नई दिल्ली। UGC इक्विटी गाइडलाइन को रोके जाने के बाद ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) ने जंतर-मंतर, नई दिल्ली पर एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया। इस प्रदर्शन में इक्विटी गाइडलाइन और रोहित वेमुला एक्ट को तुरंत लागू करने की मांग की गई। प्रदर्शन में कई वक्ताओं ने भाग लिया और उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव का मुद्दा उठाया।
आरा से CPI (ML) सांसद सुदामा प्रसाद ने ऊंची जातियों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों पर बात की। उन्होंने कहा कि न्याय की लड़ाई लंबी है। उन्होंने बिहार में जमीन वितरण के लिए जुटाए गए पैसों और किसानों से पट्टेदारों द्वारा वसूली का जिक्र किया। उन्होंने छात्रों और किसानों से अपील की कि वे भेदभाव के खिलाफ एकजुट होकर खड़े हों।
लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मण यादव, जो दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन कॉलेज में पूर्व एड-हॉक प्रोफेसर रह चुके हैं, ने कहा कि UGC इक्विटी रेगुलेशन समाज के लिए एक अच्छा कदम था। उन्होंने बताया कि इसे पहले समानता समिति कहा गया था और इसका उद्देश्य संस्थानों में वंचित छात्रों की मदद करना था। लेकिन बाद में यह एक राजनीतिक साजिश का हिस्सा बन गया। उन्होंने सरकार के इरादों पर सवाल उठाए और कहा कि अगर मंशा सही होती तो इसे पहली सुनवाई में ही नहीं रोका जाता। उन्होंने कहा कि यह कानून भेदभाव खत्म करने के लिए था और इसे बहुत पहले लागू किया जाना चाहिए था।

दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. उमा गुप्ता ने कहा कि UGC इक्विटी गाइडलाइन की जरूरत बहुत पहले थी। उन्होंने कहा कि इस नियम में अल्पसंख्यकों और हाशिए पर पड़े समुदायों को शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने अपने भाषण में रोहित वेमुला के सुसाइड नोट का भी जिक्र किया और बताया कि संस्थानों में भेदभाव आज भी जारी है।
प्रोफेसर जितेंद्र मीणा ने कहा कि लोग अपने अधिकारों और अपनी समुदाय के लिए जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुए हैं। उन्होंने कहा कि यह प्रदर्शन इसलिए अलग है क्योंकि जिन लोगों को न्याय देने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने उल्टा काम किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे नोटिफिकेशन पर रोक लगा दी जो अभी लागू भी नहीं हुआ था, यह कहते हुए कि इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश के शासक वर्ग वंचित समुदायों के प्रति पूर्वाग्रह रखते हैं। उन्होंने ED, CBI के दुरुपयोग और बुलडोजर से घर गिराने की घटनाओं का भी जिक्र किया। उन्होंने विश्वविद्यालयों में ऊंची जातियों के छात्रों के अवैध दाखिले और मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए।

लोगों को संबोधित करते हुए प्रो. एन. सुकुमार ने अपनी किताब “Caste Discrimination and Exclusion in Indian Universities: A Critical Reflection” के बारे में बात की। उन्होंने अनिल मीणा, दर्शन सोलंकी और अन्य छात्रों के मामलों का जिक्र किया जो इस व्यवस्था के शिकार हुए। उन्होंने कहा कि IIT, IIM सहित देश भर की यूनिवर्सिटियों में लगभग 35,000 छात्रों ने भेदभाव झेला है। उन्होंने बताया कि पीएचडी इंटरव्यू प्रक्रिया में भी छात्रों के साथ भेदभाव होता है। उन्होंने कहा कि छात्रों को प्रशासनिक उत्पीड़न से बचाने के लिए यह एक्ट बहुत जरूरी है और ऊंची जाति के लोगों को भी उनकी किताब पढ़नी चाहिए।
प्रदर्शन के अंत में वक्ताओं ने यह सवाल उठाया कि जब उच्च शिक्षा में लंबे समय से जातिगत भेदभाव मौजूद है, तो उसे रोकने वाला कानून इतनी देर से क्यों लाया गया और आने के बाद भी इसे पहली हियरिंग में ही रोक दिया गया आख़िर इसके पीछे क्या मंशा रही जो यह पता होने की बात कि कितना भेदभाव व्याप्त है, फिर भी इसके दुरुपयोग की बात कह कर रोक दिया गया।
(अभिषेक मिश्रा की रिपोर्ट।)