पंकज बिष्ट आज 80 साल के हो गए हैं और जैसा कि सिद्धार्थ रामू ने लिखा है, इसी वर्ष समयांतर के प्रकाशन के 25 साल भी पूरे हो रहे हैं। इन 25 सालों में पंकज बिष्ट और समयांतर की पहचान आपस में इस तरह घुल-मिल गई हैं कि एक की शख़्सियत की बात करना चाहें तो दूसरी उसमें शामिल हो जाती है।
पंकज बिष्ट से मेरी पहली मुलाक़ात जुलाई 1999 के आसपास करनाल के पाश पुस्तकालय में हुई थी। मैं वहाँ अमर उजाला अख़बार का ब्यूरो चीफ़ हुआ करता था। पंकज बिष्ट की पहचान हिन्दी के एक बड़े उपन्यासकार की थी और लेकिन दरवाज़ा, उस चिड़िया का नाम आदि उनके उपन्यास मैंने पढ़े भले ही न हों पर उनके बारे में जो पढ़ा था, मुझ साहित्य-प्रेमी के मन में उनका जादू था। उस दिन वे और असग़र वजाहत युवाओं की एक कहानी प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल के रूप में करनाल आए थे। रमेश टामक की कहानी को पहले और मंजु गुप्ता की कहानी को दूसरे पुरस्कार के लिए चुना गया था।
वे नौ-दस युवा कहानीकार और मैं रिपोर्टर इन दोनों वरिष्ठ कथाकारों से बातें किए जा रहे थे। जहाँ तक मुझे याद है कि मंजु शायद जाति को लेकर सवाल दर सवाल कर रही थीं। असग़र इस बातचीत को लेकर उत्साहित नज़र नहीं आ रहे थे और पंकज की सवालों से हटने में दिलचस्पी नहीं थी। आख़िर असग़र उन्हें बाहर लाकर गाड़ी में बैठ गए। मैं उनके कार में बैठने के बाद भी सवाल करने लगा और पंकज तवज्जो देने लगे तो असग़र बोले, चलिए अब, भूक लगी है, खाना खाना है। मैंने यूँ ही हँसते हुए कहा कि हिन्दी की दिक्कत यही है कि उसके लेखकों को भूक ज़्यादा ही लगती है। पंकज बिष्ट इस पर ज़ोर से हँसते हुए विदा हुए।
यही वह वक़्त था जब पंकज बिष्ट समयांतर पत्रिका का पुनर्प्रकाशन (असल में तो क़ायदे से शुरुआत ही) करने जा रहे थे। लिखने-पढ़ने और साहित्य-सम्पादन से ही जुड़ी एक बेहतरीन सरकारी नौकरी और साहित्यिक करियर छोड़कर कोई क़ामयाब साहित्यकार ख़ुद को एक वैचारिक अभियान के वास्ते समर्पित करने जा रहा हो, इसके उदाहरण कम ही मिलते हैं। समयांतर पर डॉक्यूमेंटरी बना रहे भारत इस लिहाज़ से उनके साथ अरुंधति को याद किया करते हैं जो अपने पहले ही नोवेल के लिए बुकर प्राइज़ पाने के बावजूद वैचारिक लेखन और प्रतिरोध के मैदान में जुट गई थीं।
समयांतर का मुसलसल निकलते जाना और एक मेयार पर क़ायम रहना किसी अचम्भे से कम नहीं है। एक मुश्किल दौर की देश और दुनिया की प्रतिरोध की और सांस्कृतिक व वैचारिक अभियानों की गवाह और विश्लेषक और मार्गदर्शक इस पत्रिका के महत्व पर लगातार बातें होती रही हैं। फ़िलहाल मुझे फ़ौरी तौर पर यह टिप्पणी लिखने की ललक पत्रकार-विचारक उर्मिलेश के ताज़ा लेख से हासिल हुई है। समयांतर की एक ख़ासियत यह है कि वह हिन्दी की बहुत सी दूसरी पत्रिकाओं की तरह साहित्यवाद में गर्क़ नहीं है। साहित्य और संस्कृति की कैरियरवादी प्रगतिशील दुनिया में वह गाहे-बगाहे दख़ल ज़रूर करती है। ख़ासकर तब, जब प्रगतिशीलता का सिर उसके ठेकेदार किसी दक्षिणपंथी अभियान के पाँवों में झुकाने पर आमादा हों।
