चुप होती असहमति और बोलता एल्गोरिदम : क्या एआई वैश्विक असमानताओं को बढ़ा रहा है?

कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) को अक्सर तटस्थ टूल की तरह देखा जाता है। कहा जाता है कि मशीन न जाति जानती है, न देश, न अमीर-गरीब। लेकिन यह धारणा तब टूटती नजर आती है जब हम यह सवाल पूछना शुरू करते हैं कि मशीन आखिर सीखती किससे है।

बुद्धिमत्ता की कोई भी प्रणाली खाली जगह में पैदा नहीं होती। वह उसी समाज से सामग्री उठाती है, उसी भाषा में सोचती है, और उन्हीं अनुभवों को सामान्य मान लेती है जिन्हें इतिहास ने बार-बार लिखा है। इसलिए जब कोई तकनीक वैश्विक स्तर पर काम करती है, तो वह अनजाने में उस दुनिया की असमानताओं को अपने भीतर समेट लेती है जो पहले से असमान है।

हालिया शोध यही संकेत देते हैं कि जब लोग अलग-अलग देशों, समाजों या समूहों की तुलना पूछते हैं, तो उत्तर अक्सर उन्हीं जगहों के पक्ष में झुक जाते हैं जहाँ पहले से ज्यादा धन, ज्यादा संस्थान, ज्यादा लेखन और ज्यादा डिजिटल उपस्थिति है। यह झुकाव उस ज्ञान-व्यवस्था का परिणाम है जो सदियों से कुछ क्षेत्रों को ‘मानक’ और बाकी को ‘अपवाद’ मानती आई है।

हम आमतौर पर उत्पादन को फैक्ट्री, खेत या दफ्तर से जोड़ते हैं। लेकिन ज्ञान भी पैदा किया जाता है। किताबें, शोध, रिपोर्ट, वेबसाइटें, आंकड़े – ये सब किसी न किसी सामाजिक व्यवस्था के भीतर जन्म लेते हैं। जहाँ संसाधन अधिक होते हैं, वहाँ ज्ञान का उत्पादन भी अधिक होता है। जहाँ भाषा को वैश्विक मान्यता मिलती है, वहाँ उस भाषा में लिखी बातें ‘सार्वभौमिक सत्य’ बन जाती हैं।

इसके उलट, जिन समाजों की भाषाएँ, अनुभव और संघर्ष डिजिटल दुनिया में कम दर्ज हैं, वे धीरे-धीरे अदृश्य होते जाते हैं। जब कोई एआई प्रणाली इसी असंतुलित ज्ञान से सीखती है, तो वह उसी को ‘सामान्य’ और ‘उत्कृष्ट’ मानने लगती है। नतीजा यह होता है कि समृद्ध क्षेत्र अपने-आप बेहतर दिखने लगते हैं और हाशिये के समाज लगातार कमतर।

हाल ही में ऑक्सफोर्ड इंटरनेट इंस्टीट्यूट और यूनिवर्सिटी ऑफ केंटकी के शोधकर्ताओं ने पाया है कि चैटबोट जैसे बड़े भाषा मॉडल, विशेष रूप से चैटजीपीटी, प्रचलित सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को न सिर्फ प्रतिबिंबित करते हैं बल्कि उन्हें और अधिक गहरा करते हैं। यह प्रभाव सतही तकनीकी त्रुटि नहीं है, बल्कि संरचनात्मक असमानताओं के कारण सामने आता है, जो डेटा, भाषा, और ज्ञान के उत्पादन के ऐतिहासिक असंतुलन से उत्पन्न होते हैं।

शोध में 20 मिलियन से अधिक प्रश्नों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ कि जब उपयोगकर्ता चैटजीपीटी से तुलना-आधारित प्रश्न पूछते हैं — जैसे ‘कहाँ लोग ज्यादा बुद्धिमान हैं?’ या ‘किस देश में लोग अधिक सुरक्षित हैं?’ — तो मॉडल अक्सर उच्च-आय वाले, पश्चिमी देशों और बेहतर डिजिटल दृश्यता वाले क्षेत्रों को बहुत ऊपर रैंक करता है। वहीं अधिकांश अफ्रीका, मध्य पूर्व और कई दक्षिण एशियाई हिस्सों के लिए नकारात्मक या निम्न रैंकिंग आती है।

