तेजी से बदलती दुनिया की भू राजनीति भारत के लिए भी काफी अहम बनती जा रही है। एक तरफ जहाँ पश्चिम एशिया से लेकर मध्य पूर्व देशों के बीच हिंसक युद्ध की शुरुआत हो गई है वहीं पड़ोसी देश नेपाल में भी पांच मार्च को चुनाव होने जा रहे हैं। दुनिया के देशों के बीच चल रहे कई युद्धों में अभी तक भारत स्थिर है और वह अपने ऐतिहासिक विदेश नीति की राह पर ही चल रहा है। नीति यही है कि किसी के न पक्ष में जाना और न ही किसी के विपक्ष में खड़ा होना। यानी तटस्थ रहकर युद्ध शांति का प्रयास करना।
भारत की यह नीति नेहरू काल से ही चली आ रही है। लेकिन जिस तरह भारत का प्रेम अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ता गया और जिस तरह रूस के साथ संबंध पहले से ज्यादा संकुचित होते दिख रहे हैं उसके बाद यह नहीं कहा जा सकता है कि भारत तटस्थ है।
भारत का दोस्त तो फिलिस्तीन भी है। ईरान भी है और लगभग दुनिया के अधिकतर देशों के साथ भारत के सम्बन्ध मधुर ही कहे जा सकते हैं लेकिन जब भारत एक देश पर हो रहे हमले और हमला कर रहे देशों के साथ संबंध की डोर को और ज्यादा मजबूत करता दिखता है तो कई सवाल भी खड़े होते हैं। ये सवाल भारत की तटस्थ नीति पर भी सवाल खड़े करते हैं।
पाकिस्तान -अफगान के बीच चरम तनाव, इजरायल -अमेरिका का ईरान पर संयुक्त हमला और फिर इसकी जद में आये दुनिया के कई देशों की बदलती भू राजनीति में भारत कहां फिट बैठता है यह बड़ा सवाल अब खड़ा हो रहा है। हालिया ईरान -इजरायल युद्ध के बीच रूस और चीन द्वारा ईरान पर किये जा रहे हमले की निंदा नई है। स्पेन और नार्वे ने भी अमेरिका की दादागिरी पर सवाल उठाये हैं लेकिन सच्चे और ऐतिहासिक दोस्त ईरान के बारे में भारत की तरफ से कोई बात नहीं आयी है।
ऐसे में भारत को लेकर आज भले ही कोई कुछ न कहे, कल सवाल उठेंगे ही। और यह सवाल इसलिए कि भारत के कई पड़ोसी देशों के साथ अब मधुर सम्बन्ध नहीं रहे। बांग्लादेश कल क्या करेगा और नेपाल कल क्या करेगा और फिर पाकिस्तान भारत के साथ चीन से मिलकर क्या करेगा यह कोई नहीं जनता। और ये देश भारत के साथ कुछ करते हैं तो भारत के साथ कौन सा देश समर्थन में खड़ा होगा यह कहना अब मुश्किल है।
पांच मार्च को नेपाल में चुनाव है। कुछ महीने पहले नेपाल की भ्रष्ट ओली सरकार के खिलाफ नेपाल के युवाओं ने आंदोलन किया और ओली की सरकार चली गई। बड़े स्तर पर नेपाल में आगजनी हुई, लूटपाट हुए और नेपाल अशांत हो गया। अब चुनाव होने जा रहे हैं। यह चुनाव नेपाल के लिए तो अहम् है ही, भारत के लिए भी ख़ास है। खास इसलिए कि नेपाल पिछले काफी समय से चीन के नजदीक ज्यादा हुआ है और भारत पर उसकी निर्भरता कम होती गई है।
कह सकते हैं कि बेटी और रोटी के सम्बन्ध वाले इन दोनों देशों के बीच सामाजिक रिश्ते तो आज भी बनते नजर आते हैं लेकिन अब पहले जैसे राजनीतिक कूटनीतिक और वैश्विक सरोकार नहीं रहे। कहने को हम पड़ोसी जरूर हैं लेकिन पड़ोसी धर्म का हम पालन नहीं कर पाते है।
