मधुसूदन आनंद का निधन: असाधारण पद पर रहते बिताया साधारण जीवन

भारत का सबसे बड़ा मीडिया समूह कहलाने वाले `बेनेट, कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड` यानी `टाइम्स ग्रुप` जब गर्व से अपने सम्पादकों की `हत्या` का ऐलान कर चुका था और नयी भर्ती होकर आने वाले कर्मचारियों के इन्डक्शन प्रोग्राम में भी साल दर साल ज़ोर देकर यह हाँकने का चलन था कि `एक वक़्त हमारा सम्पादक (यानी द टाइम्स ऑफ इंडिया का 1978 से 1988 तक प्रधान सम्पादक गिरिराज जैन) देश में प्रधानमंत्री के बाद सबसे ताक़तवर व्यक्ति हुआ करता था लेकिन अब हम नहीं चाहते कि हमारे सम्पादक का नाम कोई जाने, तब मधुसूदन आनंद इस ग्रुप के हिन्दी अख़बार `नवभारत टाइम्स` में बतौर सम्पादक ख़ामोशी के साथ इन्सानी गरिमा की मिसाल थे।

एक वक़्त था जब हिन्दी में `नवभारत टाइम्स` ख़ासी प्रसार संख्या वाला अख़बार था। फिर क्षेत्रीय अख़बारों के उदय के साथ दिल्ली के आसपास के राज्यों में भी उसकी भूमिका सिमटने लगी। साहू जैन परिवार की नयी पीढ़ी की दिलचस्पी हिन्दी में कम भी थी और वे ख़ुद भी इसे दिल्ली तक समेट रहे थे। हिन्दी के वामपंथी, दक्षिणपंथी और लिबरल तीनों तरह के पत्रकारों का मसीहा टाइप राजेंद्र माथुर सम्पादक होकर जा चुका था और एसपी सिंह जैसा सितारा भी।

बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान अख़बार में घंटियाँ बजा देने जैसे सम्पादक-साहित्यकार विद्यानिवास मिश्र भी। तब घोषित नीति के तौर पर सम्पादक के नाम को महत्वहीन मानने, एचआर का वर्चस्व स्थापित करने और अख़बार को ख़बरों के बजाय विज्ञापनों के लिए छापने का ऐलान करने वाले ग्रुप के इस हिन्दी अख़बार के सम्पादक मधुसूदन आनंद थे। इतनी सारी बातों के बीच उनकी शख़्सियत की एक चमक थी, उनकी अपनी जो उस मीडिया कंपनी के भव्य दफ़्तर के बीच अलग से महसूस होती थी, उनकी सहज मुस्कान में, उनकी शराफ़त में, उनकी बातचीत में और उनकी योग्यता में।

एक शानदार कहानीकार होने और कई सालों तक जारी होने वाले सर्वेक्षणों में सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले लेखकों की सूची में आते रहने के बावजूद उनका डंका दूसरे जाने-माने कहानीकारों जैसा नहीं था। आकस्मिक ही था कि उनसे मुलाक़ात से एकाध साल पहले मुझे उनका पहला कहानी संग्रह `साधारण जीवन` हाथ लग गया था। मुझे पहली ही कहानी पढ़कर इस बात पर हैरानी हुई थी कि मैं इस कहानीकार को अब तक क्यों नहीं जानता था। उनसे मेरा मिलना, कृपा पाने जैसी स्थिति में मिलना था।

2005 में भिवानी में `दैनिक जागरण` में काम करते हुए बीमार होने के बाद दोबारा वहाँ काम पर लौट पाना मुमकिन नहीं हुआ और ख़ुद को फ़ील्ड में दिन-रात भागदौड़ करने और ख़बरें व दफ़्तर संभालने की स्थिति में असमर्थ पाया तो शायद 2006 में मनमोहन की मार्फ़त विष्णु नागर जो उनके अभिन्न और आजीवन मित्र रहे, की सिफ़ारिश पर मैं उनसे मिलने के लिए गया था। वह शुक्रवार शाम की कोई तारीख़ थी। उन्होंने मुझे दिल्ली में यमुना नदी की हालत पर सोमवार दोपहर तक रिपोर्ट लिखने के लिए कहा। शनिवार-इतवार को दफ़्तर बंद रहते थे और मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह कैसे मुमकिन हो सकता है। तब मंगलेश डबराल ने सलाह दी कि उन्होंने कहा है तो कुछ भी लिख कर ज़रूर लेकर जाओ, नहीं तो आंकड़ों के बिना ही ग्राउंड रिपोर्ट (उन्होंने हिन्दी में कोई शब्द कहा था) लिखो।

