यूजीसी नियमावली और सामाजिक-न्याय सुधारों पर न्यायिक दृष्टिकोण की समस्या 

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की समता-संवर्धन नियमावली-2026 पर रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समाज के वंचित और पिछड़े समाजों में काफी आलोचना हो रही है। लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ। समाज के वंचित और पिछड़े हिस्सों ने पहले अनेक बार न्यायालयों के विभिन्न फैसलों पर अपनी असहमति और असंतोष जताया। अपेक्षाकृत कुलीन और अमीर पृष्ठभूमि के कुछ प्रगतिशील और उदार लोगों ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से असहमति जताई है। 

आजादी के बाद अगर हम अपने देश के न्यायिक इतिहास पर नज़र डालें तो पता चलता है कि जनता की इच्छा और मांग पर राजनीतिक नेतृत्व ने जब कभी सामाजिक-आर्थिक सुधार के कुछ बड़े कदमों का ऐलान किया, उससे नाराज या प्रभावित हो रहे मुट्ठी भर बड़े अमीर और कुलीन पृष्ठभूमि के लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और ऐसे ज्यादातर मामलों में उन्हें  न्यायपालिका से ‘राहत’ मिली। गरीबों, वंचितों और पिछड़ो के पक्ष में लाये जा रहे ऐसे ज्यादातर विधेयक या सरकारी आदेश थम गये।

यूजीसी की समता-संवर्धन नियमावली के मामले में आज जो हुआ है; उससे ज्यादा बड़े सामाजिक-आर्थिक सुधार कार्यक्रमों के साथ हमारे यहां ऐसा घटित हो चुका है। जमींदारी उन्मूलन, भूमि सुधार, प्रिवीपर्स खात्मा, कोयला क्षेत्र और बैंकों का राष्ट्रीयकरण, वंचित और पिछड़े वर्ग के लिए नौकरियों में आरक्षण और एससी-एसटी एक्ट पर कोर्ट का विवादास्पद फैसला सहित अनेक उदाहरण हैं, जब निर्वचित सरकारों की तरफ से उठाये विधायी कदमों को न्यायपालिका ने रोक दिया या गैरवाजिब संशोधन कर दिया! 

1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने दस वर्षों से सरकारी आलमारी में कैद मंडल आयोग की रिपोर्ट की एक खास सिफारिश- ‘ओबीसी के लिए नौकरियों में 27% आरक्षण’ की घोषणा की थी। सुप्रीम कोर्ट ने उसे तत्काल रोक दिया। उसके क्रियान्वयन में ढाई-तीन साल लग गये। वह भी एक बड़े और विचित्र कानूनी संशोधन के साथ! सुप्रीम कोर्ट ने पिछडों में ‘क्रीमीलेयर’ नामक एक नयी श्रेणी खोज ली! 

26 जनवरी, 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ यानी भारत मुकम्मल लोकतांत्रिक गणराज्य बना! लेकिन तत्कालीन सरकार को संविधान लागू किये जाने के कुछ ही महीने बाद इसमें पहला संशोधन करना पड़ा! मुख्य कारण बना सरकार के सुधार कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के रास्ते में अदालतों की तरफ से आने वाला अवरोध! 1951 में जो पहला संविधान संशोधन हुआ, वह मुख्य रूप से कानूनी पेंच के राजनीतिक समाधान के लिए ही किया गया!

आजादी के बाद सरकार ने जमींदारी उन्मूलन करना चाहा तो अनेक इलाकों में उन कदमों को अदालती चुनौती दी जाने लगी और अदालतों का रवैया सरकार के सामाजिक-आर्थिक न्याय के प्रयासों को लेकर अपेक्षाकृत संवेदनशील नहीं था। उसका सबसे बड़ा कारण था कि कुछ ही समय पहले ही आजाद हुए भारत की न्यायपालिका में अमीर और कुलीन पृष्ठभूमि से आये जजों की प्रचंड संख्या थी। इनमें एक बड़ा हिस्सा सामंती-जमींदाराना या शहरी पृष्ठभूमि के अमीर लोगों का था। 

अदालतों की तरफ से जमींदारी-उन्मूलन के अलावा और भी कई मुद्दे शासन के लिए मुश्किल पैदा कर रहे थे। 

दूसरा प्रमुख मुद्दा था-सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण जैसे सामाजिक न्याय के जरूरी कदम उठाना! इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 15 में संशोधन करना जरूरी समझा गया। पहले संशोधन से ही संविधान में नौवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिससे कुछ जरूरी कानूनों को न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर रखा जा सके। आज देश के कुछ राज्यों में आरक्षण के 49.5% से ज्यादा वाले प्रावधान संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने के कारण ही आज अदालती चुनौती से बचे हुए हैं।

