वर्ष 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से देश के तमाम विश्वविद्यालयों पर भगवाकरण की स्पष्ट झलक दिख रही है। कैंपसों में शैक्षणिक माहौल में गिरावट, लोकतांत्रिक स्पेस में कमी, नियुक्तियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के करीबियों की भर्ती और स्पष्ट तौर पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को अपने हर तरह की गतिविधियों के लिए खुली छूट दी गई है।
Academic Freedom Index (एएफआई) 2025 के अनुसार अकादमिक स्वतंत्रता के मामले में भारत 179 देशों में 156 पायदान पर है। पिछले वर्ष की तुलना में भारत अपने प्रदर्शन में और खराब रहा है।
इसका कारण यह नज़र आता है कि भारत के कैंपसों में सरकार की नीतियों की खिलाफत करना एक आपराधिक कृत्य बना दिया गया जिसकी कीमत सैकड़ों स्टूडेंट लीडर चुका रहे हैं। कहीं घोषित रूप से तो कहीं अघोषित तरीके से किसी भी प्रकार की राजनैतिक गतिविधि को प्रतिबंधित किया गया है।

हाल ही में इसी तरह का मामला उत्तर प्रदेश के लखनऊ विश्वविद्यालय में आया है। यह प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय 100 सालों का इतिहास समेटे हुए है। लेकिन 17 जनवरी के नोटिस के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन अब संघ-भाजपा के गठजोड़ के आगे नतमस्तक होता दिख रहा है।
नोटिस की पृष्ठभूमि इस रूप में है कि दिनांक 17 जनवरी को विश्वविद्यालय के एक छात्र संगठन बापसा की तरफ से रोहित वेमुला को याद करते हुए एक मार्च का आयोजन किया गया था। उक्त मार्च के शुरू होने के पहले ही तयशुदा स्थान पर भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती कर दी गई। मार्च में शामिल स्टूडेंट्स का कहना था कि मार्च के शुरू होने के पहले ही वहां अभाविप से संबंध रखने वाले छात्रों का भी जमावड़ा शुरू हो गया।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मार्च शुरू होते ही पुलिस अधिकारियों और अभाविप से जुड़े छात्रों के बीच कुछ बातचीत हुई, उसके बाद वह लोग भारत माता की जय और जय श्री राम के नारे के अलावा अन्य धार्मिक और हिंसात्मक नारे लगाने लगे और मार्च पर भद्दी-भद्दी गालियों के साथ मारपीट शुरू कर दी।
ध्यान देने की बात है कि यह नारा एक विशुद्ध राजनैतिक नारा है अल्पसंख्यकों, दलितों, कश्मीरी मुसलमानों पर दक्षिणपंथी भीड़ द्वारा किए जाने वाले हमले के दौरान इसका इस्तेमाल किया जाता है।
हमले में अपने बचाव के लिए बापसा से जुड़े लोगों ने भी हाथापाई की। जिसके बाद पुलिस ने जबरन घसीट कर मार्च के आयोजकों को डिटेन कर लिया।
सोशल मीडिया में शेयर होते वीडियो में विश्वविद्यालय प्रशासन हमले के आरोपियों पर कार्रवाई करने की जगह उनको बेहद प्रेमपूर्वक तरीके से शांत कराते हुए दिख रहे है। प्रशासन और पुलिस के रवैए से अभाविप और उनके बीच साठ-गांठ से इंकार नहीं किया जा सकता।
दिलचस्प बात है यह कि मार्च के आयोजकों और पीड़ित छात्रों को ही कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है और 3 दिन के अंदर जवाब न दे पाने पर निलंबन की बात कही गई है।
उसी दिन प्रशासन ने नए नोटिस जारी करते हुए अग्रिम आदेश तक कैंपस में सभी तरह के धरना-प्रदर्शन विरोध, दीवारों पर लिखावट करना या पोस्टर लगाना, स्टूडेंट्स के अलावा अलावा बाहरी व्यक्तियों का आवागमन बैन कर दिया है। इसके साथ ही हॉस्टल में रहने वाले छात्रों को किसी भी धरना में शामिल होने के पहले प्रशासन से अनुमति लेनी होगी।
इन नोटिस से स्टूडेंट्स के बीच एक साफ रोष देखने को मिल रहा है। समाजवादी छात्र सभा के छात्र नेता तौकील का मानना है कि “विगत दिन हुए रोहित वेमुला जी की श्रद्धांजलि समारोह को विश्वविद्यालय प्रशासन एवं पुलिस प्रशासन द्वारा एबीवीपी के साथ मिलकर रोकना संविधान विरोधी सोच को उजागर करता है। उसके तुरंत बाद लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलानुशासक द्वारा जारी किया गया नोटिस जिसमें उन्होंने केंद्रित किया है कि विश्वविद्यालय परिसर के अंदर धरना-प्रदर्शन प्रतिबंधित है। संविधान के अनुच्छेद 19 में हमें स्वतंत्र रूप से अपनी बात रखने का हक एवं अधिकार दिया गया है। यह पूर्ण रूप से संविधान पर हमला है और मनुवादी सोच को उजागर करता है।” तौकील हिंदी परास्नातक के छात्र हैं।
स्टूडेंट्स का कहना है कि विश्वविद्यालय कैंपस के अंदर एक तरफ तो प्रगतिशील, अंबेडकरवादी और वामपंथी राजनीति को पुलिस, FIR, नोटिस के माध्यम से बंद करवाने की भरसक कोशिश कर रही है वहीं विश्व हिंदू परिषद द्वारा ‘हिंदुत्व की शाश्वत प्रासंगिकता जैसे दक्षिणपंथी और फासीवादी विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन करवाए जा रहे हैं।
इस सम्मेलन में लखनऊ स्थिति बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी (बीबीएयू) के कुलपति आर के मित्तल भी मौजूद थे जिन पर अभाविप को कैंपस में संरक्षण देने के आरोप लगते रहे हैं।
शोध छात्र गंगासागर भगत सिंह स्टूडेंट्स मोर्चा संगठन से जुड़े हैं, वे कहते हैं कि” कैंपस में एक तरफ जहां स्टूडेंट संगठनों को कार्यक्रम करने के लिए हॉल नहीं दिया जाता, पोस्टर तक चिपकाने पर गार्ड्स उसे फाड़ देते हैं वहीं आरएसएस ने इसी कैंपस में अपने 100 वर्ष पूरे होने पर टेंट लगाकर भव्य प्रोग्राम के बाद ‘पथ संचलन’ किया। यूनिवर्सिटी प्रशासन स्पष्ट रूप से आरएसएस को बढ़ावा दे रहा और अन्य संगठनों को डरा-धमका कर रोक रहा। इनके छात्र संगठन अभाविप ने भी 17 जनवरी को अराजकता फैलाने के उद्देश्य से ही शांतिपूर्ण मार्च पर हमला किया, जातिगत और महिला विरोधी गालियां दीं और रोहित वेमुला को आतंकवादी कहा।”
सवाल बनता है कि क्या यूनिवर्सिटी प्रशासन रोहित वेमुला को आंतकवादी कहने और शांतिपूर्ण मार्च का हमला करने वाले पर करवाई करेगा? या फिर संघ को संरक्षण देने के लिए स्टूडेंट्स के अकादमिक भविष्य को भी ताक पर रख देगा।
(लखनऊ से आकांक्षा आजाद की रिपोर्ट।)