मैं आईएसबीटी के पास के घाट से वज़ीराबाद बैराज तक छोटी-मोटी चीज़ें नोट करते हुए पैदल गया और सोमवार को उन्हें रिपोर्ट दे दी। यह निवेदन करते हुए कि प्रदूषण के आंकड़े और योजनाओं आदि के बारे में अगले एक-दो दिन में लिख कर दूँगा। उन्हें रिपोर्ट पसंद आई। चूंकि, विष्णु नागर की सिफ़ारिश थी तो नौकरी की गुंजाइश निकलते ही उन्होंने मुझे सूचना भिजवा दी। मुझे फ़ायदा यह हुआ कि उस दिन कुल दो लोगों को टेस्ट के लिए बुलाया गया था।

रिपोर्टिंग का इम्तिहान होता तो मुझे जरा डर न होता लेकिन डेस्क पर कभी काम किया ही नहीं था। मधुसूदन आनंद ने मुझे अंग्रेजी की दो ख़बरें हिन्दी अनुवाद के लिए दीं। यह उनकी तरफ़दारी ही थी कि जो दो ख़बरें थीं, उनमें से एक राजनीति से जुड़ी थी और दूसरी बिजली के महकमे से। मतलब यह कि अनुवाद में कॉमन सेंस से काम चल सकता था। सोचता हूँ कि उन्होंने कोई साइंस की स्टोरी पकड़ा दी होती तो मैं फेल होता ही होता। उन्होंने मेरे द्वारा किए गए दोनों अनुवादों पर एक-एक जगह लाल घेरे लगाए थे।

`नवभारत टाइम्स` में नौकरी मिल जाने के बाद उन दो एक सालों में मैंने मधुसूदन आनंद के वक़ार को निकट से महसूस किया। अख़बारों की काफ़ी लम्बी नौकरियों के बावजूद पहली बार लगा कि कोई सम्पादक है जिसका नाम लेकर कहा जा सकता है कि उसके अधीन काम किया था। इससे पहले के समाचार सम्पादकों और रीजनल हेड वगैरह जिनके मातहत काम किया था, उनमें कई बेहद अहंकारी, सामंती और चापलूसी-पसंद थे, कोई बर्ताव में बेहतर लेकिन काम में अज्ञानी, कोई निपट संस्कारी और कोई ऐसा लिजलिजा कि याद करके भी शर्म आए।

`सहारा टीवी` में प्रभात डबराल बेशक बेहतरीन इन्सान थे लेकिन वे फ्लॉर पर आकर अचानक आपा खो दिया करते थे। यूँ भी इस तरह के व्यवहार को पत्रकारों का स्वाभाविक गुण ही माना जाता था। लेकिन, आनंद की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे छोटे से छोटे मातहत की गरिमा को भी कभी चोट नहीं पहुँचाते थे। यहाँ तक कि जो उनके ख़िलाफ़ षड्यंत्र बुनते रहते, उनसे भी कभी उन्हें तेज़ बोलते हुए नहीं देखा गया। अख़बारों में ग़लतियाँ होती हैं और सम्पादक परेशान होता ही है। वे भी परेशान होते होंगे लेकिन कभी इस परेशानी को अपने कक्ष से बाहर जाहिर नहीं होने देते थे। जिससे शिकायत होती, उसे अपने कक्ष में बुलाते और वहीं शालीनता से बात करते।