पंकज बिष्ट या उनकी पत्रिका के ऐसे कई हस्तक्षेप मुझे याद हैं। एक मिसाल के तौर पर जब वाम सांस्कृतिक संगठनों के पदाधिकारी उत्साह के साथ ओम थानवी के नेतृत्व में अज्ञेय की पुनर्प्रतिष्ठा के अभियान में शामिल हो रहे थे और यहाँ तक कि वाम की तरफ़ से अज्ञेय को देखने के नज़रिये को लेकर माफ़ी भी मांग रहे थे, समयांतर ने दो लेख प्रकाशित किए थे।
इनमें मंगलेश डबराल का लेख धैर्य के साथ तर्क रखते हुए प्रतिवाद कर रहा था तो असद ज़ैदी का लेख वाम के नाम पर की जा रही करतूतों पर एक नैतिक गुस्से से लिखा गया झन्नाटेदार तमाचा था। इन लेखों का असर यह हुआ कि एक तो उस अभियान में वाम के नाम पर दिखाए जा रहे उत्साह पर रोक लग गई और इससे भी ज़्यादा यह कि पुरानी बातें भूल रहे युवाओं को पता चला कि अज्ञेय का एक पक्ष यह भी है।
मैं समयांतर में छपे अपने ऐसे कुछ लेखों का भी ज़िक्र करता जिन्हें हिन्दी की किसी दूसरी पत्रिका में जगह मिलने वाली नहीं थी। फ़िलहाल मेरी मुराद उस ऐतिहासिक लेख को याद करना है जिसमें आए सर्वज्ञात तथ्य को उर्मिलेश को ही रखना था और उसे समयांतर को ही छापना था। आख़िर मुहब्बत के लिए कुछ ख़ास दिल मख़सूस होते हैं।
समयांतर के नवंबर 2013 अंक में छपे इस लेख में उर्मिलेश ने लिखा था, “एक दिन मैं किसी क्लास से निकलकर जा रहा था कि चेयरमैन आफिस के एक क्लर्क ने आकर कहा कि डा. नामवर सिंह आपको चैम्बर में बुला रहे हैं। मैं अंदर दाख़िल हुआ तो देखा कि नामवर जी के साथ केदार जी भी वहां बैठे हुए हैं। नामवर जी ने बड़े प्यार से बैठने को कहा। पहले थोड़ी बहुत भूमिका बाँधी, ‘ आप तो स्वयं वामपंथी हो और यह जानते हैं कि आप और हमारे जैसे लोगों के लिए जाति-बिरादरी के कोई मायने नहीं होते। पर भारतीय समाज में सब किसी न किसी जाति में पैदा हुए हैं। आप तो ठाकुर हो न?’ मैंने कहा, ‘नहीं।’ एक शब्द का मेरा जवाब सुनकर नामवर जी और केदार जी शांत नहीं हुए। अगला सवाल था, ‘फिर क्या जाति है आपकी, हम यूं ही पूछे रहे हैं, इसका कोई मतलब नहीं है।’ मैंने कहा, मैं एक गरीब किसान परिवार में पैदा हुआ हूं।
पर दोनों को इससे संतोष नहीं हुआ तो मुझे अंततः अपने किसान परिवार की जाति बतानी पड़ी। आखिर गुरुओं को कब तक चकमा देता! जाति-पड़ताल में सफल होने के बाद नामवर जी ने कहा, ‘ अच्छा, अच्छा, कोई बात नहीं। जाइए, अपना काम करिए।’ बीच में केदार जी ने भी कुछ कहा, जो इस वक्त वह मुझे बिल्कुल याद नहीं आ रहा है। ऐसा लगा कि दोनों गुरुदेवों का जिज्ञासु मन शांत हो चुका है। इस घटनाक्रम से मैं स्तब्ध था। जेएनयू में अब तक किसी ने भी मेरी जाति नहीं पूछी थी। अपने बचपन में पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में लोगों को किसी अपरिचित से उसका नाम, गांव और जाति आदि पूछते देखा-सुना था।
मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मेरी जाति पूछकर या जानकारी लेकर किसी को क्या मिल जाएगा या उसका कोई क्या उपयोग कर सकेगा? मैं चकित था कि जेएनयू के दो वरिष्ठ प्रोफेसरों की अचानक मेरी जाति जानने में ऐसी क्या दिलचस्पी हो गई! नामांकन के दौरान मेदिनीपुर वाले मिसिर जी की वह खुराफात शायद वर्षों बाद डा. नामवर सिंह जैसे ‘दिग्गज मार्क्सवादी आलोचक’ के ‘कन्फ्यूजन’ का कारण बनी।”
उर्मिलेश का यह पूरा लेख जिसने नहीं पढ़ा, उसे ढूंढ़ कर पढ़ना चाहिए। निजी बातचीत में कितने वामपंथी लेखक जेएनयू के अपने गुरु या अध्यापक के कारनामे बताते मिल जाएंगे लेकिन सार्वजनिक भाषणों और लेखों में मुद्रा गुरुजी प्रणाम की ही रहेगी। दिलचस्प यह है कि नामवर के सताये बाज़ ऐसे लोग भी हैं जिनका ज़िक्र उर्मिलेश ने किया है और वे इस लेख के आने के कुछ सालों बाद नामवर सिंह को जातिवादी न होने की सनद ज़ारी करते पाए जाते हैं। मसलन, कुलदीप कुमार ने नामवर सिंह के विरोध में अपने लिखे को प्रमाण की तरह पेश करते हुए दावा किया -लेकिन वे जातिवादी नहीं थे।
रामजन्भूमि शिलान्यास समारोह की बेला के उस उत्साह के माहौल में पुरुषोत्तम अग्रवाल ने भी अपने गुरुवर के लिए यही सर्टिफिकेट दिया और उनकी रौशनी में तुलसी ग्रंथ लिखने का अहद जताया। हद तो यह कि राजेश जोशी भी नामवर सिंह के जातिवादी न होने का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने में पीछे नहीं रहे। जाहिर है कि तमाम शिकायतों और शिकवों के बावजूद किसी सवर्ण लेखक को उस जातिवाद का अहसास कैसे हो सकता है जो किसी शूद्र या दलित को कराया जाता है। और यह कि नामवर अंतत: हिन्दी उद्योग में सकल सवर्ण वर्चस्व सुनिश्चित रखने की गारंटी थे और प्रगतिशील सवर्ण समाज भी उनका आभारी रहना ही था।
तो बात यह कि पंकज बिष्ट हिन्दी के बड़े उपन्यासकार होने के बावजूद समयांतर शुरू करने के साथ इस हिन्दी उद्योग से किसी प्रमोशन-डिमोशन हासिल होने की परवाह से बहुत आगे जा चुके थे। गो के वे पहले ही इस उद्योग के संचालकों को पर्याप्त ख़फ़ा कर चुके थे और उनकी किताबों की ख्याति पाठकों के बूते जीवित रहनी थी।
आलोचकों की सूची में उनका ज़िक्र तब भी नहीं होता था, समयांतर शुरू होने पर इस निषेध के लिए और सुविधा हो गई। बहरहाल, हिन्दी की वर्चस्ववादी दुनिया की लिहाज़दारी से परहेज़ ने पंकज बिष्ट की पत्रिका को यह ख़ासियत बख़्शी कि वे उन लेखों को छाप सके जिन पर बात करना भी वर्जित रहता है। असहमति का साहस और सहमति का विवेक वाली इस अदा से हज़ार दुश्मन पैदा होते हैं, हज़ार प्रशंसक; सबसे बड़ी चीज़ पैदा होती है विश्वसनीयता। पंकंज बिष्ट और घाटे में चलने वाली उनकी पत्रिका का यही सरमाया है।
(पंकज बिष्ट से निरंतर झिकझिक और शिकायतों पर फिर कभी।)
(धीरेश सैनी पत्रकार और साहित्यालोचक हैं।)