शायद आप ने भी बेबी मंकी ‘पंच’ का वायरल वीडियो देखा हो! यह कहानी जापान के एक चिड़ियाघर की है। यहीं बेबी मंकी जिसे पंच नाम दिया गया, का जन्म हुआ। उसका जन्म उसकी मां के लिए तकलीफदेह रहा। यह देखा गया कि मां अपने बच्चे में रूचि नहीं ले रही है। पंच अकेला पड़ गया। उसके भोजन की व्यवस्था चिड़ियाघर का रखरखाव करने वाले कर्मचारियों ने करनी शुरू की।
पंच जब भी अन्य बच्चों के साथ खेलने की कोशिश करता, बड़े बंदर उसे धमकाते, कई बार पीटते थे और भगा देते थे। पंच का खयाल करने वाले एक कर्मचारी ने उसे ओरांगउटांग का साॅफ्ट टाॅय दिया। वह उसके साथ खेलने लगा और उसी के साथ ज्यादा समय गुजारने लगा। वह जहां भी जाता, उसे साथ लेकर जाता। वह उसी के साथ सो जाता था। उसे एक दोस्त मिल गया था। पंच उसके साथ खेलते हुए धीरे-धीरे अन्य बंदरों के साथ घुलने-मिलने लगा और अब उसे वे स्वीकारने लगे हैं।
पंच की यह कहानी आज के समाज की त्रासद भरी जिंदगी के साथ जुड़ जाती है। पूंजी की बेरहम दुनिया में आपसी रिश्तों में पड़ी गहरी दरारें और टूटन, अलगाव, अकेलापन, असुरक्षा, हिंसा का तत्व आज के समाज में पसरता चला गया है। सामूहिकता का क्षरण अस्तित्व पर सवाल खड़ा करता है। बेबी मंकी पंच की कहानी इस पूंजीवादी समाज की हकीकत को प्रदर्शित करने वाले एक ऐसे नाटक की तरह सामने आया जो पूरी जीवतंता के साथ खेला जा रहा था। बंदरों के समूह में बेबी मंकी इसका नायक बन जाता है।
वह इस बेरहम दुनिया से लड़ता हुआ दिखता है और धीरे-धीरे अपने समूह का हिस्सा बन जाता है। वह समूह जो इसे ठुकरा रहा था, धीरे-धीरे उसे अपनाने लगता है। जब एक बड़ा बंदर उसके बालों से जूँ निकालने के लिए उसके सिर को अपने हाथ में लेता है, तब उस चिड़ियाघर में आये दर्शकों के होठों से सिसकारियां निकल पड़ीं, लोगों की आखें चमक उठीं। यह उनकी अपनी चाहतों की ही दुनिया थी जो सामने घटित होते हुए दिख रही थी।
मानव समाज की विकास यात्रा में डार्विन की खोज इन्हीं संदर्भों में महत्वपूर्ण हो उठती है। बंदर समूह में जीने वाला प्राणी है। सामूहिकता एक ऐसी नैसर्गिक प्रवृत्ति है जो इंसानों तक आई। लेकिन, भावों का जो विकास है वह मानव समाज में अपने पूर्ववर्तियों से अलग तरह से विकसित हुआ। खासकर, जब उसने प्रकृति पर अपनी सहज निर्भरता को तोड़ना शुरू किया और वह प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने की ओर गया।
प्रकृति के नियमों की गुलामी से बाहर आकर उसने अन्य सभी जीवों से खुद को अलग करना शुरू किया और एक सापेक्षिक आजादी हासिल की। यहीं से मनुष्य अपने नैसर्गिक भावों से मुक्त हुआ और भावों की नई सर्जना का संसार बनाया। ये भाव हमारी सभ्यता और संस्कृति के निर्माण में विकसित होते गए। इसका यह अर्थ नहीं था कि प्रकृति के सभी जीव, जंगल, पहाड़, नदी, ताल आदि से वह अलग हो गया, मौसम, सूर्य, ग्रह और नक्षत्रों से दूर हो गया।
