मध्य-पूर्व एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव की स्थिति में खड़ा दिखाई दे रहा है। इज़राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा ईरान पर संयुक्त सैन्य कार्रवाई और उसके जवाब में ईरान की प्रतिकारात्मक कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। यह घटना केवल एक सैन्य टकराव नहीं बल्कि लंबे समय से बनते आ रहे भू-राजनीतिक तनाव का विस्फोट है।
इस संघर्ष को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ को देखना आवश्यक है। ईरान और अमेरिका के संबंध 1979 की ईरानी क्रांति के बाद से ही तनावपूर्ण रहे हैं। क्रांति के बाद ईरान में पश्चिम समर्थित शासन का अंत हुआ और एक इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई जिसने अमेरिकी प्रभाव को चुनौती दी। तब से दोनों देशों के बीच अविश्वास, आर्थिक प्रतिबंध और राजनीतिक टकराव का सिलसिला चलता रहा है।
इज़राइल और ईरान के बीच भी संबंध लंबे समय से शत्रुतापूर्ण रहे हैं। इज़राइल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है। इज़राइल का तर्क यह है कि यदि ईरान परमाणु हथियार हासिल कर लेता है तो मध्य-पूर्व का शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है। इसी कारण इज़राइल वर्षों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए कूटनीतिक दबाव, गुप्त अभियानों और सैन्य विकल्पों की वकालत करता रहा है।
हाल के घटनाक्रम की विशेषता यह है कि यह हमला उस समय हुआ जब ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत चल रही थी। स्विट्ज़रलैंड के शहर जिनेवा में वार्ताओं के कई दौर हो चुके थे और कूटनीतिक समाधान की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी। ऐसे समय में सैन्य कार्रवाई ने यह संकेत दिया कि क्षेत्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर अब धैर्य और संवाद की जगह शक्ति-प्रदर्शन अधिक प्रभावी माध्यम बनता जा रहा है।
इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का यह बयान कि “यदि अभी ईरान को नहीं रोका गया तो वह अजेय हो जाएगा”, इस मानसिकता को स्पष्ट करता है। यह दृष्टिकोण सुरक्षा-आधारित रणनीति पर आधारित है जिसमें संभावित खतरे को वास्तविक खतरा मानकर पहले ही उसे समाप्त करने की कोशिश की जाती है। दूसरी ओर ईरान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है और अपने बचाव के अधिकार पर जोर देता है।
इस संघर्ष का एक महत्वपूर्ण आयाम क्षेत्रीय शक्ति संतुलन भी है। ईरान पिछले दो दशकों में मध्य-पूर्व में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरा है। इराक, सीरिया और लेबनान जैसे देशों में उसकी राजनीतिक और सैन्य उपस्थिति ने उसे क्षेत्रीय राजनीति का केंद्रीय खिलाड़ी बना दिया है। इससे इज़राइल और उसके सहयोगी देशों की चिंता बढ़ी है।
मध्य-पूर्व की राजनीति में गठबंधनों का जाल भी इस संकट को जटिल बनाता है। एक ओर अमेरिका और इज़राइल का मजबूत रणनीतिक गठबंधन है, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ रूस और कुछ अन्य देशों के संबंध अपेक्षाकृत घनिष्ठ हैं। इस कारण किसी भी क्षेत्रीय युद्ध के वैश्विक संघर्ष में बदलने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
इस टकराव का एक बड़ा प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। मध्य-पूर्व विश्व के सबसे बड़े तेल भंडारों का क्षेत्र है और खाड़ी क्षेत्र के समुद्री मार्ग अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यदि संघर्ष लंबा चलता है या समुद्री मार्ग बाधित होते हैं तो तेल की कीमतों में तेज उछाल और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता पैदा हो सकती है।
मानवीय दृष्टि से भी यह संघर्ष अत्यंत गंभीर है। किसी भी सैन्य टकराव का सबसे बड़ा बोझ आम नागरिकों को उठाना पड़ता है। शहरों में हुए हमलों, विस्फोटों और मिसाइलों के कारण भय और असुरक्षा का वातावरण बनता है, जिससे बड़े पैमाने पर विस्थापन और मानवीय संकट की संभावना बढ़ जाती है।
इस पूरे संकट का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कूटनीति अभी भी प्रभावी माध्यम है या सैन्य शक्ति ही निर्णायक साधन बनती जा रही है। यदि वैश्विक शक्तियाँ संवाद और समझौते के रास्ते से हटकर सैन्य समाधान को प्राथमिकता देती हैं, तो यह केवल मध्य-पूर्व ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
इसलिए वर्तमान संकट केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था की परीक्षा भी है जो शांति, संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों पर आधारित होने का दावा करती है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि विश्व समुदाय इस संकट को शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में ले जा पाता है या यह टकराव और व्यापक संघर्ष का रूप ले लेता है।
(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)