यह रुझान लंबे समय से मौजूद वैश्विक जानकारी के प्रवाह, डेटा गठन और ज्ञान की शक्ति संरचना को उजागर करता है। 

बड़ी भाषा प्रणालियाँ, जैसे चैटजीपीटी, इंटरनेट पर उपलब्ध विशाल मात्रा में लिखित सामग्री से सीखती हैं। लेकिन यह ध्यान देना जरूरी है कि यह डेटा असमान रूप से वितरित है। अंग्रेजी और कुछ प्रमुख पश्चिमी भाषाओं की सामग्री इंटरनेट पर बरसों से अधिक प्रचलित है; निम्न-आय वाले देशों और भाषाओं के लिए डेटा बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है या डेटा में उनका प्रतिनिधित्व बुरे तरीके से मौजूद होता है।

ज्ञान उत्पादन के इतिहास में उपनिवेशवादी दृष्टिकोण और वैश्विक उत्तर तथा दक्षिण के बीच असंतुलन ने यह सुनिश्चित किया है कि कुछ स्थानों की आवाज़ दूसरों की तुलना में कहीं अधिक व्यापक रूप से रिकॉर्ड और संदर्भित हो। यह ‘डेटा असमानता’ एलएलएम की सूचना प्रवाह की दिशा को भी पूर्वनिर्धारित कर देती है। परिणामस्वरूप, मॉडल इन असमानताओं को सीखते हैं और अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें पुन: पेश करते हैं।

ऐसा नहीं है कि मॉडल किसी बुराई की वजह से ऐसा कर रहे हैं; बल्कि यह प्रणालीगत असंतुलन की प्रतिध्वनि है, जो मशीन सीखने के हर चरण में और भी गहरा होता जाता है। 

यह शोध एक गंभीर सैद्धांतिक बिंदु भी उजागर करता है: तकनीक स्वयं में तटस्थ नहीं होती। अगर डेटा में असमानता है, और अगर वह डेटा उन समूहों और स्थानों की आवाज़ का प्रतिनिधित्व नहीं करता, तो तकनीक भी समान रूप से महत्वपूर्ण सामाजिक विभाजनों को पुनर्व्यवस्थित करेगी। इसे हम ‘सामाजिक संरचनाओं का तकनीकी प्रतिबिंब’ कह सकते हैं।

तकनीक अक्सर खुद को निष्पक्ष बताती है। लेकिन निष्पक्षता तभी संभव है जब शुरुआती स्थितियाँ बराबर हों। अगर शुरुआत ही असमान है, तो परिणाम भी असमान होंगे। यहाँ समस्या मशीन की नीयत की नहीं है। समस्या उस व्यवस्था की है जिसमें कुछ देशों के अनुभव लगातार दर्ज किए जाते हैं; कुछ समाजों को अध्ययन का विषय बनाया जाता है, लेकिन खुद उन्हें बोलने का अवसर नहीं मिलता; कुछ भाषाएँ ज्ञान की भाषा मानी जाती हैं, बाकी को ‘स्थानीय’ कहकर अलग रख दिया जाता है।

ऐसी स्थिति में एआई का जवाब देना दरअसल पुराने फैसलों को दोहराना है, नए बनाना नहीं।

पहले शक्ति जमीन, कारखाने और हथियारों से पहचानी जाती थी। आज शक्ति डेटा, दृश्यता और एल्गोरिदम में भी छिपी है। जिसके पास ज्यादा डेटा है, वह ज्यादा ‘दिखता’ है। जो ज्यादा दिखता है, वही ज्यादा ‘सामान्य’ माना जाता है। और जो सामान्य माना जाता है, वही भविष्य के फैसलों को दिशा देता है। इस चक्र में जो पहले से पीछे है, वह और पीछे चला जाता है।

