भारत में उच्च शिक्षा का निजीकरण कितना फलदायक?

भारत में उच्च शिक्षा का परिदृश्य उदारीकरण के पश्चात् तीव्र गति से परिवर्तित हुआ है। राज्य की सीमित वित्तीय क्षमता, बढ़ती युवा आबादी और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की मांग ने निजी क्षेत्र को विश्वविद्यालय स्थापना के लिए अनुकूल अवसर प्रदान किया। परिणामस्वरूप निजी विश्वविद्यालयों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिसे नियामक स्तर पर यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन द्वारा मान्यता और विनियमन की संरचना के भीतर संचालित किया जाता है।

तथापि, मात्र संस्थागत विस्तार को शिक्षा के लोकतंत्रीकरण या गुणवत्ता-वृद्धि का पर्याय मान लेना भ्रामक होगा। यह आवश्यक है कि निजी विश्वविद्यालयों की संरचना, संचालन-पद्धति, वित्तीय मॉडल और सामाजिक प्रभाव का सम्यक् विश्लेषण किया जाए, ताकि स्पष्ट हो सके कि यह विस्तार ज्ञान-उत्पादन की ऐतिहासिक परंपरा को आगे बढ़ा रहा है या शिक्षा को बाजार-तंत्र के अधीन एक उपभोक्तात्मक उत्पाद में रूपांतरित कर रहा है।

निजी विश्वविद्यालयों का उद्भव मुख्यतः उस तर्क पर आधारित रहा है कि सार्वजनिक विश्वविद्यालय संसाधनों और सीटों की दृष्टि से सीमित हैं तथा वे तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रमों और अवसंरचना का विकास करने में अपेक्षाकृत धीमे हैं।

निजी पूँजी के प्रवेश ने अवसंरचना, तकनीकी संसाधनों और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के विस्तार में निस्संदेह भूमिका निभाई है। इंजीनियरिंग, प्रबंधन, विधि, मीडिया और स्वास्थ्य विज्ञान जैसे क्षेत्रों में नए संस्थान उभरे, जिन्होंने उच्च शिक्षा को भौगोलिक रूप से भी विस्तारित किया। परंतु इस विकास के साथ एक अंतर्विरोध भी जन्मा—शिक्षा का मूल स्वभाव, जो ज्ञान, समालोचनात्मक विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व पर आधारित होता है, धीरे-धीरे प्रतिस्पर्धी बाजार-तर्कों के अधीन होने लगा।

जब विश्वविद्यालय का संचालन लाभ-केन्द्रित कॉरपोरेट मॉडल के अनुरूप होने लगता है, तब शैक्षिक निर्णयों की दिशा अकादमिक आवश्यकताओं से अधिक वित्तीय लाभांश की ओर झुकने लगती है।

निजी विश्वविद्यालयों की वित्तीय संरचना का केंद्रीय तत्व ऊँची फीस है। चूँकि इन संस्थानों को व्यापक सरकारी अनुदान प्राप्त नहीं होता, वे अपने संचालन और विस्तार की लागत विद्यार्थियों से वसूल की गई फीस के माध्यम से निकालते हैं। यह तर्क आर्थिक दृष्टि से युक्तिसंगत प्रतीत हो सकता है, किंतु जब फीस संरचना अत्यधिक हो जाती है और उसके साथ विभिन्न प्रकार के अनिवार्य शुल्क, विकास-शुल्क या तथाकथित ‘सुविधा-शुल्क’ जोड़े जाते हैं, तब शिक्षा सामाजिक न्याय के सिद्धांत से दूर जाने लगती है।

उच्च शुल्क संरचना सामाजिक-आर्थिक विषमता को पुनरुत्पादित करती है, क्योंकि निम्न एवं निम्न-मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों के लिए ऐसे संस्थानों तक पहुँचना कठिन हो जाता है। छात्रवृत्तियाँ और ऋण-व्यवस्थाएँ इस अंतर को आंशिक रूप से पाटती हैं, परंतु छात्र ऋण का दीर्घकालिक बोझ युवाओं को पेशेवर जीवन की शुरुआत में ही आर्थिक असुरक्षा से जोड़ देता है।

गुणवत्ता के प्रश्न पर भी गंभीर विमर्श अपेक्षित है। निजी विश्वविद्यालय प्रायः अत्याधुनिक भवनों, सुसज्जित कक्षाओं और आकर्षक परिसर-संरचना को अपनी पहचान के रूप में प्रस्तुत करते हैं। किंतु विश्वविद्यालय की गुणवत्ता का निर्धारण केवल भौतिक अवसंरचना से नहीं, बल्कि संकाय की शैक्षणिक क्षमता, शोध-उत्पादन, बौद्धिक स्वतंत्रता और अकादमिक वातावरण से होता है।

