पहले अमेरिका और फिर इजरायल ने ईरान के तेल ठिकानों पर हमला किया। इन हमलों के बाद ईरान ने होम्र्यूज में जिस तरह से नाकेबंदी की, पूरी दुनिया में तेल के दामों में तेज उछाल देखा गया। जब ईरान ने अपनी जवाबी कार्रवाई में कतर के एक उर्जा ठिकाने पर हमला कर उसे आग के हवाले किया, उसने ट्रम्प को भी पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने अमेरिका के बारे में नहीं, लेकिन इजरायल के बारे में जरूर आश्वासन दिया कि वह अब ईरान के उर्जा ठिकानों पर हमला नहीं करेगा।
अमेरिका और इजरायल ने यह युद्ध ईरान में सत्ता बदलने के लिए शुरू किया था, अब यही दावा रह गया है। लेकिन, युद्ध के चंद दिनों के गुजरने के साथ ही यह तेल के ठिकानों की बर्बादी और तेल की आपूर्ती की व्यवस्था को रोक देने तक पहुंच गया। इस बीच इजरायल लेबनान में अपना नया युद्ध का मोर्चा खोलकर अपनी बढ़त बनाने और उसे धार्मिक रंग देने में लगा हुआ है।
जबकि अमेरिका इस युद्ध में मध्य एशिया के देशों में अपने सैनिक ठिकानों को बर्बाद होते हुए देख रहा है और पीछे हटने को मजबूर है। उसके कई सैनिक मारे गये हैं और सैनिक अड्डे असुरक्षित मान लिए गये हैं।
अमेरिका अपनी बिगड़ती हालत को ठीक करने के लिए नेटो के देशों से ईरान के खिलाफ युद्ध में उतरने के लिए कहा। एक के बाद एक इन देशों ने युद्ध में उतरने से मना कर दिया। वह जापान को भी इस युद्ध में उतार लाने के लिए राजी करने में लगे हुए हैं। जापान अपनी देश की नीति, उसके अपने वैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए फिलहाल इस युद्ध में उतरने से मना कर दिया है।
ट्रम्प की इस मशक्कत के दौरान रूस, उत्तरी कोरिया और चीन ने अपने युद्ध की तैयारियों का प्रदर्शन करने में पीछे नहीं रहे। उत्तरी कोरिया ने तो परमाणु मिसाइलों को परिक्षण भी कर लिया। चीन के जहाज ताईवान के ऊपर मंडराते हुए देखे गये।
आज अमेरिका के सुरक्षा से जुड़े अधिकारी ही ईरान पर हुए हमले के औचित्य पर सवाल उठाने लगे हैं। यह सवाल ट्रम्प का पीछा कर रहा है। ट्रम्प ईरान के ‘बुरे लोगों को खत्म करने’ के बारे में बात करते हुए कई बार दिखे जिसका मूल मंतव्य वहां के शासक समूहों को हटाकर नये तरह के शासक समूहों को स्थापित करना है। इसे वह ‘लोकतंत्र की स्थापना’ कहते हैं।
यदि उनके तर्क को एक बार मान भी लिया जाए, तब सत्ता बदलने के लिए सत्ता के प्रतिष्ठानों पर हमला करना होगा, न कि पूरी दुनिया को आर्थिक संकट में डाल देने वाले युद्ध का सहारा लेना होगा। अभी तक अमेरिका ने सत्ता बदलने और ‘लोकतंत्र की स्थापना’ के नाम पर जिस तरह के युद्धों का सहारा लिया है उसका अंतिम नतीजा उस देश की बर्बादी, अराजकता और तानाशाही में अभिव्यक्त हुआ है।
एक साम्राज्यवादी देश कभी भी लोकतंत्र की स्थापना का रास्ता बना ही नहीं सकता। वह सिर्फ और सिर्फ लूट का साम्राज्य और फ़ासिस्ट ताकतों को सत्ता का रास्ता साफ करता है।
आज पूरी दुनिया में यह आम विचार स्थापित हो चुका है कि अमेरिका इजरायल के हाथ में खेल रहा है। एक विशालकाय साम्राज्यवादी देश एक छोटे से देश के हाथों में कैसे खेल सकता है? अमेरिका के थिंक टैंक ने ऐसे होने कैसे दिया? और, यह भी कि यह कैसे संभव है? राजनीति में सिद्धांतों की तार्किक परिणति होती है। लेकिन, जहां सिद्धांत न हो वहां यह किसी करवट भी जा सकता है। यह विशुद्ध व्यवहारवाद है जो तात्कालिक हितों को अनुभवों से हासिल तथ्यों पर निर्भर करता है।