तकनीक इस प्रक्रिया को तेज कर देती है, क्योंकि उसके फैसले बहुत जल्दी, बहुत बड़े पैमाने पर और बिना सवाल के स्वीकार कर लिए जाते हैं। असल सवाल तकनीक का नहीं, व्यवस्था का है। इसलिए सवाल यह नहीं है कि एआई सही है या गलत। असली सवाल यह है कि ज्ञान कौन पैदा कर रहा है, किसकी भाषा में दुनिया को समझा जा रहा है, और किन अनुभवों को ‘डेटा’ बनने का मौका ही नहीं मिलता। अगर इन सवालों को छुए बिना सिर्फ मॉडल सुधारने की बात की जाए, तो हम सिर्फ सतह बदल रहे होंगे, ढांचा नहीं।

लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। वह रोज़मर्रा की बातचीत, असहमति, सवाल पूछने की क्षमता और निर्णय प्रक्रिया में हिस्सेदारी से बनता है। भारत जैसे समाज में, जहाँ पहले से ही सूचना, शिक्षा और सत्ता तक पहुँच असमान है, वहाँ कृत्रिम बुद्धि का प्रवेश लोकतांत्रिक संतुलन को प्रभावित करने वाला हस्तक्षेप है।

जब निर्णय लेने की प्रक्रिया में मनुष्य की जगह धीरे-धीरे एल्गोरिदम लेने लगते हैं, तो सवाल यह नहीं रह जाता कि फैसले तेज़ हैं या सुविधाजनक, बल्कि यह हो जाता है कि वे किसके अनुभव और किसके हित को प्राथमिकता दे रहे हैं।

कृत्रिम बुद्धि का मूल स्वभाव संकलन का है। वह पिछले डेटा को जमा करती है, उसमें पैटर्न खोजती है और उसी आधार पर भविष्य का अनुमान लगाती है। लेकिन लोकतंत्र भविष्य को सिर्फ अतीत से नहीं बनाता। वह असंतोष, विद्रोह, नए सवाल और अचानक उभरने वाली आवाज़ों से भी बनता है।

भारत में कई सामाजिक परिवर्तन ऐसे हुए हैं जो कभी डेटा में नहीं थे, कभी ‘सामान्य प्रवृत्ति’ नहीं माने गए थे। अगर आज निर्णय प्रणाली उन एल्गोरिदम पर आधारित होगी जो सिर्फ पहले से दर्ज अनुभवों को मान्यता देते हैं, तो लोकतंत्र का वह हिस्सा कमजोर पड़ जाएगा जो बदलाव को जन्म देता है।

एक बड़ा खतरा यह भी है कि एआई आधारित प्रणालियाँ धीरे-धीरे ‘विशेषज्ञता’ का नया स्रोत बनती जा रही हैं। जब किसी नीति, योजना या प्रशासनिक फैसले के पीछे यह तर्क दिया जाता है कि ‘डेटा यही कहता है’ या ‘सिस्टम ने यही सुझाया’, तो असहमति को गैर-तर्कसंगत मान लिया जाता है।

भारत जैसे देश में, जहाँ आम नागरिक पहले ही सत्ता से दूरी महसूस करता है, यह स्थिति और गहरी खाई बना सकती है। जनता सवाल पूछना बंद नहीं करती, लेकिन उसके सवालों को तकनीकी जटिलता के नाम पर किनारे किया जाने लगता है।

लोकतंत्र की एक बुनियादी शर्त यह है कि नागरिक यह समझ सके कि निर्णय कैसे लिए जा रहे हैं। लेकिन एआई प्रणालियाँ अक्सर अपारदर्शी होती हैं। उनके भीतर क्या तर्क काम कर रहा है, किस आधार पर किसी क्षेत्र को जोखिम वाला या किसी समूह को लाभार्थी माना गया, यह आम नागरिक की समझ से बाहर होता है। जब निर्णय समझ से बाहर हो जाते हैं, तो जवाबदेही भी धुंधली हो जाती है। भारत में पहले ही प्रशासनिक जवाबदेही चुनौती है। एआई के साथ यह चुनौती और जटिल हो सकती है।

