दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन का संकट

डीटीसी की स्थापना

1958 में दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) की स्थापना की गई। इससे पहले यह दिल्ली ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग (डीटीयू) के नाम से संचालित होती थी। 1971 में इसे पूरी तरह निगम का दर्जा मिला। इसके साथ इसे कई प्रकार की स्वायत्तता भी प्राप्त हुई- जिसके तहत डीटीसी अपना बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स रख सकती है। बसें खरीद सकती है, कर्मचारियों की नियुक्ति कर सकती है। सरकार से अनुमति लेकर किराया नीति लागू कर सकती है तथा वित्तीय सहायता ले सकती है। राज्य सरकार निगम का वित्तीय प्रबंधन कर उसके घाटे की भरपाई कर सकती है।

निगम का दायित्व है कि बसें फिटनेस मानकों पर खरी उतरें, चालक और परिचालक प्रशिक्षित हों तथा यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए।

रोड ट्रांसपोर्ट एक्ट 1950 की धारा 8 के अनुसार जनता को पर्याप्त, किफायती और गुणवत्तापूर्ण परिवहन सेवा प्रदान करना अनिवार्य है। इसका अर्थ स्पष्ट है कि परिवहन सेवा का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि जनता को सुविधा देना है।

वर्तमान में डीटीसी का बड़ा हिस्सा घाटे के नाम पर निजी हाथों में सौंप दिया गया है। मेंटेनेंस का पूरा विभाग आज निजी कंपनियों के पास है। इसके अतिरिक्त क्लस्टर (डीआईएमटीएस) के तहत भी बसों का संचालन निजी हाथों में दे दिया गया है। निजीकरण के कारण चालक-परिचालकों को समुचित प्रशिक्षण देने के बजाय कोरम पूरा कर ड्यूटी पर लगा दिया जाता है। इसका परिणाम यह है कि यात्रियों की सुरक्षा, जो निगम की प्राथमिकता थी, वह कमजोर पड़ गई है।

बसों को आड़ी-तिरछी खड़ी करना, बीच सड़क में बस रोककर यात्रियों को चढ़ाना-उतारना, बस स्टैंडों पर बसें न रोकना। समय पर संचालन न करना और यात्रियों के साथ अभद्र व्यवहार की शिकायतें आम हो चुकी हैं। यात्रियों की सुरक्षित और सुगम यात्रा अब असुरक्षित और कठिन बन गई है। सार्वजनिक और सुलभ सुविधा प्रदान करना सरकार की जिम्मेदारी है।

यात्रियों पर आर्थिक बोझ 

बसों में यात्रियों की सुरक्षा और व्यवस्था के लिए केजरीवाल सरकार ने मार्शल नियुक्त किए थे, जिनकी जगह अब होमगार्ड ने ले ली है। वे प्रायः एक सीट पर बैठे मोबाइल चलाते या ऊँघते हुए दिखाई देते हैं। 

बसों की कमी और अनियमितता के कारण बसों में जेबकतरे सक्रिय रहते हैं। यात्रियों की जेब प्रत्यक्ष रूप से जेबकतरे काटते हैं, तो अप्रत्यक्ष रूप से डीटीसी भी आर्थिक बोझ बढ़ाती है। 40 और 50 रुपये के दैनिक पास सभी बसों में मान्य नहीं हैं। जब कोई यात्री अनजाने में ऐसी बस में चढ़ जाता है जहाँ पास मान्य नहीं है (जिसकी पहचान आम लोगों के लिए आसान नहीं), तो चेकर द्वारा 200 रुपये का जुर्माना लगा दिया जाता है।

मासिक पास, जिसकी कीमत 815 और 1015 रुपये है, खो जाने या जेब कट जाने की स्थिति में दोबारा जारी नहीं किया जाता। जबकि डीटीसी के पास यात्रियों का रिकॉर्ड उपलब्ध होता है और उचित प्रक्रिया के तहत पहचान कर पास पुनः जारी किया जा सकता है। इसके बावजूद पास पर स्पष्ट लिखा होता है कि नुकसान होने पर दोबारा जारी नहीं किया जाएगा।