ऐसे में पांच मार्च का चुनाव केवल काठमांडू के लिए सत्ता का फैसला नहीं करने जा रहा है। यह चुनाव दक्षिण एशिया का कूटनीतिक फैसला भी करेगा। इस चुनाव में प्रधानमंत्री के लिए तीन बड़े चेहरे खड़े हैं। कोई चीन के साथ खड़ा दिखता है तो कोई भारत के साथ सम्बन्ध को और ज्यादा मधुर बनाने की कोशिश में लगा है और एक ऐसा उम्मीदवार भी है जो चीन और भारत के साथ संतुलन बनाकर चलना चाहता है।
ऐसे में अब बड़ा सवाल तो यही है कि प्रधानमंत्री के इन प्रमुख तीनो उम्मीदवारों को नेपाली समाज और नेपाली युवा किस तौर पर देख रहे हैं और फिर अंतिम जीत किसकी होती है। पांच मार्च को होने जा रहे चुनाव में जो प्रमुख पीएम उम्मीदवार हैं उनमें बालेन शाह, गगन थापा और केपी शर्मा ओली शामिल हैं। तीनों उम्मीदवारों के अपने -अपने दावे हैं और अपने जन समर्थन भी। भारत की नजर इस पर टिकी हुई है कि नेपाल में किसी सरकार बनती है और फिर भारत-नेपाल संबंधों पर क्या असर पड़ता है।
बता दें कि नेपाल की 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा के लिए मतदान होना है। 165 सीटें प्रत्यक्ष रूप से चुनी जानी हैं जबकि 110 सीटें आनुपातिक प्रतिनिधित्व से चुनी जाएगी। बड़ी बात यह है कि इस बार नेपाल में पुरानी और नयी पार्टियों के बीच चुनावी जंग है और जिस जेन जी ने ओली की सरकार को दफ़न किया था, अब वही जेन जी नयी पार्टियों के साथ खड़ी दिख रही है।
उधर ओली को चीन से भारी समर्थन है। ऐसे में चुनाव के वक्त चीन के सहयोग से ओली की राजनीति युवाओं के बीच कितनी धारदार होती है अभी से कुछ कहना ठीक नहीं होगा। लेकिन इतना तय है कि जिस ओली की सरकार को गिराने के लिए युवाओं ने खेल किया था, अब फिर से ओली के समर्थन में जाएँ, मुमकिन नहीं लगता। लेकिन यह भी साफ़ दिख रहा है कि चुनाव के बाद जो परिणाम सामने आएंगे उसमे कोई भी ऐसी पार्टी बहुमत के साथ उभरती नहीं दिखती जो अपने दम पर सरकार बना ले।
ऐसे में गठबंधन सरकार की गुंजाइश ज्यादा अहम दिख रही है। भारत की नजर इसी गठबंधन पर है और भारत हर हाल में चाहेगा कि शांति के लिए नेपाल में कोई ऐसी सरकार बने जो भारत के साथ भी बेहतर व्यवहार के साथ आगे बढ़े।
नेपाल चुनाव में दर्जनों पार्टियां इस बार शिरकत कर रही हैं लेकिन तीन चेहरों पर सबकी नजर है। जहाँ तक बालेन शाह की बात है वह पढ़े लिखे तो हैं ही, उनकी अपनी सांस्कृतिक पहचान भी है। 2022 में उन्होंने निर्दलीय चुनाव जीत कर कई पार्टियों को चौंका दिया था। शहरी प्रबंधन, अवैध अतिक्रमण हटाने और कचरा संकट पर सख्ती के कारण समर्थक उन्हें “निर्णायक” नेता मानते हैं; आलोचक कहते हैं कि कई फैसले जल्दबाज़ी में हुए।
इनकी ताकत है युवा समर्थन, एंटी-एस्टैब्लिशमेंट लहर। अगर युवाओं ने इनका साथ दिया तो कुछ दलों को मिलाकर इनकी राजनीति आगे बढ़ सकती है।