सूचना का सवाल यहाँ बेहद अहम है। लोकतंत्र में मतदाता जानकारी के आधार पर राय बनाता है। एआई आधारित सूचना प्रणालियाँ, चाहे वे सर्च हों, सोशल मीडिया हों या समाचार अनुशंसा प्रणाली, धीरे-धीरे यह तय करने लगती हैं कि नागरिक क्या देखेगा और क्या नहीं। भारत में जहाँ समाज पहले से विचारधारात्मक और सामाजिक खाँचों में बँटा हुआ है, वहाँ यह तकनीक अलग-अलग समूहों को अलग-अलग सच दिखाने लगती है। परिणाम यह होता है कि साझा सार्वजनिक संवाद सिकुड़ता चला जाता है।

एक और गंभीर पहलू यह है कि भारत के बड़े हिस्से का जीवन अभी भी अनौपचारिक है। मजदूर, किसान, घरेलू कामगार, छोटे व्यापारी – इनकी समस्याएँ अक्सर डेटा में सही तरह दर्ज नहीं होतीं। अगर नीति निर्माण एआई आधारित विश्लेषण पर निर्भर होगा, तो वह उन्हीं वर्गों को बेहतर समझेगा जो पहले से आंकड़ों में मौजूद हैं। इससे लोकतंत्र का वह वादा कमजोर होता है जिसमें सबसे कमजोर की आवाज़ सबसे ज्यादा सुनी जानी चाहिए।

यह भी ध्यान देने की बात है कि तकनीक खुद किसी सार्वजनिक बहस से नहीं निकलती। उसका विकास अक्सर उन्हीं संस्थानों और शक्तियों के भीतर होता है जिनके पास पूँजी, विशेषज्ञता और वैश्विक संपर्क हैं। भारत में अगर एआई को बिना सामाजिक हस्तक्षेप के अपनाया गया, तो लोकतंत्र का स्वरूप धीरे-धीरे प्रतिनिधित्व से हटकर प्रबंधन की ओर खिसक सकता है, जहाँ नागरिक ‘भागीदार’ नहीं बल्कि ‘डेटा पॉइंट’ बनकर रह जाएँगे।

इसका अर्थ यह नहीं है कि कृत्रिम बुद्धि लोकतंत्र के खिलाफ है। असली प्रश्न यह है कि उसे किस दिशा में लगाया जा रहा है। अगर एआई का उपयोग नागरिकों को समझाने, सुनने और शामिल करने के लिए किया जाए, अगर उसे स्थानीय भाषाओं, स्थानीय समस्याओं और स्थानीय अनुभवों से सीखने दिया जाए, तो वह लोकतंत्र को मजबूत भी कर सकती है। लेकिन इसके लिए यह मानना पड़ेगा कि तकनीक अपने आप लोकतांत्रिक नहीं होती; उसे लोकतांत्रिक बनाया जाता है।

भारत जैसे देशों के लिए चुनौती यही है। यहाँ लोकतंत्र सिर्फ संस्थागत ढाँचा नहीं है, बल्कि संघर्षों से बना जीवित अनुभव है। अगर कृत्रिम बुद्धि इस अनुभव को संकुचित करती है, तो वह सुविधा के बदले स्वतंत्रता का सौदा होगी। और अगर वह इसे विस्तार देती है, तो वह तकनीक से आगे बढ़कर सामाजिक टूल बन सकती है। अंततः सवाल यह नहीं है कि एआई कितनी बुद्धिमान है। सवाल यह है कि क्या हम इतने सजग हैं कि उसे अपने लोकतंत्र से बड़ा न होने दें।

(मनोज अभिज्ञान सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं।)

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