए बराबर हैं। लेकिन यह सच नहीं है। अब समय आ गया है कि दुनिया को वही कहा जाए जैसी वह है। इस दौर में जो चुप रहेंगे, वे भी अपराध में साझीदार माने जायेंगे। याद रखें जो सच बोलते हैं, वही भविष्य का रास्ता भी बनाते हैं।
कनाडा का संदेश सीधा है। घर में अपनी ताकत बढ़ाओ, आर्थिक निर्भरता कम करो, समान सोच वाले देशों के साथ खड़े हो और किसी भी महाशक्ति के डर से सच बोलना मत छोड़ो। शक्तिशाली लोगों के पास उनकी शक्ति है। हमारे पास सच है, और कभी-कभी सच ही सबसे बड़ी शक्ति होता है।’
कार्नी के भाषण से अमेरिकी योजनाकार ही नहीं, स्वयं डोनाल्ड ट्रंप भी सकते में आ गये। अपनी झेंप छुपाने के लिए वह थोड़े गुस्से में भी दिखे। उन्होंने कहना शुरू किया कि कनाडा को अपने विकास के लिए अमेरिका का आभारी होना चाहिए। लेकिन ट्रंप की बौखलाहट का किसी पर असर नहीं पड़ा। तब तक कनाडा के धैर्यवान और साहसी प्रधानमंत्री मार्क कार्नी अपने शानदार भाषण से दावोस की महफिल लूट चुके थे।
निश्चय ही कार्नी की साहसिक पहल का यूरोपीय देशों के नेताओं पर सकारात्मक असर पड़ा है। ट्रंप की धमकियों से न डरने और पूरी दुनिया में एकजुटता बनाने की चर्चा शुरू होती नज़र आ रही है। स्वीडिश उप प्रधानमंत्री को दावोस में कहते सुना गया कि इससे (कार्नी के संबोधन से) एक बात साफ हो रही है कि यूरोपीय देशों को अब पुख़्ता होकर खड़ा होना होगा।
लेकिन सिर्फ कनाडा या यूरोपीय देश के नेता ही नहीं, ज्यादातर देशों के प्रबुद्ध लोग भी अब समझ रहे हैं कि दूसरे विश्वयुद्ध, शीतयुद्ध, फिर सोवियत संघ के पतन और नये किस्म की ग्लोबलाइजेशन थियरी के बाद जो नव-साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था उभरी, उसमें अमेरिका किसी दूसरे या तीसरे ध्रुव (शक्तिकेंद्र) के लिए जगह नहीं देना चाहता। उसे रूस से ज्यादा खतरा चीन की तरफ से नजर आ रहा है।
लैटिन अमेरिकन राजनीति के कई विशेषज्ञ वेनेजुएला में निकोलस मादुरो शासन के खात्मे के अमेरिकी-अभियान के पीछे इसी पहलू को सबसे अहम् बताते हैं।
अमेरिका को ‘और ग्रेट’ या ‘ग्रेटेस्ट’ बनाने के आह्वान के पीछे यही रणनीति है कि चीन जहां आज है; उससे और आगे न बढे! क्या यूरोपीय देश और कनाडा इस बड़ी तस्वीर को भी देख पा रहे हैं? क्या वे इस उभरते जटिल वैश्विक समीकरण में अपनी भूमिका को पुनर्निधारित करने को तैयार हैं? क्या चीन भी कनाडा की तरह साहस और खुलापन दिखाने को तैयार है? यूरोप और उसके अन्य विकासशील देशों के साथ बढ़ते व्यापारिक रिश्तों को लेकर क्या वह लचीलापन दिखाने को तैयार है?
फिलवक्त कुछ अच्छे संकेत जरूर हैं। अभी यूरोपीय यूनियन ने भारत के साथ बड़ा व्यापार समझौता करने का फैसला किया है। इसके लिए यूरोपीय संघ की विदेश मामलों और सुरक्षा नीति की उच्च प्रतिनिधि काजा कल्लास के साथ एक बडा डेलिगेशन भारत आ रहा है। भारत, रूस, ब्राजील और चीन सहित ब्रिक्स के सभी प्रमुख देशों के साथ कनाडा और यूरोपीय देशों को भविष्य के बड़े व्यापारिक समझौतों के लिए तैयार होना होगा।
दरकती हुई अमेरिकी वर्चस्व वाली मौजूदा विश्व-व्यवस्था की जगह अपेक्षाकृत न्यायपूर्ण और पहले से ज्यादा सुसंगत विश्व व्यवस्था की पुनर्रचना की जमीन तभी तैयार होगी।
(उर्मिलेश लेखक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)