जिस तरह कॉमेडियन कुणाल कामरा ने कटाक्ष करते हुए कहा था कि यदि न्याय की जगह जातीय वर्चस्व दिखे तो उसे न्यायालय नहीं कहा जा सकता है बल्कि “ब्राह्मण, बनिया आर्बिट्रेशन सेंटर” कहा जाना अधिक प्रासंगिक व उचित है, उसी तरह देश के अनेक उच्च शिक्षा संस्थान ज्ञान के लोकतांत्रिक केंद्र कम और ब्राह्मण-बनिया गुरुकुल केंद्र कहना ज्यादा उचित होगा। जहाँ प्रवेश, नियुक्ति, प्रमोशन, शिकायत निवारण तक में वही सामाजिक वर्ग निर्णायक भूमिका में हो, वहाँ समान अवसर का दावा खोखला लगने लगता है।
यह आरोप भावनात्मक नहीं, तथ्यात्मक व संरचनात्मक है—क्योंकि जब सदियों से वंचित समुदायों और महिलाओं को बराबरी से बोलने, पढ़ाने और निर्णय लेने का अवसर ही न मिले, तो विश्वविद्यालय ज्ञान के मुक्त स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक पदानुक्रम को पुनःउत्पादित करने वाले केंद्र बन जाते हैं। यही वह यथार्थ है जिसे आज शालीन शब्दों में छिपाने की नहीं, ईमानदारी से स्वीकार करने की ज़रूरत है।
1956 में यूजीसी अधिनियम बना था, इस विश्वास के साथ कि उच्च शिक्षा समानता, अवसर और गरिमा का माध्यम बनेगी। लेकिन उसी क्षण से एक विरोधाभास भी जन्म ले चुका था। विश्वविद्यालयों की इमारतें तो आधुनिक थीं, पर उनकी आत्मा सामाजिक रूप से समान नहीं थी। नियुक्तियाँ, चयन समितियाँ, अकादमिक प्रतिष्ठा और निर्णय की शक्ति—सब धीरे-धीरे एक सीमित सामाजिक वर्ग के हाथों में सिमटती चली गईं।
अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए संविधान में आरक्षण होते हुए भी उच्च शिक्षा में उसका वास्तविक प्रवेश बहुत देर से हुआ। अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) आरक्षण तो 1990 के दशक के बाद जाकर विश्वविद्यालयों तक पहुँचा। यानी पहले संस्थान बने, फिर सत्ता जमी, और उसके बहुत बाद सामाजिक न्याय को भीतर आने दिया गया।
आज जब कहा जाता है कि “आरक्षण बहुत हो गया”, तो यह कथन तथ्यों से नहीं, विशेषाधिकार की स्मृति से आता है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आईआईटी, आईआईएम और राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में आज भी प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर जैसे पदों पर एससी/एसटी का प्रतिनिधित्व अत्यंत सीमित है। ओबीसी का प्रतिनिधित्व भी ऊपर जाते-जाते घटता चला जाता है। यह दशकों से चली आ रही असमानता है, जिसे कभी समस्या नहीं माना गया। यह व्यवस्था जब तक वर्चस्व के पक्ष में थी, तब तक इसे “नॉर्मल” कहा गया।
महिलाओं की स्थिति भी इसी क्रम में समझी जानी चाहिए। छात्राओं की संख्या बढ़ी, लेकिन नेतृत्व, फैकल्टी और प्रशासनिक पदों पर महिलाएँ आज भी अपवाद हैं। उत्पीड़न, अपमान और सत्ता के दुरुपयोग की घटनाएँ होती रहीं, पर चुप्पी को ही अनुशासन कहा गया। इसी चुप्पी को तोड़ने के लिए घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005; कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न अधिनियम, 2013; दहेज निषेध कानून और आईपीसी की संबंधित धाराएँ बनीं। हर बार कहा गया—दुरुपयोग होगा।
लेकिन इतिहास ने बार-बार यह दिखाया कि असली समस्या झूठी शिकायतें नहीं, बल्कि शिकायत करने का साहस था।
विश्वविद्यालयों में यह साहस इसलिए भी कमजोर रहा क्योंकि शिकायत समितियाँ अक्सर उसी सामाजिक संरचना से बनी होती थीं, जिसके विरुद्ध शिकायत की जाती थी। एससी/एसटी मामलों में सवर्ण-बहुल समितियाँ और महिला समितियों में पुरुष वर्चस्व कोई अपवाद नहीं, बल्कि लंबे समय तक चला नियम रहा है। यूजीसी की वर्तमान गाइडलाइन इसी असंतुलन को स्वीकार करती है और शिकायत की प्रक्रिया को थोड़ा अधिक स्पष्ट और भरोसेमंद बनाने की कोशिश करती है।
यह कोई उग्र कदम नहीं है, बल्कि बहुत देर से उठाया गया न्यूनतम सुधार है।
इसके बावजूद विरोध की भाषा देखी जाए तो वह संयमित आलोचना नहीं, बल्कि भय का निर्माण है। “ऑटोनॉमी खतरे में है”, “झूठे केसों की बाढ़ आ जाएगी”, “शिक्षा का वातावरण बिगड़ जाएगा”—ये वाक्य तथ्य नहीं, आशंकाएँ हैं। यह वही ऑटोनॉमी है, जिसके नाम पर वर्षों तक आरक्षण टाला गया, पद खाली रखे गए और शिकायतों को दबाया गया। तब यह ऑटोनॉमी किसी को खतरनाक नहीं लगी।
“छात्र आंदोलन” का उल्लेख भी इसी डर का विस्तार है। छात्र को एक अमूर्त, सर्वसम्मत समूह की तरह पेश किया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि हाशिए के समुदायों से आने वाले छात्र इस गाइडलाइन को सुरक्षा के रूप में देखते हैं। सबसे तेज़ विरोध उन्हीं तबकों से आता है, जिन्हें अब तक व्यवस्था ने बिना सवाल के संरक्षण दिया। यह डर किसी अव्यवस्था का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है।
मीडिया और डिजिटल मंचों ने इस डर को और चमकाया है। दस्तावेज़ों और आँकड़ों की जगह भावनात्मक निष्कर्षों ने ले ली है। यह कोई संयोग नहीं है। जब-जब समानता की दिशा में कोई कदम उठता है, तब-तब उसे अराजकता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
शांत मन से देखें तो तस्वीर बहुत साफ़ है। यूजीसी की यह गाइडलाइन किसी के अधिकार छीनने की योजना नहीं है। यह उस असमानता की स्वीकारोक्ति है, जिसे लंबे समय तक अदृश्य बनाए रखा गया। इसका विरोध करने का अधिकार सबको है, लेकिन यह भी स्वीकार करना होगा कि यह विरोध ज़्यादातर उस असहजता से पैदा हो रहा है, जो विशेषाधिकार के टूटने पर महसूस होती है।
अंततः प्रश्न बहुत सीधा है—क्या विश्वविद्यालय केवल परंपरागत वर्चस्व को सुरक्षित रखने की जगह हैं या वे उस संवैधानिक वादे की ओर बढ़ेंगे जो समान अवसर और गरिमा की बात करता है। यूजीसी की यह गाइडलाइन उसी वादे की दिशा में एक छोटा, संयमित लेकिन आत्मसम्मान से भरा कदम है। इसे इसी गरिमा के साथ पढ़ा और समझा जाना चाहिए।
(महा प्रसाद अधिवक्ता हैं और लॉयर्स कलेक्टिव फॉर पीपल्स राइट्स (एलसीपीआर) के संयोजक हैं।)