जो यात्री सुविधा और बचत के लिए पास बनवाते हैं, उन पर दोहरी मार पड़ती है। 40 रुपये का दैनिक पास और 815 रुपये का मासिक पास अब लगभग अमान्य स्थिति में हैं, क्योंकि दिल्ली में अधिकांश बसें एसी हो चुकी हैं, जिनमें ये पास मान्य नहीं हैं। मजबूरीवश यात्रियों को 50 रुपये का दैनिक और 1015 रुपये का मासिक पास बनवाना पड़ता है।

गुलाबी टिकट

29 अक्टूबर 2019 से महिलाओं को केजरीवाल सरकार द्वारा गुलाबी टिकट योजना के तहत निःशुल्क यात्रा की सुविधा दी गई। प्रति टिकट सरकार डीटीसी को 10 रुपये का भुगतान करती है।

14 फरवरी 2022 को नवभारत टाइम्स में प्रकाशित समाचार के अनुसार, वर्ष 2021 में लगभग 24 करोड़ महिलाओं ने इस योजना के तहत यात्रा की, अर्थात सरकार ने लगभग 240 करोड़ रुपये खर्च किए। अक्टूबर 2019 से फरवरी 2022 तक सरकार ने इस योजना पर लगभग 484 करोड़ रुपये व्यय किए। सरकार द्वारा इतनी कम धनराशि खर्च करने के बावजूद महिलाओं पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टिट्यूट के अध्ययन में पाया गया कि महिलाओं ने बताया कि उन्हें 500 से 2500 रुपये तक की बचत हुई और घरेलू खर्च में लगभग 8 प्रतिशत की कमी आई। 62 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि उन्होंने काम और शिक्षा के लिए इस मुफ्त बस योजना का लाभ उठाया। अध्ययन में यह भी पाया गया कि इस योजना के कारण महिलाओं की स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार तक पहुंच में वृद्धि हुई।

अब दिल्ली सरकार द्वारा ‘सहेली पिंक स्मार्ट कार्ड’ लॉन्च किया जा रहा है। इसे 2 मार्च को इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा लॉन्च किया जाएगा। इस स्मार्ट कार्ड का लाभ केवल उन महिलाओं को मिलेगा जिनके पास दिल्ली पते का आधार कार्ड है और जिनकी आयु 12 वर्ष से अधिक है।

इसका अर्थ यह है कि बाहर से आने वाली छात्राएँ, प्रवासी महिला मजदूर और 12 वर्ष से कम आयु की दिल्ली की लड़कियाँ इस योजना के लाभ से बाहर हो जाएँगी। जबकि इन्हीं वर्गों को मुफ्त बस सुविधा की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। अब इसका लाभ मुख्यतः सरकारी दफ्तरों या नियमित नौकरी करने वाली महिलाओं तक सीमित हो सकता है।

यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि इस बदलाव से उन महिलाओं को झटका लगेगा जो अब तक अधिक लाभान्वित हो रही थीं। दिल्ली में पढ़ाई या छोटे-मोटे काम करके अपने परिवार का भरण-पोषण करने वाली महिलाएँ भी अप्रत्यक्ष रूप से टैक्स व्यवस्था में योगदान देती हैं। इन महिलाओं को ‘सहेली पिंक स्मार्ट कार्ड’ योजना से बाहर का रास्ता दिल्ली सरकार द्वारा दिखाया जा रहा है।

इस योजना से महिलाओं की मोबिलिटी और आत्मनिर्भरता पर पड़ने वाले प्रभाव पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता है। इस बदलाव से कार्यस्थलों पर महिलाओं की संख्या में गिरावट आ सकती है। काम की खोज में महिलाओं का निःसंकोच बाहर निकलना बाधित हो सकता है। स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुँच प्रभावित होगी; पहले वे छोटे रोग के लिए भी आसानी से बस पकड़कर अस्पताल पहुँच जाती थीं। शिक्षा पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। एक बस के इंतजार में यात्रा समय ज्यादा होगा। हमें महिलाओं की फ्री बस यात्रा को राजनीतिक चश्मे से देखना नहीं चाहिए।