हैरानी हुई, जब `नवभारत टाइम्स` में रामकृपाल सिंह के आने की बात चली तो कई लोगों ने उनके फ्लॉर पर आकर रौब दिखाने की आदतों का (जैसा कहा जा रहा था), किसी गुण की तरह बखान करना शुरू किया। ताक़त के प्रदर्शन को वे भी योग्यता मानते हैं जिनकी गरिमा को यह प्रदर्शन चोट पहुँचाता है। एक बार हिन्दी के एक लेखक जिनका नाम लेना उचित नहीं है, मुझे बोले, यार आनंद जी को सम्पादकी करनी नहीं आती, मैं उनकी जगह होता तो फलां-फलां को सबके सामने खींच देता। उन्हें उनमें `क्रांतिकारिता` न होना भी खटकता था। मैंने उन्हें कहा कि जो आप इतना फैल लेते हैं, आनंदजी के कारण ही फैल लेते हैं।

वे आप जैसे लोग जो ख़ुद को क्रांतिकारी समझते हैं या मेरे जैसे लोग जो यहाँ वल्नरेबल हैं, या जो ऑफिस की राजनीति में निशाने पर रहते हैं या जो साहित्य-संस्कृति-कला आदि में दिलचस्पी रखते हैं, सब पर नज़र रखते हैं और सबको चुपचाप सहारा देते रहते हैं। जहाँ तक उनकी क़ाबिलियत और पकड़ की बात थी तो इसका एक उदाहरण मुझे प्रमोद राय ने बताया था। उन्होंने बताया था कि सम्पादकीय टीम की मीटिंगों में आनंद जी राजनीति ही नहीं, इकॉनमी, खेल, साइंस आदि तमाम विषयों पर सबसे ज़्यादा अपडेटेड होते थे। उन्हें झांसा देना मुमकिन ही नहीं हो सकता था।

`नवभारत टाइम्स` वैसा ही था जैसा था। मधुसूदन आनंद से यह उम्मीद करना कि वे `टाइम्स ग्रुप` की नीतियों के विरुद्ध कुछ कर देते, नाइंसाफ़ी ही होगी। लेकिन, उनकी उपस्थिति में उन ख़बरों का भी स्पेस निकल जाता था जिनका स्पेस वहाँ नीतिगत तौर पर नहीं था। ऐसी कुछ ख़बरों को लेकर कई बार लिखने-पढ़ने वाले मुझे फोन करते तो मैं उन्हें ही जाकर बताता और वे जगह निकाल देते। `सहमत` की प्रदर्शनी पर हमले की ख़बर तो मैंने फोन पर ही अनुराग भाई (अन्वेषी) को नोट कराई और वह सही परिप्रेक्ष्य में छपकर आई। एक बार उन्होंने मुझे पेंटर मनजीत बावा के स्वास्थ्य पर स्टोरी करने का मौक़ा दिया।

मैं उनके घर गया। वे कोमा में थे और घर पर ही उनकी सारी व्यवस्था थी। उस स्टोरी के बाद वे अक्सर मुझे साहित्यिक कार्यक्रमों के कार्ड दे दिया करते थे हालांकि उनमें जाना ऑफिस ड्यूटी आवर्स के कारण संभव नहीं होता था। एक बार उन्होंने कृष्णा सोबती से (शायद सरस्वती सम्मान स्वीकार करने से इंकार करने पर) वर्जन लेने के लिए कहा तो मुझे बड़ी ख़ुशी मिली। साहित्य के लिए अख़बार में कहने भर की जगह होने के बावजूद एडिट पेज पर उनके प्रिय जाने-पहचाने कवि-लेखक थे और किसी न किसी विमर्श-संवाद के बहाने जगह निकलती रहती थी।

एक बार वे काफ़ी दिनों तक दफ़्तर नहीं आए तो तरह-तरह की चर्चाएं चलती रहती थीं जिनकी पुष्टि का मेरे पास कोई माध्यम नहीं था। कुछ कम्पोजिटर बताते कि उन पर कुछ लोगों की छंटनी के लिए दबाव है लेकिन वे इसका विरोध कर रहे हैं। गो कि कंपनी में प्रबंधन इन सब कामों के लिए काफ़ी ज़्यादा ताक़तवर था। `नवभारत टाइम्स` से वे `नई दुनिया` में चले गए। एक तरह से आलोक मेहता उन्हें और विष्णु नागर को वहाँ ले गए। एक समय के ये तीनों नजदीकी मित्र इस तरह काम में एक साथ आए। मधुसूदन आनंद या विष्णु नागर ने तो कभी इस बारे में कुछ नहीं कहा लेकिन वहाँ काम करने वाले कई दोस्तों ने बताया कि आलोक मेहता इगो के मामले में काफ़ी छोटे आदमी साबित हुए और वे इन प्रतिभाओं के काम को बर्दाश्त नहीं कर सके।

