मैं हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो देख रहा था। सूरत से कुछ लोग ट्रेन में बैठकर अपने-अपने राज्यों की ओर भाग रहे थे। एक महिला बेहद दुखी स्वर में कह रही थी कि पंद्रह दिनों से उन्होंने ठीक से खाना नहीं खाया—वड़ा पाव और ऐसी ही चीज़ों से किसी तरह गुज़ारा कर रहे थे। वहीं खड़े एक मुसाफ़िर ने कहा कि गैस, जो कभी नब्बे रुपये किलो थी, अब तीन सौ अस्सी रुपये तक पहुँच गई है—अब यहाँ रह पाना संभव नहीं।
यह दृश्य देखते ही कोरोना काल की याद ताज़ा हो गई, जब इसी तरह लोग अलग-अलग शहरों से पलायन कर रहे थे। सवाल उठता है—क्या हम निकट भविष्य में उस त्रासदी की पुनरावृत्ति की ओर बढ़ रहे हैं?
भारत की रसोई में जलती नीली गैस अब सिर्फ सुविधा नहीं रही, बल्कि यह जीवन-मरण का प्रश्न बनती जा रही है—और साथ ही हमारी ऊर्जा नीतियों की समझ और दूरदर्शिता की कसौटी भी। उज्ज्वला योजना और अन्य प्रयासों से करोड़ों घरों तक एलपीजी सिलिंडर पहुँचे और गरीब परिवारों को लकड़ी-कोयले के धुएँ से राहत मिली—यह एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इस सफलता के साथ एक कमजोरी भी जुड़ी रही, जो मार्च 2026 में खुलकर सामने आ गई।
पश्चिम एशिया में भड़के युद्ध के चलते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है। मार्च के पहले सप्ताह से आपूर्ति में आई इस बाधा ने हालात को तेजी से बिगाड़ा है। भारत अपनी एलपीजी जरूरत का करीब 60% आयात करता है और उसमें से 90% से ज्यादा होर्मुज के रास्ते से आता है। इस रास्ते के बाधित होने का सीधा असर यह है कि देश के कई हिस्सों में गैस सिलेंडर के लिए लंबी कतारें लग गईं, घबराहट में बुकिंग बढ़ गई और लाखों घरों में चूल्हे ठंडे पड़ गए हैं।
जिन परिवारों ने पारंपरिक चूल्हे छोड़ दिए थे, उनके लिए यह रोज़मर्रा की जिंदगी का गंभीर संकट बन गया है। आगे के लिए भी नागरिकों में भरोसे से ज्यादा अनिश्चितता दिखाई दे रही है।
बाहर की निर्भरता, भीतर की कमजोरी
देश को पहले से पता था कि गैस की खपत तेज़ी से बढ़ रही है, आयात पर निर्भरता अधिक है और दुनिया में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इसके बावजूद भंडारण बढ़ाने या वैकल्पिक व्यवस्था करने पर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई गई। मंगलुरु और विशाखापत्तनम जैसे दो बड़े भूमिगत भंडार मिलकर भी देश की सिर्फ दो-तीन दिन की जरूरत पूरी कर सकते हैं, जबकि कुल भंडारण क्षमता महीने भर की जरूरत के आधे से भी कम है।
यानी पूरी व्यवस्था इस भरोसे पर टिकी थी कि गैस लगातार आती रहेगी—और जैसे ही यह सिलसिला रुका, पूरी व्यवस्था डगमगा गई।
चूल्हे से समाज तक असर
एलपीजी की किल्लत का असर सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं रहा है। सड़क किनारे के ढाबे, ठेले, चाय की दुकानें, मिठाई बनाने वाले और छोटे फूड कारोबार इसी ईंधन पर चलते हैं। गैस की कमी होते ही इनका काम या तो ठप हो चुका है या आम आदमी की जेब पर भारी पड़ने लगा है।
घरों के भीतर भी असर साफ दिखता है। गैस नहीं मिलने पर महिलाओं को फिर से लकड़ी या कोयले की तरफ लौटना पड़ रहा है। इससे उनका समय भी जाता है, मेहनत भी बढ़ती है और स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है—यानी ऊर्जा का संकट एक बार फिर सामाजिक असमानता को गहरा कर रहा है।
अदूरदर्शिता और तैयारी की कमी
कच्चे तेल के मामले में देश के पास हफ्तों-महीनों तक चलने वाला भंडार है, लेकिन एलपीजी के लिए चंद दिनों का इंतजाम ही रखा गया। रणनीतिक भंडार बढ़ाने, आयात स्रोतों को विविध बनाने और दीर्घकालिक आपूर्ति समझौतों को समय पर मजबूत करने जैसे फैसले कागजों पर जरूर रहे, लेकिन उन्हें जमीन पर उतारने में अपेक्षित तेजी नहीं दिखाई गई।
और जब संकट सामने आया, तो सरकारी तैयारी की सीमाएँ खुलकर सामने आ गईं। हड़बड़ी में घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कोशिशें तेज़ हुईं, अतिरिक्त आपूर्ति के लिए जहाज मोड़े गए, पाइप्ड गैस की ओर जाने की अपील की गई और जमाखोरी रोकने की कार्रवाई शुरू हुई—लेकिन ये सारे कदम किसी पूर्व तैयारी का हिस्सा नहीं, बल्कि संकट के दबाव में उठाए गए तात्कालिक उपाय नजर आए।
अब भी चेतने का मौका
स्थिति अभी भी संभाली जा सकती है, लेकिन इसके लिए प्राथमिकताओं को स्पष्ट करना होगा। सबसे पहले, भंडारण क्षमता को तेजी से बढ़ाना होगा, खासकर राजस्थान जैसे इलाकों में जहाँ भूमिगत भंडारण की संभावना है। मध्यम अवधि में अलग-अलग देशों से गैस आयात के स्थायी और विविध रास्ते विकसित करने होंगे, ताकि एक ही मार्ग पर निर्भरता कम हो। और दीर्घकाल में घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ बायोमास, इंडक्शन और अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को व्यवस्थित तरीके से बढ़ावा देना होगा।
किसी भी योजना की असली सफलता सिर्फ इस बात से नहीं तय होती कि वह कितने लोगों तक पहुँची, बल्कि इस बात से भी कि वह कितनी भरोसेमंद है। आज आपूर्ति की असुरक्षा की कीमत रसोई की ठंडी लौ में चुकाई जा रही है।
रसोई की लौ सिर्फ ईंधन से नहीं, बल्कि दूरदर्शिता और पूर्व तैयारी से जलती है—और आज इन्हीं दोनों की असली अग्निपरीक्षा है।
(विजयशंकर चतुर्वेदी जनसत्ता से लंबे समय तक संबद्ध रहे। आजकल सामाजिक मुद्दों, राष्ट्रीय नीतियों और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक विषयों पर नियमित लेखन करते हैं।)