अमेरिका ने लंबे समय में मध्य एशिया और लातिन अमेरिकी देशों में अपना सैनिक वर्चस्व और राजनीतिक प्रभुता बनाकर रखी हुई है। इन बीतते वर्षों में चीन और रूस का मध्य एशिया और लातिन अमेरिकी देशों में हस्तक्षेप बढ़ता गया है। रूस ने यूक्रेन को हड़प लेने के लिए जब सैन्य कार्रवाई शुरू की तब अमेरिका यूरोपीय देशों के साथ मिलकर यूक्रेन के मोर्चे पर खड़ा हो गया। इस बीच रूस और चीन ने वेनेजुएला के साथ आर्थिक समझौता करते हुए कुछ सैन्य समझौते भी किये।
इस समझौते में रूस और चीन को वेनेजुएला पर हमले की स्थिति में सहयोग की बात भी थी। चीन मध्य एशिया में बेल्ट एण्ड रोड के माध्यम से आर्थिक ढांचे में घुसपैठ कर चुका था। पाकिस्तान के साथ उसके रिश्ते काफी घनिष्ठ हो चुके थे। इस बीच ईरान के साथ चीन और रूस के सैन्य सहयोग तेजी से बढ़ा। यह सबकुछ अमेरिका के वर्चस्व को एक चुनौती थी।
दुनिया के सैन्य ठिकानों पर कई मोर्चे अब खुलते हुए दिख रहे थे। अमेरिका एक साथ इतने मोर्चों पर उतरने के बजाय वह अपने यूरोपीय सहयोगियों को आगे करने में लगा रहा। लेकिन, स्थिति उस समय खराब हो गई जब अमेरिका यूरोप को बचाने के नाम पर ग्रीनलैंड पर ही कब्जा करने का दावा करने लगा और सैन्य तैयारियाँ करने लगा। पूरा यूरोप इसके खिलाफ खड़ा हो गया। ऐसे में स्थिति को बिगड़ते देख अमेरिका ने एक नया मोर्चा वेनेजुएला में खोला।
उसने वहां के राष्ट्रपति का ही एक डकैत की तरह अपहरण कर लिया। अमेरिका को उम्मीद थी कि सैन्य समझौते के तहत रूस और चीन वेनेजुएला का साथ देने आएंगे। दोनों ही नहीं आए। वेनेजुएला अमेरिका के कब्जे में चला गया। अमेरिका के इस कदम को पूरी दुनिया में एक खतरनाक नीति की तरह देखा गया और इसे संप्रभुता का उल्लंघन और अंतर्राष्ट्रीय कानून का मजाक बनाना माना गया।
ट्रम्प को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ा। वह वेनेजुएला के अनुभव से अब आगे बढ़ने की तैयारी में लग गये। वह अब ग्रीनलैंड से हटकर ईरान पर आ गये। बमुश्किल साल भर पहले वह ईरान पर हमला कर उसकी ताकत अंदाजा लगा चुके थे। उन्होंने ईरान में कथित लोकप्रिय आंदोलन को हवा देने की कोशिशें कीं। ट्रम्प को लगने लगा था कि हफ्ते भर के युद्ध के बाद वहां विद्रोह उठ खड़ा होगा और तख्ता पलट हो जाएगा।
ट्रम्प और उनके सहयोगियों ने ईरान के एक विचार पर आधारित उस राजनीतिक व्यवस्था को दरकिनार कर देखा। उन्होंने ईरान में एक विचारधारा पर आधारित उस राजनीतिक व्यवस्था को कम करके आंका जिसकी जड़ें अपनी विरासत की ठोस जमीन से जुड़ी हुई थीं। बहुत से राजनीतिक विचारकों ने ठीक ही लिखा है कि वहां के राजनेता और उस राजनीतिक पार्टी का हिस्सा हैं जिनकी गहरी जड़ें काफी गहरी हैं।
ये उपनिवेशवाद के खिलाफ खड़े होने वाले वे लोग हैं जिन्होंने इस्लाम की नैतिकता के पाठ को पढ़ा है और दुनिया की विचारधारा की और भी आवाजों को उतनी ही शिद्दत से सुना है। इस नैतिकता में युद्ध और कुर्बानी एक अहम् भूमिका निभाता है और गुलामी से मुक्त दुनिया का आश्वासन देता है। इस विचारधारा ने ईरान में अमेरिका और इजरायल द्वारा प्रायोजित ‘लोकप्रिय विद्रोह’ की रणनीति का दिवाला निकाल दिया।
