दिल्ली पुलिस की रोंगटे खड़ा कर देने वाली क्रूरता, बर्बर पिटाई के बाद युवक-युवतियों को दी यौन यातना

दिल्ली के एक इलाके का नाम ‘न्यू फ्रेण्ड्स कॉलोनी’ है, यह तथ्य मैंने दो बार सुना। दोनों बार यह तथ्य इस संदर्भ में पता चला कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने कुछ युवाओं को गैरकानूनी तरीके से उठा लिया और उन्हें न्यू फ्रेण्ड्स कॉलोनी स्थित अनधिकृत कार्यालय में ले जाकर यौन कुण्ठा से भरी क्रूर यातनायें दी। दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल का मुख्य कार्यालय लोधी रोड पर है, जहां से उनके कानूनी कामों का संचालन होता है या जहां पर सामान्य पूछताछ के लिए बुलाया जाता है।

न्यू फ्रेन्ड्स कॉलोनी के इस अनधिकृत कार्यालय में लोगों को तब लाया जाता है, जब दिल्ली पुलिस द्वारा किसी का गैरकानूनी तरीके से अपहरण किया गया हो, जिसकी  गिरफ्तारी वे छिपाना चाहते हों और उन्हें क्रूर यौनिक यातनाएं देना चाहते हों, ऐसी यातनायें जिसमें पुलिस वालों की यौन कुण्ठा बिलबिलाती हो।

यह विरोधाभास ही कि इस इलाके का नाम ‘फ्रेण्डस’ कॉलोनी है और यहां सत्ता की एक एजेंसी नागरिकों को ‘एनेमी यानि दुश्मन’ मान कर बर्बर यातनायें देती है। इस विडम्बना के हवाले से यह कहा जा सकता है कि दिल्ली पुलिस का स्पेशल सेल सत्ता का तो जिगरी दोस्त है, लेकिन संविधान का जानी दुश्मन। सत्ता के ये दोस्त उन लड़के-लड़कियों से नफरत करते हैं, जो भगत सिंह का कहा अपने सीने से चिपका कर घूमते हैं, उनके कोटेशन वाले टी शर्ट पहनते हैं उनके पोस्टर साटते हैं।

सत्ता के ये जिगरी दोस्त उन युवा लड़के-लड़कियों से नफरत करते हैं, जो अपनी दोस्ती में धर्म और जाति की किसी भी दीवार को नहीं मानते, जो दोस्ती में लैंगिक दीवार को गिराकर मर्दवाद के खिलाफ खड़े हो जाते हैं। जो प्यार और शादी करने में धर्म और जाति की हर दीवार को गिरा देते हैं, जो हर जेंडर की पहचान का सम्मान करते हैं और अपना महसूसा हुआ जेंडर खुलकर बताते हैं। सत्ता के ये ‘जिगरी दोस्त’, लड़के-लड़कियों की दोस्ती से इतनी नफ़रत करते हैं कि उन्हें यातना देने के तरीके के तौर पर एक दूसरे का बलात्कार करने का आदेश देते हैं, इंकार करने पर उन्हें पीटते हैं। फिर भला ये राज्य ‘बलात्कार राज्य’ कैसे न बने?

अगर आपको इस पर यक़ीन न हो तो हाल ही में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा गैर कानूनी तरीके से 3 दिन तक हिरासत में रखे गये 10 युवा लड़के-लड़कियों की आप-बीती सुनिये, जिसे उन्होंने बिना झिझके, बिना डरे, बहादुरी के साथ मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की टीम और कुछ पत्रकारों के सामने रखा है। 23 मार्च की शाम 7 बजे पीयूसीएल द्वारा आयोजित एक ऑनलाइन मीटिंग में ये भुक्तभोगी समाज के सामने भी बहादुरी के साथ अपनी बात रखेंगे। दरअसल जब किसी को बहुत अधिक डराया जाता है, तो उसका डर अक्सर गुस्से में भी बदल जाता है, जैसा कि समाज को न्यायपूर्ण बनाने का सपना देखने वाले इन युवाओं के साथ हुआ है। 

