इज़रायल–ईरान जंग : विश्वयुद्ध की आहट और भारत की रणनीतिक परीक्षा

पश्चिम एशिया में इज़रायल और ईरान के बीच खुला सैन्य टकराव एक क्षेत्रीय विस्फोट भर नहीं है; यह उस दीर्घकालिक वैमनस्य का उग्र चरण है जिसकी जड़ें 1979 की ईरानी क्रांति, इज़रायल की सुरक्षा-संवेदनशीलता और अमेरिका–ईरान टकराव में गहरे धंसी हुई हैं। बड़ी चिंता यह है कि क्या यह संघर्ष विश्वयुद्ध का रूप ले सकता है। और उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि आज की वैश्विक संरचनाएँ—सैन्य गठबंधन, परमाणु निरोध, ऊर्जा बाजार, वित्तीय परस्पर-निर्भरता—किस दिशा में संकेत कर रही हैं: उन्माद की ओर या संयम की ओर?

विश्वयुद्ध की संभावना का आकलन केवल मिसाइलों की मारक दूरी से नहीं होता; वह महाशक्तियों की भागीदारी, गठबंधनों की बाध्यताओं और आर्थिक संरचनाओं की सहनशक्ति से तय होता है। पहला उत्तेजक कारक है प्रत्यक्ष सैन्य संलिप्तता। अमेरिका इज़रायल का प्रमुख सुरक्षा साझेदार व निर्णायक सलाहकार है। यदि ईरान के साथ अमेरिका का सीधा टकराव बढ़ता है—खासतौर पर ईरान के परमाणु कार्यक्रम या खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों पर हमलों के मद्देनज़र— तो इस युद्ध का दायरा तेजी से विस्तृत हो सकता है।

दूसरी ओर रूस, जो पहले से ही यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ है, ईरान के साथ सामरिक निकटता बढ़ा चुका है; उधर चीन भी ईरान का बड़ा ऊर्जा खरीदार और आर्थिक भागीदार है। यदि ये शक्तियाँ खुलकर किसी पक्ष में उतरती हैं, तो ध्रुवीकरण तीखा होगा।

दूसरा उत्तेजक कारक समुद्री मार्ग और ऊर्जा अवसंरचना हैं। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। लाल सागर और पूर्वी भूमध्यसागर में सैन्य गतिविधि बढ़ने से जहाज़रानी बीमा, आपूर्ति-श्रृंखला और ऊर्जा कीमतों पर तात्कालिक असर पड़ता है। इतिहास बताता है कि ऊर्जा झटके अक्सर राजनीतिक उग्रता को बढ़ाते हैं। यदि तेल 100–120 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर टिकता है, तो वैश्विक महंगाई और विकास दर पर दबाव बढ़ेगा, जिससे सरकारों के भीतर राजनीतिक अस्थिरता भी बढ़ सकती है।

तीसरा कारक प्रॉक्सी युद्धों का फैलाव है। लेबनान, सीरिया, इराक और यमन जैसे मोर्चों पर सक्रिय गैर-राज्यीय सशस्त्र समूह यदि सीधे टकराव में कूदते हैं, तो संघर्ष बहु-क्षेत्रीय रूप ले सकता है। साइबर हमले, ड्रोन हमले और ऊर्जा ठिकानों पर लक्षित प्रहार पारंपरिक युद्ध की रेखाओं को धुंधला कर देते हैं। ऐसी स्थिति “पूर्ण विश्वयुद्ध” नहीं तो “स्थायी वैश्विक अस्थिरता” अवश्य पैदा कर सकती है।

लेकिन उतने ही महत्वपूर्ण वे कारक हैं जो विश्वयुद्ध के जोखिम को सीमित करते हैं। सबसे बड़ा संयमक तत्व है परमाणु निरोध। अमेरिका, रूस और चीन—तीनों परमाणु महाशक्तियाँ—सीधे टकराव की कीमत जानते हैं। व्यापक युद्ध का अर्थ होगा आर्थिक और मानवीय तबाही, जिसकी राजनीतिक लागत असहनीय है। दूसरा संयमक तत्व वैश्विक आर्थिक परस्पर-निर्भरता है। अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा तीखी है, फिर भी दोनों की अर्थव्यवस्थाएँ गहरे जुड़ी हैं। यूरोप ऊर्जा झटकों के प्रति पहले ही संवेदनशील है। वैश्विक बाजारों का ध्वंस किसी भी महाशक्ति के हित में नहीं।