शानदार ढंग से निकल रही `संडे नई दुनिया` पत्रिका की प्रिंट लाइन से नागर जी का नाम तक हटवा दिया गया था। मेहता को शायद लगता था कि उसका नाम तो अख़बार के दिल्ली एडिशन तक रहता है जबकि संडे पत्रिका से नागर का नाम पूरी हिन्दी पट्टी में पहुँच रहा है। बाद में आनंद `ज्ञानपीठ` की पत्रिका `नया ज्ञानोदय` के सम्पादक हो गए। रवींद्र कालिया उस पत्रिका में काफ़ी धूम-धड़ाके कर चुके थे। लेकिन, आनंद अपने उसी आनंद में रहे जो उनकी सहज प्रवृत्ति थी। वे बिना किसी शोर-शराबे के इस पत्रिका को गरिमापूर्ण ढंग से निकालते रहे।

एक बार मैंने पुस्तक मेले से उन्हें असद ज़ैदी के दो कविता संग्रह `सामान की तलाश` और `बहनें और अन्य कविताएँ` (पुन: प्रकाशन) ले जाकर दिए थे। उन्होंने बताया था कि उनके पहले कहानी संग्रह का नाम `साधारण जीवन` असद ज़ैदी ने ही उन्हें सुझाया था। यह नाम मधुसूदन आनंद के जीवन पर भी फिट होता है। उन्हें असाधरण से पदों पर रहकर भी साधारण जीवन जीने की अदा आती थी।

हाँ, मधुसूदन आनंद से एक बात या कहूँ एक शिकायत के बारे में बात करने की इच्छा बनी रही लेकिन यह हो न सका। मेडिकल कॉलेजों ख़ासकर एम्स में आरक्षण के विरोध में सत्याग्रह के नाम पर सवर्ण स्टूडेंट्स ने बवाल काट रखा था। `नवभारत टाइम्स` का फ्रंट पेज इसी कथित सत्याग्रह की ख़बर से सहानुभूतिपूर्वक सजाया गया था। यही अख़बार की नीति थी, यही अख़बार में काम करने वाले सवर्ण समूह की मानसिकता थी।

अचानक सम्पादक के कमरे से हाथ से लिखा एक छोटा सा नोट आया जिसे जल्दी से टाइप करके बॉक्स में लगाया गया। इसमें सत्याग्रह के गाँधी कनेक्शन के बारे में जानकारी दी गई थी। हो सकता है, उनका इरादा कन्ट्रास्ट पैदा करना रहा हो लेकिन यह नोट इस तरह तो कतई नहीं था कि मेडिकल छात्रों के बवाल पर लानत जाती, उलटे गाँधी के नाम से उसे प्रमाणिकता सी मिलती महसूस होती थी। वे यह न भी लिखते तो पेज छूट ही रहा था। यह बात मुझे हमेशा अखरती रही।

बेशक, मधुसूदन आनंद सेकुलर इंसान थे। फरवरी 2024 में रामभद्राचार्य को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने वाली निर्णायक सूची में शामिल कुछ सेकुलर माने जाने वाले जानकी प्रसाद शर्मा, प्रफुल्ल शिलेदार, हरीश त्रिवेदी जैसे लोगों में वे भी थे, बतौर `ज्ञानपीठ` निदेशक। यह भी लगता रहा कि आर्थिक कारणों से `ज्ञानोदय` छोड़ पाना उनके लिए संभव न रहा हो। आज पढ़ा कि वे अवैतनिक सेवा देने की अपनी शर्त पर वहाँ थे तो अफ़सोस और ज़्यादा हुआ।

(धीरेश सैनी वरिष्ठ पत्रकार और साहित्य आलोचक हैं।)

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