ऐसे कई जरूरी कारणों के साथ सरकार ने पहले संशोधन के जरिये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ जरूरी बंदिशें लगाने का प्रावधान भी जोड़ दिया जिसे संविधान विशेषज्ञों के एक हिस्से ने निरंकुशता की तरफ ले जाने वाला कानूनी संशोधन कहा तो दूसरे हिस्से ने जरूरी बताया। 

बहरहाल, एक बात पर कोई विवाद नहीं कि पहला संविधान संशोधन मुख्य रूप से सामाजिक-आर्थिक सुधार के सकारात्मक एजेंडे के क्रियान्वयन में अदालतों की तरफ से आने वाली मुश्किलों से बचने के लिए किया गया। अनेक राज्यों में अदालतों द्वारा भूमि सुधार कानूनों को लगातार अवैध घोषित किया जा रहा था। सुधार की राजनीतिक पहल को बचाने के लिए संविधान में 9वीं अनुसूची और अनुछेद 31-ए और 31-बी  जोड़े गए।

लेकिन पहले संविधान संशोधन के बावजूद अदालतों की तरफ से खड़ी की जाने वाली मुश्किलें पूरी तरह रूकी नहीं। ऐसी रुकावटों की अदालती गाज आमतौर पर सरकार के प्रगतिशील और रेडिकल सुधार कार्यक्रमों पर ज्यादा गिरती थी। इसके कुछ ज्वलंत उदाहरण हैं। आजादी के साथ ही देश की कई शाही रियासतों का स्वतंत्र भारतीय राष्ट्र-राज्य में विलय हुआ था। कुछ रियासतें बाद में शामिल हुईं!

इन सबके लिए बाकायदा संवैधानिक व्यवस्था के तहत प्रिवीपर्स के नाम पर भारत सरकार अपने खजाने से मोटी रकम देती रही। एक तरह से भारत इन रियासतों के पूर्व राजाओं को उनके राज्य के भारत में विलय की कीमत चुकाती थी! हैदराबाद रियायत को 43 लाख सालाना, ग्वालियर, जोधपुर, जयपुर, बड़ौदा, भोपाल और मैसूर सहित दर्जन भर पूर्व राजघरानों को 10 से 12 लाख रूपये सालाना जाता था। प्रतिवर्ष तकरीबन 6 करोड रूपये इन राजघराने को प्रिवीपर्स के नाम पर चला जाता था।

पहली बार इंदिरा गांधी की सरकार ने सन् 1970 में पूर्रा राजघरानों के प्रिवीपर्स को खत्म करने का ऐलान कर दिया। जनसंघ(भाजपा का पूर्व नाम), स्वतंत्र पार्टी और कांग्रेस से अलग होकर बने एक गुट(जिसके नेता मोरार जी देसाई थे) को छोड़कर सभी राजनीतिक दलों ने इंदिरा गांधी सरकार के इस कदम का समर्थन किया। इसके लिए संविधान संशोधन किया जाना जरूरी था। विधेयक लोकसभा में दो तिहाई बहुमत से पारित हो गया पर राज्यसभा में 1 वोट से गिर गया!

इंदिरा गांधी ने कानून को बरकरार रखने के लिए प्रेसिडेंसियल आदेश जारी कराया। इसे कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के ग्वालियर के तत्कालीन महाराजा की याचिका पर प्रिवीपर्स जारी रखने का आदेश जारी कर दिया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 14 बैंकों के राष्ट्रीयकरण के इंदिरा गांधी सरकार के फैसले को भी पलट दिया था। लेकिन इंदिरा गांधी ने बाद में लोकसभा और राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत पाने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोके गये सरकारी फैसलों को पारित कराकर नया इतिहास रचा।

प्रिवीपर्स सचमुच इतिहास बन गया! सन् 1971-73 के बीच कोयला खदानों और कोयला उद्योग का भी राष्ट्रीयकरण किया गया। 

आजाद भारत में सामाजिक न्याय के जितने बड़े शासकीय या विधायी प्रयास हुए, अदालतों में उन सबको चुनौती दी गई और चुनौती देने वालों को इन अदालतों ने आमतौर पर निराश नहीं किया। मंडल आयोग(1990) के बाद उच्चशिक्षा क्षेत्र में ओबीसी आरक्षण(2006) को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने क्रियान्वयन रोकते हुए याचिकाएं मंजूर कीं। बाद में कुछ संशोधनों के साथ मंडल आयोग की एक सिफारिश(27फीसद ओबीसी आरक्षण) को मंजूरी मिली।

शिक्षा क्षेत्र में ओबीसी आरक्षण के 2006 के कानून को कोर्ट ने बाद में मंजूरी दी और वह 2008-09 में लागू किया जा सका।

