रुस की यूरोपीय देशों को धमकी के निहितार्थ !

चिर प्रतिद्वंद्वी अमेरिका पहली बार रुस के शिकंजे में फंसा हुआ है। वह है ‘कि वे यूरोपीय देश जो अमेरिका के सहचर हैं और अमेरिका की हां में हां मिलाते रहे हैं उन्हें पेट्रोलियम पदार्थों की कमी से जूझना पड़ रहा है क्योंकि इन संसाधनों के बिना सब कुछ पंगु हुआ जा रहा है। ईरान ने अमेरिका परस्त राष्ट्रों के जलयानों का होर्मुज़ जलडमरू मध्य से गुजरने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है तो वहीं रुस ने स्पष्ट तौर पर यह जाहिर कर दिया है कि वह ईरान के साथ खड़ा है।

इसलिए उसने उन यूरोपीय देशों को पेट्रोलियम पदार्थ देने से साफ मना कर दिया है जो ईरान के साथ नहीं है। सिर्फ रुस और चीन के जलयान ही वहां से गुजर रहे हैं। भारत को भी अनुमति नहीं दी गई है।

आपको याद होगा हमारे देश को स्पष्ट रूप से यह एक चेतावनी है जो अमरीका और इज़राइल का गुलाम बना हुआ था। ऐसी धमकी मिलने से पहले ही भारत ने एक भूल सुधारी है उन्होंने अयातुल्ला खामेनेई के निधन पर लगभग एक सप्ताह बाद शोक जताया है। जबकि ईरान की सहृदयता देखिए उसने अपने विमान से वहां मौजूद भारत के नागरिकों को ख़तरा मोल लेते हुए सुरक्षित भारत भेजने की व्यवस्था की है जबकि इज़राइल ने अब मोदी जी के साथ गए पत्रकारों और फंसे भारतीयों के निकालने के लिए कुछ नहीं किया।

कुछ लोग भागते हुए दूसरे देश के सहयोग से आ पाए हैं। ऐप्सटीन फाइल के झमेले में भारत ना फंसा होता तो शायद ईरान के साथ ऐसा व्यवहार भारत कतई नहीं करता।

बहरहाल अब ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अब तक अमरीका तीस देशों पर हमला कर चुका है लेकिन छोटे देश वियतनाम के बाद ईरान ने जिस तरह से अमेरिका को नाकों चने चबवाए हैं और एक राक्षस समुदाय को दिन में तारे दिखाए हैं वह दुनिया की राजनीति का नया अध्याय लिखेगा।

एशियाई देशों के प्रमुख चीन, रुस, जापान, कोरिया और मध्यपूर्व की एकजुटता के बाद यूरोप से स्पेन, नार्वे, इटली की प्रतिक्रियाएं ये बता रही हैं कि वे इज़राइल और अमेरिकी प्रशासन के खिलाफ हैं। ऐसे माहौल में रुस की यह धमकी भी कारगर हो सकती है क्योंकि इस कठिन दौर में रुस ही इन देशों तक खनिज तेल पहुंचाने में सक्षम है।

 यह जानकर आश्चर्य होगा कि ट्रम्प ने जिस तरह भारत को तीस दिन रुस से तेल आयात करने की अनुमति दी थी उसके पीछे वह भारत के अडानी की पाइपलाइन के ज़रिए चोरी चोरी यूरोप तेल भेजने वाला था। मगर रुस ने अब सस्ता तेल भारत को देने से साफ मना कर दिया है यह सज़ा इस नाते दी गई है कि वह भारत देश को सस्ता तेल देता था किंतु अडानी उसे महंगा कर देश की जनता और विदेश सप्लाई कर देता था। सारा फायदा अडानी ने लिया। जनता को छला गया। इसलिए अब दाम हर्गिज कम नहीं होंगे।

कुल मिलाकर इस समय ईरान एक शक्तिशाली राष्ट्र के रुप में सामने आया है।वह साफ़ कह रहा है कि वह युद्ध अमेरिका के दाऊ के कहने पर, भारत पाक की तरह नहीं रोकेगा वह अपनी इच्छा से जब चाहेगा तभी रोकेगा। एक संप्रभु राष्ट्र का उद्घोष ऐसा ही होना चाहिए।

आगत दिनों में अमेरिका इज़राइल के हथियारों पर भी रोक लगनी स्वाभाविक है क्योंकि ईरान के छोटे-छोटे सस्ते ड्रोनों ने अमेरिका के इज़राइल को जिस बुरी तरह रौंदा है उससे ईरान के हथियार लोकप्रिय हुए हैं। अमेरिका जिसे पेंटागन ही चलाता है बर्बाद हो सकता है। रुस ,चीन, जापान , कोरिया और ईरान मिलकर एक नई इबारत लिख सकेंगे।

यह यकीन होने लगा है। दो दुष्ट राजनेताओं की बदौलत आज ये मुकाम आया है। अमेरिका में तो वहां जनसैलाब कब से डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ आंदोलन रत है इज़राइल में भी सैन्य अधिकारी और जनता नेतन्याहू के ख़िलाफ़ दिखाई दे रही है। उम्मीद है, इस युद्ध से फिलीस्तीन के लोगों को भी राहत मिलेगी तथा उनकी आज़ादी का ख़्वाब भी शीघ्र पूरा हो सकेगा। सारा दारोमदार अब वहां की अवाम पर है वे इनके साथ क्या सुलूक करते हैं। वैसे अमरीकी और इज़राइल की अदालत में दोनों के मामले भी विचाराधीन हैं।

इस दौर में भारत के मोदी जी की हालत भी डांवाडोल है। कुछ लोगों का ख्याल है ट्रम्प से सम्बन्ध यदि ज़रा भी कमज़ोर होते हैं तो वह उनका कैरियर बर्बाद कर देगा। जैसा कि उसने कहा है। 

इंतज़ार रहेगा, जब दुनिया में लोकतांत्रिक शासन की आड़ में फासिस्टवादी और साम्राज्यवादी ताकतों को बढ़ावा देने वाले जुल्मी तानाशाहों का अंत होगा।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)

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