ईरान दुनिया के नक्शे पर एक देश की तरह जिस नैतिक जमीन पर खड़ा था, उसमें उसने किसी भी तरह से अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन नहीं किया। जबकि इजरायल और अमेरिका इसका सीधा उल्लंघन कर रहे थे। उन्होंने ईरान के स्कूल पर हमला कर बच्चियों को मार डाला। वहां के धार्मिक नेता और ईरान के अगुवा अयातुल्लाह खुमैनी को उन्होंने मार डाला। अमेरिका ने ईरान के एक निहत्थे सैन्य बेड़े को डुबोकर एक जघन्य अपराध का उदाहरण पेश किया।
और, सबसे अधिक इस युद्ध ने पूरी दुनिया में उर्जा के संकट को और भी घना बना दिया। कोविड-19 की मार का अभी दाग धुला भी नहीं था कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला कर एक बार फिर उसी तरह का आर्थिक संकट खड़ा कर दिया गया है।
ईरान ने इस युद्ध में जिस रणनीति का सहारा लिया, और उसने जिस बड़े पैमाने पर पूरे मध्य एशिया में अमेरिका सैन्य ठिकानों पर हमला किया है उसकी उम्मीद निश्चित ही अमेरिकी सैन्य रणनीतिकारों और ट्रम्प को कतई नहीं था। उन्होंने इस संदर्भ में कोई तैयारी भी नहीं की थी। अमेरिका का वर्चस्व निश्चित ही इस इलाके में कमजोर होगा।
इस युद्ध में ईरान की बर्बादी भी हम सभी को दिख रही है। ईरान के शानदार नेता मारे गये हैं। लेकिन, उसकी युद्ध की रणनीतियों ने अमेरिका के वर्चस्व की नींव को हिला दिया है। अमेरिका बनाम रूस-चीन के इस विभाजन में ईरान के मोर्चे पर अमेरिका लहूलुहान हो चुका है। इस युद्ध में तेल खरीद में चीन की मुद्रा की खपत निश्चित ही बढ़ी है। रूस, चीन और ईरान के बीच मुद्रा का यह खेल अमेरिकी डालर के लिए एक चुनौती बनकर आने वाली है।
दुनिया के नक्शे पर जब अमेरिका अपने वर्चस्व के लिए युद्ध के नये दौर में प्रवेश कर रहा था, वेनेजुएला पर कब्जा, ग्रीनलैण्ड को हड़प लेने का मंसूबा बनाया जा रहा था, यूक्रेन पर कब्जा कर रूस पूर्वी यूरोप में अपनी बढ़त बनाने के लिए उतावला हो रहा था, चीन एक व्यापारी की तरह इस युद्ध में मुनाफा और प्रभाव बढ़ाता जा रहा था उस समय हमारा देश दुनिया के नक्शे पर बिना भूमिका निभाए नेपथ्य में जा रहा था।
ईरान के ऊपर अमेरिका और इजरायल के युद्ध लाद देने के दो दिन पहले भारत के प्रधानमंत्री का इजरायल जाना, वहां मुस्कराते, ठहाका लगाते हुए नेतन्याहू से गले मिलने का दृश्य त्रासदी में प्रहसन का नमूना है और यह सचमुच हमारे देश की त्रासदी की एक शुरूआत है। इस भयावह युद्ध में, ठीक एक हफ्ते पहले जब दुनिया विश्वयुद्ध के कगार पर पहुंचते हुए दिखने लगी थी, भारत के प्रधानमंत्री की चुप्पी हममें से किसी के भी कान को बहरा बना देने के लिए काफी थी।
वह ट्रम्प चलाने के फीते काट रहे थे और राज्यों में होने वाले चुनाव के प्रचार अभियान में हिस्सा ले रहे थे। दुनिया की राजनीति में भारत की यह चुप्पी अपने देश के लोगों का पीछा करती रहेगी। आने वाले समय में विश्व में किसी भी मंच पर किसी भी नागरिक और किसी भी राजनेता से यह सवाल कभी भी पूछा जाएगा, ‘‘आप चुप क्यों थे?’’
(अंजनी कुमार लेखक, राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)