भारत की बैडमिंटन की अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त खिलाड़ी पीवी सिंधु ने जब अपने वीडियो संदेश में बताया कि वह दुबई में सुरक्षित हैं, तब उसके साथ ही इस बात की चिंता उभरकर सामने आने लगी वहां और भी भारतीय कितने सुरक्षित हैं। प्रसिद्ध यूट्यूबर ध्रुव राठी ने अपने ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले को लेकर बनाये वीडियो में बताया कि इस हमले के समय वह दुबई में मौजूद थे, अब सुरक्षित जगह पहुंच गये हैं।
इस तरह के बहुत सारे शार्ट्स और वीडियो सोशल मीडिया पर घूम रहे हैं जिन्हें बनाने वाले भारतीय हैं और वहां हो रहे हमलों के बीच अपनी दास्तान बता रहे हैं। ऐसे वीडियो की सच्चाई को जांच करना हमारे लिए मुश्किल है। लेकिन, इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि पूरे मध्य एशियाई देशों में भारतीय छात्र, मजदूर, कर्मचारी और अन्य कामों में लगे हुए लोग वहां फंसे हुए हैं।
आज के इंडियन एक्सप्रेस के मुखपृष्ठ पर मध्य एशिया के विभिन्न देशों में रहने वाले लोगों की संख्या की एक सूची दी गई है। बहरीन- 3.27 लाख, सउदी अरब- 24.63 लाख, कतर- 8.36 लाख, यूएई अर्थात यूनाईटेड अरब अमीरात- 35.68 लाख, कुवैत- 9.95 लाख, ओमान- 6.86 लाख, ईरान- 10,765 और इजरायल- 1.05 लाख। युद्ध की आशंका में बहुत से भारतीय ईरान से लौटना शुरू कर दिये थे, खासकर वहां पढ़ाई के लिए जाने वाले छात्रों की संख्या काफी थी।
इन गल्फ देशों में रहने वाले भारतीयों में मुख्यतः मजदूर हैं जिन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक के दिये आंकड़ों के अनुसार 2025 में अपनी कमाई से भारत को 118.7 बिलियन डाॅलर भेजे थे। भारत की यह कमाई दुनिया के किसी भी क्षेत्र की कमाई से काफी अधिक है।
ईरान पर किये हमलों के बीच भारत के लिए एक और खबर आई, और वह है जहाजों के आवागमन का एक समुद्री रास्ता हरमुज को बंद कर देने की घोषणा। इसी रास्ते से भारत में पेट्रोलियम तेल और गैस की मुख्य आपूर्ति होती है।
ईरान ने इस रास्ते के अंतर्राष्ट्रीय प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है और वहां से गुजरने वाले एक टैंकर पर मिसाईल से हमला भी किया गया जिससे उसमें आग लग गई। इसके बंद होने का अर्थ है भारत में पेट्रोलियम आपूर्ति में बाधा और साथ ही अन्य वैकल्पिक रास्तों के प्रयोग से लागत में तीव्र वृद्धि। यह वही जगह है जहां भारत ईरान के साथ अपना पोर्ट विकसित कर रहा था और मैत्री संधि के माध्यम से ईरान के साथ अन्य गतिविधियों में शामिल हुआ था। भारत ईरान से पेट्रोलियम की खरीद कर रहा था।
इससे भी अधिक दिल्ली में हुए जी-23 के दौरान यूरोप और मध्य-एशिया के साथ मिलकर इसी पोर्ट से सीधे संपर्क बनाने के रास्ते के निर्माण की योजना प्रस्तुत की गई थी। इसे इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकाॅनोमिक कोरिडोर नाम दिया गया था और यह दावा किया गया था कि यह योजना चीन के बेल्ट एण्ड रोड इनिशिएटिव का जबाब है।
इस मसले पर चीन की चुप्पी देखी गई लेकिन अमेरिका ने भारत के प्रति आक्रामक रुख अपनाया। उसने सबसे पहले इस हरमुज योजना को त्यागने के लिए विवश किया। फिर ईरान से तेल आयात को रोका। इसके बाद वह रूस से तेल आयात को रोकने की ओर गया। भारत की यह महत्वाकांक्षी योजना महज दो सालों में ध्वस्त होने की ओर बढ़ गई। यद्यपि यूरोप की भारत में थोड़ी बहुत रुचि बनी जिसे अभी शक्ल लेने में कई साल लगने हैं।
जो लोग ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले को लेकर यह सोच रहे हैं कि भारत इस युद्ध की विभीषिका से दूर है, तो वे गलतफहमी में हैं। यह युद्ध भारत को भी झुलसा रहा है। गल्फ देशों में रहने वाले लगभग एक करोड़ लोगों की जिंदगी इस युद्ध में उसी तरह दांव पर है जिस तरह गल्फ में रहने वाले लोगों की है। इस युद्ध में आर्थिक नुकसान इन देशों की तरह ही होने वाले हैं।
फर्क इतना है कि युद्ध की उन तबाहियों से भारत बचा हुआ है जो युद्ध के दौरान बमवर्षकों के प्रयोग से होती है और इससे जो साामाजिक, राजनीतिक ताना-बाना टूटता है।
अमेरिका ने इस सदी के शुरूआत में ही मध्य-एशिया को अपने हमले और क़ब्ज़े की नीति का अंग बना लिया था। पिछले 25 सालों से वह लगातार मध्य-एशिया में हमलावर है और एक के बाद एक देशों को बर्बाद कर रहा है। लोकतंत्र की स्थापना के नाम पर एक के बाद एक तानाशाहों की सत्ता को आसानियां पैदा कर रहा है और कत्लेआम और जनसंहार में सीधे शामिल हो रहा है। इन युद्धों और अमेरीकी नीति को लेकर भारत ने इस सदी की शुरूआत से ही निष्पक्ष और निष्क्रिय भूमिका निभाने का निर्णय लिया।