दिल्ली में बसों की कमी

दिल्ली की जनसंख्या दो करोड़ से अधिक हो चुकी है, लेकिन बसों की संख्या में वृद्धि के बजाय कमी आई है। वर्तमान में लगभग 5336 बसें संचालित हो रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार प्रति एक लाख आबादी पर कम से कम 60 बसें होनी चाहिए। यदि दिल्ली की आबादी 2.5 करोड़ मानी जाए, तो कम से कम 15,000 बसों की आवश्यकता होती है। कई विकसित शहरों, जैसे लंदन और सिंगापुर, में प्रति एक लाख आबादी पर लगभग 100 बसें उपलब्ध हैं। उस मानक के अनुसार दिल्ली को लगभग 25,000 बसों की आवश्यकता होगी।

क्षेत्रफल के आधार पर भी देखा जाए तो प्रति वर्ग किलोमीटर 8-10 बसें होनी चाहिए। दिल्ली का क्षेत्रफल लगभग 1484 वर्ग किलोमीटर है। इस मानक के अनुसार भी कम से कम 15,000 बसें आवश्यक हैं।

बसों की कमी के कारण औसत प्रतीक्षा समय 25-30 मिनट तक पहुँच जाता है। दोपहर 1 से 4 बजे के बीच कई बार यह समय एक से दो घंटे तक हो जाता है। यही समय स्कूलों की छुट्टी या कार्यस्थलों पर शिफ्ट बदलने का होता है। उस दौरान बसों की अनुपलब्धता के कारण बस स्टैंडों और बसों में अत्यधिक भीड़ हो जाती है। कई बार भीड़ देखकर चालक बस नहीं रोकते, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है। लोगों को समय के नुकसान के साथ आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है।

बसों की कमी से लोगों की क्षति के आलावा देश को भी नुकसान झेलना होता है। बच्चे समय से स्कूल नहीं जा पहुँच पाते हैं, लोग थके हाड़े कार्यस्थल पर पहुँचते हैं, महिलाओं-बुजुर्गों की मोबिलिटी प्रभावित होती है।

रोड ट्रांसपोर्ट एक्ट 1950 का उल्लंघन

बसों की कमी के कारण नागरिकों का आवागमन बाधित होता है। शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच प्रभावित होती है। प्रतीक्षा समय अधिक होना, आवश्यक रूट बंद कर देना या विशेष रूटों को प्राथमिकता देना—ये सभी स्थितियाँ परिवहन सेवा के मूल उद्देश्य के विपरीत हैं।

सरकार को निम्नलिखित कदम उठाने की जरूरत:

  • दैनिक पास को सभी बसों में मान्य किया जाए।
  • पास खो जाने या क्षतिग्रस्त होने की स्थिति में रिकॉर्ड के आधार पर पुनः जारी करने की व्यवस्था हो।
  • मुफ्त बस योजना का लाभ व्यापक रूप से सुनिश्चित किया जाए, ताकि गरीब प्रवासी महिलाएँ और छात्राएँ भी लाभान्वित हो सकें।
  • 40 रुपये दैनिक और 815 रुपये मासिक पास की पूर्व न्यूनतम दरों को सभी बसों में मान्यता दी जाए।
  • दिल्ली में बसों की संख्या बढ़ाकर कम से कम 15,000 की जाए।
  • चालक और परिचालकों को उचित प्रशिक्षण दिया जाए।
  • सभी बस स्टॉपों पर बसों का रुकना सुनिश्चित किया जाए।
  • बसें सुबह 5 बजे से रात 11 बजे तक नियमित और सुचारु रूप से उपलब्ध हों।
  • बस स्टैंड पर बसों को सुरक्षित तरीके से किनारे लगाकर यात्रियों को चढ़ाया-उतारा जाए।

(लेखक शोधकर्ता व टिप्पणीकार हैं।)

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