पिछले दिनों बेंगलुरु में एक रिटायर्ड शख्स ने खुद अपने हाथों पत्नी को मौत के घाट उतार दिया। बताते हैं कि इसके पीछे उस व्यक्ति की यह चिंता थी कि उसके बाद पत्नी की देखभाल कौन करेगा? दोनों की एक बेटी है जो अमेरिका में रहती है। यानी अपने शहर में उन दोनों ने अपने इर्दगिर्द जो दुनिया बुनी थी, उसमें कोई व्यक्ति ऐसा नहीं था जिसे वे अपने करीब महसूस करते हों। क्या यह महसूस करने की हमारी घटती क्षमता की कहानी है या वाकई हमारे आसपास की दुनिया भी हमसे दूर होती जा रही है?
जन्म के साथ हमें एक भरी-पूरी दुनिया मिलती है। सवाल है, हम उस दुनिया से किस तरह इंगेज होते हैं, कैसे उसमें अपने लिए स्पेस बनाते हैं, उस स्पेस को सुविधाजनक बनाने के लिए उसमें जरूरी तोड़फोड़ करते हैं और खुद अपने भीतर बदलाव करते हुए अपने आप को उस दुनिया के अनुरूप ढालते हैं। इस क्रम में हमारी यह दुनिया बड़ी भी होती जाती है, पुराने लोग पीछे छूटते हैं, नए रिश्ते उनकी जगह लेते रहते हैं। क्या इस प्रक्रिया को ठीक से न समझने, सही ढंग से संचालित न कर पाने की वजह से हम अकेलेपन के दलदल की ओर बढ़ते जाते हैं?
बचपन से किशोरावस्था और वहां से युवावस्था की ओर बढ़ते हुए हममें से ज्यादातर का टकराव पारिवारिक रिश्तों के बने-बनाए ढांचे से होता है। तब दोस्तों की एक नई दुनिया बन रही होती है जो हमें ज्यादा लोकतांत्रिक लगती है, ज्यादा स्पेस देती है। उसी टकराव से जूझती एक लड़की का बयान था, ‘मेरी मां हमेशा डराती रहती है यार। कहती है, तुम दोस्तों के चक्कर में रिश्तेदारों से मिलना छोड़ देती हो। लेकिन दोस्त नहीं, लाइफ में रिश्तेदार ही काम आते हैं। क्राइसिस में वही हेल्प करते हैं। मैं कहती हूं मुझे नहीं चाहिए ऐसे रिश्तेदारों की हेल्प।’
इसे एक टीनेज लड़की की तात्कालिक झुंझलाहट कह सकते हैं। लेकिन यही झुंझलाहट धीरे-धीरे रिश्तों को टूटन की ओर ले जाती है। हालांकि कभी उनमें जरूरी बदलाव का कारण बनकर रिश्तों की उमर लंबी भी कर देती है। इसलिए इस तरह के टकरावों या इनसे उपजी झुंझलाहट को कम से कम अकेलेपन का जिम्मेदार तो नहीं माना जा सकता, खासकर उस भीषण, त्रासद अकेलेपन का जिसकी आशंका भी किसी को अपने प्रियजन की हत्या को मजबूर कर दे।
इस अकेलेपन के कारक चाहे हम स्मार्टफोन की स्क्रीनटाइम को मानें या फिजिकल वर्ल्ड में वास्तविक रिश्तों के कमजोर पड़ते धागों को – आखिरी जिम्मेदारी तो हमारी ही बनती है। हम खुद को, अपने जीवन को, अपनी आकांक्षाओं को क्या रूप और कैसी दिशा देते हैं यह एक अहम सवाल है। यह भी कि सामूहिक तौर पर जो दुनिया हम बना रहे हैं, उसमें विश्वास का इतना बड़ा संकट क्यों है कि अपने बेहद करीबी लोगों के घेरे से बाहर सब कुछ अनिश्चित अंधकारमय दिखता है, उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती?
और आखिर में, क्या एकांत की हमारी अवधारणा अकेलेपन से जूझने में कुछ काम आ सकती है? अकेले चलने की हिम्मत हमारी राह कुछ आसान कर सकती है? संदर्भ चाहे अलग हो, लेकिन गुरुदेव टैगोर ने कुछ सोचकर ही कहा होगा कि जब कोई साथ न दे, कोई तुम्हारी आवाज न सुने तो अकेले ही चल पड़ो।
(प्रणव प्रियदर्शी वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं। हाल में उनकी दो किताबें आई हैं, “चौराहों पर चौराहे” और रुचिरा गुप्ता की “आई किक एंड आई फ्लाई” का अनुवाद “मैं लड़ी और उड़ी”।)