उल्लेखनीय है कि अपहरण और गैरकानूनी हिरासत में यातना की ऐसी घटना उनके साथ पहली बार नहीं घटित हुई है, बल्कि इनमें से कइयों को जुलाई 2025 में भी ठीक इसी तरीके से अपहरण कर गैरकानूनी हिरासत में दिल्ली के न्यू फ्रेण्ड्स कॉलोनी के इसी अनाधिकृत कार्यालय में लगभग 10 दिन तक यातनायें दी गयीं और दिल्ली छोड़ देने की धमकी दी गयी थी। यातना की उन यादों से बाहर आने में उन्हें बहुत समय लगा। कइयों के अभिभावकों ने उनकी पढ़ाई छुड़वाकर उन्हें घर बैठा दिया था। 

यह पढ़ते हुए निश्चित ही आपके मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आखिर उनके साथ ऐसा क्यों किया।

इसका जवाब उनके साथ हुई पूछताछ, उन्हें मिली धमकियों और उनके साथ किये गये व्यवहार से समझा जा सकता है। 

गैरकानूनी तरीके से उठाये गये ये युवा अलग-अलग संगठनों और कामों से जुड़े हैं। मजदूर अधिकार संगठन, भगत सिंह छात्र एकता मंच, और विस्थापन के खिलाफ काम करने वाले दो एक्टिविस्ट। पिछले साल के जून या जुलाई महीने में दिल्ली से निकलने वाली एक पत्रिका ‘नज़रिया’ की संपादक वल्लिका ने अपनी मां से मतभेदों के कारण घर छोड़ दिया। वल्लिका की मां दिल्ली सरकार के प्रशासन में ऊंचे पद पर कार्यरत हैं। पिछली बार जब दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 8 युवाओं को उठाया था, तो उन्होंने सबसे केवल वल्लिका के बारे में पूछा था कि वो कहां है। इसके लिए दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने एहतमामुल हक़ को धार्मिक नफरत से भरी गालियां दी उसके चेहरे पर काला कपड़ा बांधकर नंगा करके बुरी तरह पीटा था।

एक लड़के का सिर मल से भरे कमोड में घुसाया गया। लड़कियों के चेहरे पर भी काला कपड़ा बांधकर उन्हें पीटा गया, उनके पीरियड का समय होने के बावजूद उन्हें पैड नहीं बदलने दिया गया, जिससे उनके कपड़े खराब हो गये। लड़कों को उनकी महिला मित्रों के सामने नंगा करके लाया गया, अलग-अलग लोगों के अलग-अलग हिरासत के दिनों की अवधि, जो कि 10 से 5 दिनों तक की थी, उन्हें सोने नहीं दिया गया, सभी की बर्बर पिटाई की गयी और बेहद बुरी मानसिक स्थिति में उन्हें इस धमकी साथ उनके अभिभावकों को सौंपा गया, कि वे ‘दिल्ली के अन्दर कदम नहीं रखेंगे, जबकि उन पर कोई केस नहीं था।

इस घटना के सामने आने के बाद गायब वल्लिका ने अपनी मां के नाम फिर से एक खुली चिट्ठी मीडिया के माध्यम से जारी की, जिसमें उसने अपने परिचित-दोस्तों के साथ हुए इस व्यवहार के लिए अपनी मां अर्चना वर्मा को ज़िम्मेदार ठहराया, जो कि दिल्ली सरकार में शक्तिशाली पद पर आसीन हैं। वल्लिका ने अपने पत्र में अपनी मां की ऐसी सोच के कारण ही अपना मतभेद फिर से जाहिर करते हुए कहा कि इसी वजह से उसने घर छोड़ा और अब वह घर कभी नहीं लौटेगी। उसने अपने बारे में और कुछ नहीं लिखा कि वह कहां है।

उस समय पुलिस की इतने बड़े स्तर पर की गयी इस गैरकानूनी हरकत के खिलाफ पीयूसीएल ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखा, जिसका जवाब आज की तारीख तक नहीं आया। लेकिन अमूमन सिविल सोसायटी ने इस घटना पर उचित ध्यान नहीं दिया। पीड़ितों का कहना है कि वे भी अपने मानसिक ट्रॉमा और अभिभावकों के दबाव के कारण घटना पर ज़्यादा कुछ नहीं बोल सके। संभवतः इसी कारण दिल्ली पुलिस का यह असंवैधानिक साम्प्रदायिक और यौन कुण्ठा से बदबू मारता मनोबल बढ़ गया। 

