मुंबई विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में नसीरुद्दीन शाह को पहले बुलाया गया, फिर मना किया गया  

अभिनेता नसीरुद्दीन शाह को मुंबई विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था लेकिन ऐन वक्त आने से मना कर दिया गया। 

शाह ने यह जानकारी इंडियन एक्सप्रेस में गुरुवार को लिखे एक लेख में दी है। उन्होंने बताया है कि मुंबई विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग की ओर से 1 फ़रवरी को आयोजित “जश्न-ए-उर्दू” में वह आमंत्रित थे और छात्रों से बातचीत के मौके को लेकर वह उत्साहित भी थे लेकिन एक दिन पहले रात में विश्वविद्यालय ने उन्हें आने से मना कर दिया। 

अभिनेता ने कहा कि माफ़ी छोड़िए, उन्होंने कारण बताना भी ज़रूरी नहीं समझा। उन्होंने कहा कि उस पर यह अपमान जैसे काफ़ी नहीं था, विश्वविद्यालय ने उनके ज़ख़्मों पर नमक छिड़कते हुए घोषणा की कि “मैंने कार्यक्रम में आने से मना कर दिया।”

शाह के अनुसार उन पर देश के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी करने का भी आरोप एक वरिष्ठ अधिकारी ने कथित रूप से लगाया। उन्होंने कहा कि वह चुनौती देते हैं कि देश के ख़िलाफ़ उनका एक बयान भी दिखा दिया जाए तो वह माने।

शाह ने कहा कि हाँ, वह “विश्वगुरु” की ज़रूर कभी तारीफ़ नहीं करते। वास्तव में, वह उनके आलोचक ही हैं। उनकी आत्ममुग्धता बुरी लगती है और पिछले दस सालों में उनकी एक बात से भी वह प्रभावित नहीं हुए हैं। 

शाह ने कहा कि वह सत्ता पक्ष की कई बातों की आलोचना करते रहे हैं। वह कई ऐसे मुद्दों पर खुलकर बोलते रहते हैं, जो उन्हें परेशान करते हैं कि हम किस दिशा में जा रहे हैं, जहाँ छात्रों/ एक्टिविस्टों को वर्षों जेल में बिना मुकदमे के रखा जाता है और बलात्कारियों/हत्यारों को बार-बार जमानत दी जाती है। जहाँ स्वयंभू गौरक्षकों को लोगों को पीटने, मार डालने की छूट दी जाती है, जहाँ इतिहास का पुनर्लेखन हो रहा है, पाठ्य पुस्तकों के संदर्भ बदले जाते हैं, जहाँ विज्ञान से छेड़छाड़ की जाती है और जहाँ मुख्यमंत्री के पद पर बैठा व्यक्ति “मियाँ” को प्रताड़ित करने की बात करता है। यह नफ़रत कब तक चलेगी?

उन्होंने कहा कि यह वह देश नहीं है जहाँ वह बड़े हुए और प्यार करना सीखा। सोच पर पहरे से लेकर दोमुंहापन, निगरानी का माहौल है। “दो मिनट की नफ़रत” चौबीस घंटे की नफ़रत बन गई है। क्या यह ग़लत होगा यदि हालात की तुलना जॉर्ज ऑरवेल के 1984 से करें, जिसमें “महान नेता” की तारीफ़ न करना राजद्रोह था? 

(जनचौक ब्यूरो)

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