तीसरा तत्व घरेलू बाध्यताएँ हैं। अमेरिका चुनावी चक्रों, बजटीय सीमाओं और युद्ध-थकान से जूझ रहा है; रूस यूक्रेन में संसाधन झोंक चुका है; चीन आर्थिक मंदी और आंतरिक प्राथमिकताओं से बँधा है। ये सभी व्यापक प्रत्यक्ष युद्ध के प्रति स्वाभाविक हिचक पैदा करते हैं।

इस संतुलन में भारत कहाँ खड़ा है? भारत अपनी कच्चे तेल की ज़रूरतों का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है और उसका बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। तेल की कीमतों में तीव्र उछाल चालू खाते के घाटे, रुपये की स्थिरता और महंगाई पर दबाव डालेगा। एलएनजी आपूर्ति, उर्वरक लागत और समुद्री बीमा प्रीमियम की वृद्धि व्यापक आर्थिक प्रभाव पैदा कर सकती है। खाड़ी देशों में कार्यरत लाखों भारतीयों की सुरक्षा और प्रेषण भी संवेदनशील आयाम हैं।

कूटनीतिक स्तर पर भारत के समीकरण जटिल हैं। इज़रायल रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग का महत्वपूर्ण साझेदार है। ईरान के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंध और चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाएँ मध्य एशिया तक पहुँच का साधन हैं। अमेरिका के साथ भारत की रणनीतिक निकटता बढ़ी है, जबकि रूस अब भी रक्षा सहयोग का स्रोत है। चीन इस संकट को अपने हितों के लिए साधने की कोशिश कर सकता है। ऐसे बहुध्रुवीय परिदृश्य में किसी एक धुरी की ओर स्पष्ट झुकाव अन्य संबंधों पर प्रभाव डालेगा।

यद्यपि प्रत्यक्ष महाशक्ति-टकराव की संभावना अभी सीमित दिखती है, पर बहु-क्षेत्रीय संघर्षों, ऊर्जा झटकों और वित्तीय अस्थिरता का जोखिम वास्तविक है। यह 1914 या 1939 जैसी रेखीय प्रगति वाला युद्ध नहीं होगा; अधिक संभावना है कि संघर्ष कई मोर्चों पर फैलकर दीर्घकालिक अस्थिरता का रूप ले ले।

इस बीच ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के मारे जाने की ख़बर केवल सैन्य प्रकरण नहीं रह गई—यह ईरानी राज्य की वैचारिक आत्मा पर गहरा प्रहार माना जा रहा है। व्याकुल व शोकाकुल जनता प्रतिशोध की मांग पर केंद्रित हो गई है, और इन क्षणों में ईरानी सत्ता प्रतिष्ठान के लिए पीछे हटना राजनीतिक रूप से लगभग असंभव है। भावनात्मक उभार और राष्ट्रीय गौरव का प्रश्न इस संघर्ष को किसी भी हद तक तीखा बना सकता है।

ऐसे में विश्वयुद्ध की आशंका से अधिक महत्वपूर्ण है विश्वव्यवस्था की दिशा। यदि महाशक्तियाँ अपने संयमक तत्वों—आर्थिक परस्पर-निर्भरता, परमाणु निरोध और घरेलू सीमाओं—को प्राथमिकता देती हैं, तो वैश्विक टकराव सीमित रह सकता है। पर यदि उत्तेजना के कारक—ऊर्जा अवरोध, प्रॉक्सी विस्तार और गठबंधन-प्रतिबद्धताएँ—हावी होते हैं, तो दुनिया एक दीर्घकालिक अस्थिर युग में प्रवेश कर सकती है। 

भारत के लिए यही क्षण परीक्षा का है। क्या वह इस अनिश्चितता में संतुलन साधते हुए अपने हितों को सुरक्षित रख सकेगा और बदलती विश्व संरचना में विवेकपूर्ण शक्ति के रूप में उभरेगा?

(पत्रकारिता समेत अभिव्यक्ति के कई आयामों को स्पर्श करने वाले विजयशंकर चतुर्वेदी इन दिनों वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं और सोशल मीडिया और रचनात्मक लेखन में सक्रिय हैं।)

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