अनेक निजी संस्थानों में अनुबंध आधारित नियुक्तियाँ, अपेक्षाकृत कम वेतन और प्रबंधन-नियंत्रित अकादमिक नीतियाँ देखी जाती हैं, जिससे दीर्घकालिक शोध-परंपरा विकसित नहीं हो पाती। शोध की अपेक्षा त्वरित परिणाम देने वाले, बाज़ार-उन्मुख पाठ्यक्रमों को प्राथमिकता दी जाती है। इस प्रवृत्ति का परिणाम यह होता है कि विश्वविद्यालय ज्ञान-सृजन के केंद्र के बजाय कौशल-प्रशिक्षण के संस्थान बनकर रह जाते हैं।

रैंकिंग और प्लेसमेंट के प्रश्न ने निजी विश्वविद्यालयों की कार्य-संस्कृति को विशेष रूप से प्रभावित किया है। उच्च वेतन पैकेज, बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जुड़ाव और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के दावे संस्थागत प्रचार का प्रमुख आधार बनते हैं। यद्यपि उद्योग-जगत से संबंध स्थापित करना और विद्यार्थियों के लिए रोजगार के अवसर सृजित करना महत्वपूर्ण है, किंतु जब प्लेसमेंट को ही गुणवत्ता का एकमात्र सूचक बना दिया जाता है, तब शिक्षा की व्यापक मानवीय और बौद्धिक भूमिका गौण हो जाती है।

कई बार अधिकतम वेतन-पैकेज को औसत उपलब्धि की तरह प्रस्तुत किया जाता है या अल्पकालिक इंटर्नशिप को स्थायी रोजगार के रूप में प्रचारित किया जाता है। इससे पारदर्शिता और नैतिकता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।

नियामक व्यवस्था भी इस विमर्श का महत्वपूर्ण आयाम है। यद्यपि यूजीसी और अन्य वैधानिक संस्थाएँ मानक निर्धारित करती हैं, तथापि राज्य और केंद्र के स्तर पर विविध नियमों, राजनीतिक हस्तक्षेपों और निजी पूँजी के प्रभाव के कारण नियंत्रण तंत्र अनेक बार प्रभावी नहीं हो पाता। निरीक्षण प्रक्रियाएँ औपचारिकता तक सीमित रह जाती हैं और संस्थानों को दीर्घकालिक अकादमिक सुधार के लिए बाध्य करने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है।

नियमन और स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित करना एक जटिल चुनौती है; अत्यधिक नियंत्रण से नवाचार बाधित हो सकता है, किंतु ढीला नियंत्रण शिक्षा को अनियंत्रित बाजार-तर्कों के हवाले कर सकता है।

सामाजिक दृष्टि से निजी विश्वविद्यालयों का विस्तार दोधारी तलवार सिद्ध होता है। एक ओर उन्होंने उच्च शिक्षा के अवसरों का भौगोलिक विस्तार किया है और अनेक प्रथम-पीढ़ी के विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय परिसर तक पहुँचने का अवसर दिया है; दूसरी ओर ऊँची लागत और प्रतिस्पर्धी वातावरण ने शिक्षा को वर्ग-आधारित उपभोग में बदलने का जोखिम भी उत्पन्न किया है।

यदि विश्वविद्यालय सामाजिक परिवर्तन और लोकतांत्रिक मूल्यों के संवाहक हैं, तो उन्हें केवल रोजगार-उन्मुख प्रशिक्षण केंद्रों में सीमित कर देना उनके ऐतिहासिक दायित्व का संकुचन होगा।

अंततः यह निष्कर्ष निकलता है कि निजी विश्वविद्यालयों का अस्तित्व स्वयं में न तो पूर्णतः नकारात्मक है और न ही स्वतः प्रगतिशील। उनका मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि वे किस हद तक ज्ञान-सृजन, सामाजिक समावेशन, पारदर्शिता और अकादमिक स्वतंत्रता को प्राथमिकता देते हैं।

यदि शिक्षा का उद्देश्य नागरिकता-बोध, आलोचनात्मक चेतना और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास है, तो निजी विश्वविद्यालयों को भी उसी नैतिक ढाँचे में स्वयं को पुनर्स्थापित करना होगा। अन्यथा वे उच्च शिक्षा के लोकतांत्रिक स्वप्न को संकुचित कर, उसे केवल आर्थिक निवेश और प्रतिफल की गणना तक सीमित कर देंगे। दुर्योग से यही होता दिख रहा है जो बेहद चिंताजनक है।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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