यह नीति अब टूटने लगी है। इस युद्ध के शुरू होने के महज दो दिन पहले भारत के प्रधानमंत्री मोदी इजरायल जाते हैं। वहां वे ‘आतंकवाद के खिलाफ खड़े होने’ के नाम पर इजरायल के साथ खड़े रहने का वादा करते हैं और दोनों देशों को इतिहास की एक नियति के जुड़े होने की व्याख्या करते हैं। भारत ने इजरायल को 1950 में एक देश के तौर पर मान्यता दे दी थी। लेकिन, भारत के प्रधानमंत्री वहां जाने से बचते रहे हैं और फ़िलिस्तीन के साथ अपनी पक्षधरता को खुलकर पेश करते रहे हैं।
मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं जो 2017 और फिर 2026 में दो बार यात्रा करते हैं। इस दौरान भारत फ़िलिस्तीन के मसले पर अधिकाधिक चुप रहने की ओर बढ़ गया। यह भारत की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में बदलता हुआ रुख है जिसकी पीठ पर अमेरीका और इजरायल की सवारी साफ दिख रही है।
युद्ध पूंजीवाद के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय विस्तार करता गया है और ये दोनों एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। लेनिन ने साम्राज्यवाद के बारे में साफ तौर पर चेताया था कि यह जितना ही मजबूत होगा, युद्ध होने की अपरिहार्यता उतनी ही बढ़ती जाएगी। और, ये युद्ध किसी एक सीमा तक सीमित नहीं होंगे। लेनिन की साम्राज्यवाद पर दी गई थिसिस को 100 साल से थोड़ा अधिक समय गुजर गया है। युद्ध की विभीषिका और तीव्रता बेहद भयावह है।
ऐसा कभी नहीं हो सकता कि हम साम्राज्यावादी युद्धों की विभीषिकाओं और तीव्रताओं से खुद को दागदार होने से बचा ले जाएं। यह न हम भारत के लोग कर सकते हैं और न ही हमारे ऊपर बैठे हुक्मरान कर सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और नीति पर निश्चित ही सारा एकाधिकार देश के हुक्मरानों का है और आज हम साम्राज्यवादी ताकतों के सामने उन्हें ताबेदारी करते हुए देख रहे हैं।
यह गजब बात है कि अमेरिका और इजरायल युद्ध की तैयारियां करने में लगे हुए थे और भारत के प्रधानमंत्री खुद के सम्मानित होने में गर्व का अहसास से भरकर भाषण दे रहे थे। जिस समय वे इजरायल की यात्रा की तैयारी में थे उस समय मध्य एशिया के कुछ देश ईरान पर हमले के लिए अमेरीका में लाॅबी और माहौल बना रहे थे।
ऐसे समय में भारत के प्रधानमंत्री को कम से कम इस माहौल के बारे में अपनी नीतियां बनाते और अपने देश के नागरिकों के ऐसे माहौल से आगाह करते, उन्हें मध्य एशिया की यात्रा या उस रास्ते के प्रयोग से बचने का दिशा-निर्देश जारी करते, मध्य एशिया में रह रहे भारतीयों के लिए उनकी सुरक्षा संबंधी कुछ सुझाव ही पेश करते और उन्हें बचाने की दिशा में कदम उठाते!
हम भारत के लोग हैं, और भारत निश्चित ही ईरान पर अमेरीका-इजरायल के हमले से प्रभावित हो रहा है और होगा। भारत का सबसे प्राचीन सांस्कृति संबंध इसी मध्य एशिया से जाकर जुड़ता है। यह इराक है जहां से सीधा संपर्क भारत की सिंधु सभ्यता/हड़प्पा-मोहनजोदड़ो की सभ्यता का था। दूसरा इसके एक हजार साल बाद सीधे ईरान से जुड़ता है जब कथित आर्यों का एक समूह ईरान से अलग होकर भारत की ओर आया। ईरान का प्राचीनतम ग्रंथ अवेस्ता में ऋगवेद के दो-तिहाई देवता वर्णित हैं।
इनका पहला मुख्य पड़ाव बल्ख था जो आज ईरान और अफगानिस्तान की सीमा पर है और अब अफगानिस्तान में है। यहां मैं बिरादराना संबंधों की बात नहीं कर रहा हूं। मैं उन सांस्कृतिक मूल्यों की बात कर रहा हूं जो ईरान से चलकर भारत का हिस्सा बने। इन्हीं मूल्यों में सूफीवाद है जो भारत के हर हिस्से रूहानी में आवाज बनकर जिंदा है। जो लोग धर्म की नफरतों में डूबे हुए हैं और बात-बात पर ‘फादरलैंड’ और ‘मदरलैंड’ की बात कर रहे हैं, वे एक बार भी महान अशोक के संदेश से भरे पिलर को देखें, तब उन्हें ईरान की जरूर याद आयेगी।
साम्राज्यवादी युद्ध के दौर में इतिहास की इन बातों का एक ही संदर्भ होता है, वह है मानवता के मूल्यों की निरन्तरता और उसका विकास। हम आज युद्ध की विभीषिका देख रहे हैं जिसमें हमारे मूल्य मर रहे हैं, हम खुद भी उसमें झुलस रहे हैं। हमें इस युद्ध की विभीषिका से बचना है, इसकी झुलस से दूर जाना है, …तब हमें किसी और को नहीं, अपने हुक्मरानों को कहना है यह युद्ध रोको, इस युद्ध के खिलाफ बोलो और जिन्हें तबाह किया जा रहा है, उसके पक्ष में खड़े होओ!