मौजूदा घटना में उन्होंने 12 मार्च की दोपहर दो युवाओं मजदूर अधिकार संगठन के शिव कुमार और भगत सिंह छात्र एकता मंच की इलक्या को उस वक्त सादे कपड़ों में उठा लिया, जब वे दयाल सिंह कॉलेज से लौट रहे थे। वहां वे 31 मार्च को होने वाले एक कार्यक्रम के सन्दर्भ में कुछ अध्यापकों से बात करने गये थे। शाम तक उनके गायब होने की सूचना जब उनके दोस्तों को मिली, जिन्हें पिछले ऐसे ही अपहरण का अनुभव था, तो वे इलक्या के विजय नगर स्थित कमरे पर इकट्ठा होकर उसकी रूम मेट दृष्टि से मिलकर इस पर विचार कर रहे थे कि उन्हें कौन सी कानूनी कार्यवाही में जाना चाहिए और किस वकील से मिलना चाहिए।

तभी शाम के तकरीबन 7 बजे फिर से सादे कपड़ों में कई लोग जबरन कमरे में घुस गये, जिन्होंने सबसे पहले सबके सभी फोन, आईपैड, लैपटॉप छीन लिये। फिर वहां मौजूद एहतमामुल हक़, रूद्र विक्रम रॉय, गौरव, अक्षय, अविनाश यानि सभी लड़कों को पीटने लगे, एहतमामुल हक़ को उन्होंने फिर से ‘मुल्ला’ बोलते हुए साम्प्रदायिक गालियां दी। फिर उन्हें जबरन उठाकर गाड़ी में भर कर न्यू फ्रेण्डस कॉलोनी स्थित अपने अनाधिकृत, छिपे हुए यातना गृह में ले गये, जहां तक वकील या कोई अन्य पहुंच न सके। लक्षिता और इलक्या की रूम पार्टनर दृष्टि को उन्होंने उनके ही कमरे में बंद कर दिया और अंदर खुद भी बैठ गये, क्योंकि इन दोनों लड़कियों ने कहा कि वे तभी चलेंगी, जब उन्हें लिखित रूप में कानूनी नोटिस देकर बुलाया जायेगा।

पुरुष पुलिस वालों के साथ दो महिला कांस्टेबल भी कमरे के अन्दर थीं, सभी मिलकर रात भर उन्हें भला-बुरा कहते रहे कि उनके कारण उन्हें यहां ‘वेश्यालय जैसी गन्दी जगह’ में बैठना पड़ रहा है। महिला कांस्टेबल होने के बावजूद वे लड़कियों को बाथरूम का इस्तेमाल नहीं करने दे रहे थे, जबकि एक लड़की का पीरियड चल रहा था और वो पैड बदलना चाहती थी। ध्यान दीजिये कि इसके पीछे सुरक्षा का कोई मामला नहीं था, सिर्फ और सिर्फ प्रताड़ित करने की मानसिकता थी। सुबह छः बजे इन्हें भी न्यू फ्रेण्डस कॉलोनी के यातना गृह ले जाया गया, जहां दोनों लड़कियों ने इलक्या, शिवकुमार सहित अपने सभी साथियों को देखा। उनके अलावा मजदूर अधिकार संगठन के मंजीत बेनीवाल को भी, जिसे अन्य किसी जगह से इसी तरीके से अपहरण करके लाया गया था। 

यहां पर लड़कों को अलग कमरे में ले जाकर क्रूर यातनायें दी गयीं। दलित पृष्ठभूमि का होने के नाते मनजीत को जाति सूचक गालियां दी गयीं। उसे पूरा नंगा करके उसकी शर्ट से तीन कमरों में पोछा लगवाया गया। रूद्रविक्रम रॉय जो कि ट्रांस वूमेन हैं, उससे भी उसके कपड़ों से सफाई करवाई गयी, उसे जूठा खाना खाने को कहा गया, उनकी लैंगिक पहचान को लेकर भद्दे कमेण्ट किये गये, उसे भी नंगा करके रखा गया। इसी तरह अक्षय शिव कुमार, अविनाश और गौरव को भी नंगा करके एक दूसरे के सिर पर बैठने को कहा गया, एक दूसरे का लिंग छूने और खुद अपना (पुलिस वालों का) लिंग निकाल कर उसे चूसने को कहा गया, इंकार करने पर बुरी तरह से पीटा गया। सीने और पेट पर मारा गया और जातिसूचक, धर्मसूचक गालियां दी गयीं।