नेपाली की त्रिकोणीय लड़ाई में पीएम के एक उम्मीदवार गगन थापा भी हैं। ये कांग्रेस के युवा नेता हैं और इनकी पहुँच भी युवाओं के बीच है। इनकी ताकत कांग्रेस का विशाल संगठन है। ये पार्टी में सुधारवादी चेहरे के रूप में उभरे हैं। बगावती तेवर के साथ ही नेतृत्व की दौड़ में ये आज सबसे आगे हैं। इस नेता की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता भी है और भारत के साथ मधुर सरोकार भी।
तीसरे चेहरा के तौर पर खड़े हैं वाम धरे के प्रमुख नेता केपी शर्मा ओली। ये कई बार पहले भी पीएम रह चुके हैं। राजनीति के खिलाड़ी हैं और बदलती राजनीति में चीन के साथ इनके सरोकार कुछ ज्यादा ही बढ़े हैं। भारत के साथ इनके काल में तनातनी भी बढ़ती रही है। इनके पास भी विशाल जमीनी कैडर है और राष्ट्रवादी नैरेटिव भी है। लेकिन हालिया युवा आंदोलन के बाद ओली की विश्वसनीयता काफी गिरी है। लेकिन चुनाव में परिणाम क्या आते हैं यह कहा नहीं जा सकता।
गौरतलब है कि शहरी और युवा वोट यदि निर्णायक रहे, तो बालेन बड़ा उलटफेर कर सकते हैं—लेकिन उन्हें बहुमत के लिए गठबंधन चाहिए होगा। स्थिरता और संस्थागत अनुभव को प्राथमिकता मिली तो गगन थापा की राह आसान हो सकती है। और राष्ट्रवादी लहर और संगठित कैडर यदि सक्रिय हुए, तो ओली वापसी कर सकते हैं।संभावना है कि स्पष्ट बहुमत किसी को न मिले और गठबंधन सरकार बने—नेपाल की राजनीति में यह सामान्य परिदृश्य है।
भारत “पड़ोसी प्रथम” नीति पर जोर देता है। नेपाल के साथ खुली सीमा, सांस्कृतिक-परिवारिक रिश्ते और रोजगार-आवागमन का गहरा ताना-बाना है। ऐसे में परिणाम का असर बहुआयामी होगा। उत्तराखंड, यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल से लगी खुली सीमा भारत के लिए संवेदनशील है। नई सरकार की सुरक्षा प्राथमिकताएं—तस्करी, जाली मुद्रा, आतंकी गतिविधियों पर सख्ती—दिल्ली के लिए अहम रहेंगी।
चीन ने हाल के वर्षों में नेपाल में बुनियादी ढांचे और निवेश के जरिए प्रभाव बढ़ाया है।ओली सरकार में चीन-निकटता की आशंका अधिक मानी जाती है।थापा अपेक्षाकृत संतुलित, भारत-समर्थक रुख रख सकते हैं।बालेन व्यावहारिक रुख अपनाते हुए दोनों पड़ोसियों के साथ संतुलन साधने की कोशिश कर सकते हैं।
नेपाल में समय-समय पर “राष्ट्रवाद” की राजनीति भारत-विरोधी स्वर ले लेती है। नई सरकार की संवाद-शैली और सार्वजनिक बयान दोनों देशों के जनमत को प्रभावित करेंगे। ऐसे में नेपाल का यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि दिशा-निर्धारण है—भ्रष्टाचार बनाम सुधार, पुरानी पार्टियों बनाम नई राजनीति, और भारत-चीन संतुलन के बीच।
भारत के लिए सबसे अनुकूल परिदृश्य स्थिर, संतुलित और विकास-उन्मुख सरकार का होगा, जो खुली सीमा की सुरक्षा और आर्थिक साझेदारी को प्राथमिकता दे। ऐसे में बाजी वही मारेगा जो युवा असंतोष को विश्वसनीय नीति में बदल सके और गठबंधन गणित साध सके। लेकिन चाहे जो जीते—दिल्ली और काठमांडू के रिश्तों में नई परीक्षा तय है।
(अखिलेश अखिल लेखक व राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)