ये उसकी भाव अभिव्यक्तियों के बिम्ब बन गये और जीवन के अजस्र स्रोत भी। यह इंसान ही था जिसने खुद की मूर्तियां बनाईं और अपने जैसा ही ईश्वर बनाया। इसने जीवों और पेड़ों को भी ईश्वर बनाया और उसे फिर से रचा।
बेबी मंकी पंच के जीवन में मानवीय हस्तक्षेप जल्दी ही अपने समाज की पुर्नरचना और एक इच्छित समाज का एक मूर्त रूप बनकर सामने आ गया। यह उसका अपना धड़कता दिल था और वह आत्मा जो अलगाव, टूटन, अकेलापन, असुरक्षा, हिंसा से कमजोर और अक्षम होने के अहसास से भर गया था, लेकिन जिसमें जीवन की उम्मीद से भरा धड़कता दिल बचा हुआ था।
इस जीवन की आकांक्षा से भरा हुआ वह बेबी मंकी के साथ एकाकार हो गया और उसकी हर हरकतों के साथ खुद को जोड़ने लगा। चिड़ियाघर में बेबी मंकी पंच को देखने वालों का तांता लग गया, उसकी हर हरकतों को वह खुद की भावनाओं से जोड़कर लिखने लगा, बोलने लगा। सोशल मीडिया में वह तेजी से देखे जाने वाला एक दृश्य बन गया।
सामाजिक जीवन की यह चाह ही वह मूल बात है जिसमें बेबी मंकी अपना सा लगने लगा। पशु और इंसान के बीच के रिश्ते धरती पर जीवन की कहानी के साथ-साथ उसके विलगाव और लगाव का भी इतिहास है। इंसान ने जो बिम्ब और प्रतिमानों की पहल का गठन किया उसमें उसे अपने साथ लिया। जीवन के यह वे रिश्ते थे जिसके एन्थ्रोपाॅलाजिकल अध्ययन ने डार्विन को मनुष्य की उत्पत्ति और उसके पीछे जीवन के आरम्भिक छोर को पकड़ने में सहायक बने।
इंसानों के गठन का इतिहास और ज्ञान-चेतना का अध्ययन कार्ल मार्क्स और एंगेल्स को उस आदिम साम्यवाद की अवधारणा की ओर ले गया जहां मनुष्य एक खांटी किस्म का सामाजिक जीवन जी रहा था। यही वह सूत्र था जिसने साम्यवाद के उन वैज्ञानिक नियमों को खोलकर रख दिया और पूंजीवादी समाज में मार्क्सवाद एक उम्मीद बनकर सामने आया।
आज दुनिया में बाजार और मुनाफे की होड़ का जो खूनी मंजर दिखाई दे रहा है, लूट और कब्जा करने, दूसरों को अपने गिरफ्त में ले लेने का जो साम्राज्य दिखाई दे रहा है और युद्ध के धमाकों में इंसानियत को शर्मसार करने वाली हत्याएं सामने आ रही हैं, ग़ज़ा की सड़कों से लेकर अमेरीका और भारत की सड़कों पर आम नागरिकों के साथ जिस तरह की अमानवीय कारनामे किये जा रहे हैं, जिस तरह से फिलीस्तीन के जन्मे और अजन्मे बच्चों को मार डाला गया और इन सबके बीच वैश्विक मैत्री और गठजोड़ के नाम पर ठंडी सिहरन पैदा करने वाली नीतियों की उद्घोषणाएं हो रही हैं, वे पूरे मुनष्य समाज के लिए जीवित रहने के मूल अधिकार के लिए चुनौतियां हैं।
बेबी मंकी पंच के प्रति पैदा हुई भावुकता की परतों के नीचे मनुष्य होने की आकांक्षाओं का एक पूरा संसार है। इसमें वह गहरी चाह है जिसमें मनुष्य अलगाव से बाहर आकर एक सामाजिक जीवन का हिस्सा बन जाना चाहता है। बेबी मंकी पंच के प्रति पैदा हुई भावुकता मनुष्यता का एक शानदार पाठ है। जरूरत है इस भावुकता के नीचे हिलोरें मारती वे उन आकांक्षाओं से रूबरू होने की। सामाजिकता मनुष्य के जीवन की वह आधारशिला है जहां से वह बेहतर इंसान बनना शुरू करता है।
(अंजनी कुमार लेखक व टिप्पणीकार हैं।)