कोई नहीं जानता कि यूजीसी की समता-संवर्धन नियमावली-2026 का क्या होगा? क्योंकि पहले और आज के बीच एक फर्क है। उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण को लागू कराने के लिए तत्कालीन यूपीए सरकार प्रतिबद्ध थी। तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह अपनी ही पार्टी की एक ‘कंजरवेटिव ब्राह्मणवादी लाॅबी’ के दबाव के बावजूद उच्च शिक्षा क्षेत्र में ओबीसी आरक्षण विधेयक लागू कराने के अपने संकल्प से डिगे नहीं।

लेकिन आज जिस मोदी सरकार के कार्यकल में यूजीसी समता-संवर्धन नियमावली लाई गई, वह स्वयं भी इसे अमली जामा नहीं पहनाना चाहती। नियमावली के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं पर सुनवाई के समय पिछले सप्ताह केंद्र सरकार बिल्कुल खामोश रह गई! उसके शीर्ष विधि सलाहकारों-वकीलों ने यूजीसी (सरकार की संस्था) की नियमावली का रत्तीभर भर बचाव नहीं किया।

इससे सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के प्रति मौजूदा सत्ताधारियों की उदासीनता और चिढ़;  दोनों का बहुत साफ संकेत मिलता है। सन् 2018 में  एससी-एसटी एक्ट को कमजोर करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के समय भी माननीय कोर्ट का यह रुख साफ दिखा था। उसके विरोध में पूरे देश में प्रोटेस्ट हुआ था। सरकार और कोर्ट, दोनों को अपना रुख बदलना पड़ा। 

असल में हमारी उच्च न्यायपालिका में और सरकार के न्यायिक सलाहकारों में बहुत बडा हिस्सा अपेक्षाकृत अमीर, कुलीन और सवर्ण पृष्ठभूमि से आये लोगों का है। हां, दक्षिण भारत में निचली अदालतें जरूर अपवाद हैं। इनमें पिछले दशक से ही सबाल्टर्न और पिछड़े समाजों से आये जजों की संख्या बढ़ी है। लेकिन उच्च न्यायपालिका के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता।

सिर्फ जजों के स्तर पर ही नहीं, उच्च अदालतों में सक्रिय बड़े और असरदार वकीलों का बड़ा हिस्सा भी जजों की तरह अमीर, कुलीन और सवर्ण पृष्ठभूमि से आता है। विचार, मिजाज और वैचारिक प्रतिबद्धता के स्तर पर न्यायविदों के एक हिस्से ने निश्चय ही अपने को वर्ग और वर्ण के संकीर्ण दायरे से मुक्त किया है। लेकिन उच्च स्तर पर यह संख्या आज भी बहुत बड़ी नहीं है।

इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि 78 साल के आजाद भारत में आज भी उच्च न्यायपालिका में हमारे राष्ट्रीय मीडिया और निजी क्षेत्र के स्वामित्व की तरह उच्चवर्णीय पृष्ठभूमि के लोगों का वर्चस्व कायम है। न्यायपालिका और मीडिया का समावेशी स्वरूप और चरित्र न होने से अनेक संवेदनशील सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर इनके विचारों और सरोकारों में अपेक्षित संतुलन और वस्तुपरकता का अभाव साफ झलकता है।

कई बार न्यायविदों की गैर जानकारी वश भी ऐसा होता होगा। लेकिन कई बार पर्याप्त जानकारी के बावजूद हमारी अदालतों के कुछ फैसलों में ‘न्यायिक परिप्रेक्ष्य’ की बजाय ‘राजनीतिक परिप्रेक्ष्य’ नज़र आते हैं! 

अयोध्या के मंदिर-मस्जिद विवाद फैसले के बारे में समाज और न्यायिक अध्ययन से जुडे विद्वानों के बीच ऐसा ही महसूस किया गया। 

इस बीच हमारे ज्यादातर संवैधानिक निकाय एक नयी समस्या और चुनौती का सामना कर रहे हैं। गत एक दशक से हमारे सत्ताधीश अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता भारतीय संविधान से ज्यादा हिंदुत्व की विचारधारा और अतीत के पौराणिक व मिथकीय ग्रंथों में खोजते हैं। अपनी हिंदुत्ववादी वैचारिकी से वे न सिर्फ मीडिया अपितु न्यायपालिका को प्रभावित करते दिख रहे हैं। इसके अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं।

पिछले दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश को एक हिंदुत्ववादी संगठन की बैठक में जाकर अल्पसंख्यकों के बारे में अनर्गल प्रलाप करते सुना गया। ऐसे एक नहीं, अनेक उदाहरण मिल जायेंगे जहां स्वयं न्याय करने वाले ही संविधान-विरुद्ध बातें करते दिखेंगे। ऐसे में न्याय की अवधारणा, उसकी संरचना और उसकी प्रक्रिया के लिए लगातार संकट बढ़ता जा रहा है। ऐसी समस्याओं का कोई रेडीमेड समाधान नहीं है। पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि अंतत: समाज के प्रगतिशील हस्तक्षेप से ही समाधान का रास्ता निकलेगा। 

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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