सोनम वांगचुक की रिहाई: सरकार घेरे में क्यों नहीं ?  

विश्व प्रसिद्ध जलवायु कार्यकर्ता विद्वान सोनम वांगचुक को 26 सितम्बर 25 में अचानक एनएसए उन्हें देशद्रोही मानते हुए गिरफ्तार करती है और उन्हें सीधे जोधपुर जेल भेज देती है। एक माइनस डिग्री में रहने वाले व्यक्ति को देश के भीषण गर्म शहर की जेल भेजा जाता है। इस बीच मोदी चैनलों पर यह बताया जाता है कि वे पाकिस्तान के एजेंट थे इसलिए वहां गए थे वगैरह-वगैरह।

आज ऐसी क्या वजह आ गई कि भारत सरकार ने उन्हें बेदाग घोषित करते हुए बरी कर दिया। एक कारण यह भी बताया गया कि लद्दाख में हो रहे आंदोलनों को शांत करने के लिए उनकी रिहाई की गई।

ये बातें समझ से परे हैं उनको जेन जेड के हिंसक आंदोलन के लिए दोषी ठहराते हो और फिर लद्दाख में शांति स्थापना के लिए रिहा करते हो। इसी भांति उन पर देशद्रोह का आरोप मढ़ते हो, पाकिस्तान का एजेंट बताते हो और फिर मामले ख़त्म कर देते हो। इससे सरकार की नियत समझ में आती है। लोकप्रिय होने वाले व्यक्ति चाहे वह राजनैतिक या गैर राजनीतिक हो उस पर कोई भी इल्ज़ाम लगाओ, जेल भेजो और जब मामला सर्वोच्च न्यायालय का रुख करे और बिना सबूत हारने की स्थिति बने तो वापस ले लो।

सोनम वांगचुक का दोष सिर्फ ये था कि उन्होंने सरकार के वादे के मुताबिक लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची में शामिल करने मार्च निकाला था, बर्फ़ में अनशन किया था। जब उनके दो अनशन रत साथी आईसीयू में भर्ती हो गए तो जेनजेड उत्तेजित हुआ उसे शांत करने गांधीवादी सोनम अनशन छोड़कर इन्हें शांत रास्ते पर लाने सामने आए थे। सरकार ने उन पर विद्रोह भड़काने का  और विदेशी एजेंट बताकर जेल में डाल दिया था।

अच्छा मज़ाक चल रहा है देश में सुको को ऐसे मामलों में संज्ञान लेकर झूठे मामलों को संगीन बनाने वालों और झूठा प्रचार करने वालों पर ठोस कार्रवाई करनी चाहिए।

वांगचुक के जीवन के महत्वपूर्ण 170 दिन कौन लौटाएगा। उनके स्वास्थ्य में आई गिरावट की भरपाई कौन करेगा, उनकी छवि पर किए हमले को कौन साफ़ करेगा। परिवार और देश के बुद्धिजीवी लोगों में इस तरह का दहशतज़दा माहौल निर्माण की सजा क्या किसी को मिलेगी? बहरहाल सोनम वांगचुक की रिहाई के पीछे जो किरदार थे उन्हें बख़्शा नहीं जाना चाहिए।

यह पहली इस तरह की घटना नहीं है संजीव भट्ट, शरजील, उमर ख़ालिद जैसे कई ईमानदार और बेदाग लोग इस सरकार ने जेल में डाल रखे हैं। याद आते हैं झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जिन्हें बिना वजह जेल में रखा गया। इसी तरह दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और सांसद संजय सिंह को कई महीनों जेल में रखा गया। वे अदालत से निरापराध मुक्त हो गए। प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी और तृणमूल नेत्री महुआ मोइत्रा को भी इसी तरह की अनेक मुश्किलातों से गुजरना पड़ा।

ये कैसी सरकार है जो अपराधियों पर दिल खोल के रहम करती है उन्हें चुनाव के समय बेल पर बेल दिलवाती है। राम-रहीम जैसे हिंसक बलात्कारी को बरी करवाती है। आसाराम बापू जैसे यौन दुराचारी पर दया बरपाती है। बिल्किस बानो के दुराचारियों का सम्मान करती है लेकिन अपने प्रतिद्वंदियों को जेल में जबरन भिजवाती है।

ये तमाम मामले न्यायालय को भी कटघरे में खड़ा करते हैं। यह समझने की ज़रूरत क्यों तब महसूस नहीं की जाती कि जिस वक्त मामला अदालत ने संज्ञान में लिया है उसके पर्याप्त सबूत हैं या नहीं। शरजील, उमर खालिद के मामलों में आज तक ठोस सबूत नहीं यह बात अदालत कह चुकी है किंतु सरकार की मंशानुरूप इंतजार हो रहा है कि वह एक दिन पुख्ता प्रमाण लाएगी। साहिब जब प्रमाण आ जाएं तब देख लीजिए अभी तो उन्हें मुक्त कर पढ़ने दीजिए।

वांगचुक मामले से अदालत को सीख लेनी चाहिए उनके पास स्वत: संज्ञान लेने का भी अधिकार है।एक बात और जब तक सरकार को ऐसे स्वनिर्मित मामले में दंडित नहीं किया जाएगा तब तक ये खेल भले मानुषों, समाजसेवियों और जन जन में लोकप्रिय हो रहे नेताओं, पत्रकारों, गायक, कलाकारों पर खेला जाता रहेगा। यह हमारे देश और न्याय व्यवस्था के लिए दुर्भाग्य पूर्ण होगा।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)

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