उन्हें उनकी महिला साथियों से जोड़ते हुए अश्लील बातें की गयीं। एक लड़की से यह पूछा गया कि उसे मुस्लिम लड़कों से ही सेक्स करने में क्यों मज़ा आता है। लड़कों को नंगा कर उनके लिंग पर बेल्ट के मेटल से मारा गया। अक्षय जिसके पैर में लिगामेंट का ऑपरेशन हो चुका है, को पैर फैलाकर बैठने को कहा गया, जिस पर कुर्सी रखकर वे खुद बैठ गये। एक लड़के को नंगा कर उसे उसका निपल छुआ गया और लाइटर से उसे जलाया गया। कमरे का तापमान एकदम ठण्डा कर लड़कों को रात भर उसमें ज़मीन पर सोने के लिए छोड़ दिया गया। लड़कियों को कहा गया कि अभी तुम्हारे दोस्तों को बुलवाकर तुम्हारा रेप करवायेंगे। इलक्या के मुंह पर एक ऐसा कपड़ा बांधकर घण्टों बिठाये रखा गया, जो पेशाब से भीगा हुआ था।

लड़कियों को पीरियड के पैड नहीं बदलने दिये गये, उन्हें बार-बार झाड़ू से पीटने की धमकियां दी जाती रहीं और डराया जाता रहा। शिव कुमार को उल्टा लटका कर उसके पैरों पर लाठियां बरसाई गयीं, उसे अपने साथी को थप्पड़ मारने को कहा गया, जब उसने इंकार किया तो उसे ही जोरदार थप्पड़ मारे गये। लड़कियों को रात भर दूसरे कमरों से चीखने की दर्दनाक आवाजें आती रहीं न केवल अपने साथियों की, बल्कि दूसरे लोगों की भी, जो कि इस यातना गृह की भयावहता के बारे में बताते हैं। लड़कों को एनकाउन्टर करने की धमकियां बार-बार दी जाती रहीं। भुक्त भोगियों ने बताया कि एनकाउण्टर स्पेशलिस्ट कहे जाने वाले एसीपी निशांत दहिया ने रूद्रविक्रम रॉय और शिव कुमार को एनकाउण्टर में मारे गये लोगों के क्षत-विक्षत शव की तस्वीरें दिखाकर पूछा कि वे किस तरीके से एनकाउण्टर में मरना पसंद करेंगे।

खूब पीटने के बाद पुलिस के लोगों ने शिव कुमार और रूद्र विक्रम रॉय से एक कागज़ पर जबरन यह लिखवाया कि ‘मैं तीन साल के लिए बस्तर जाकर अण्डर ग्राउण्ड हो रहा हूं कोई मेरी तलाश न करे’। यह लिखवाने के बाद उन्हें कहा गया कि ‘तीन साल के बाद तुम्हारा एनकाउण्टर हम करेंगे और बता देंगे कि तुम माओवादी हो’। शिव कुमार के सिर पर पिस्तौल सटाकर ट्रिगर दबाने का नाटक भी किया गया, फिर कहा गया ‘अभी नहीं तुम्हें तीन साल बाद मारेंगे’। मानसिक स्वास्थ्य खराब होने का हवाला देने के बावजूद उसे यह कहकर यातना दी जाती रहीं कि वह नाटक कर रहा है।

इस बीच इन सबके गायब होने की सूचना के बाद दिल्ली हाईकोर्ट में जब ‘हेबियस कार्पस’ दाखिल कर दिया गया, और उनके पास नोटिस आ गया, तो सभी बन्दी लोगों पर दबाव बनाया जाने लगा कि वे अपने घर वालों से कहें कि वे यह पेटिशन वापस ले लें। इतना ही नहीं, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल इतना अधिक असंवैधानिक हो चुकी है, कि मंजीत बेनीवाल का दोस्त अमन, जो कि उसकी मां को पेटिशन पर साइन कराने दिल्ली लेकर आया था, उसे भी दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने उसके घर के पास से उठा लिया और न्यू फ्रेण्डस कॉलोनी के इसी यातना गृह में ले आये। उसे भी सबके साथ ही छोड़ा।  

इस बार की अच्छी बात यह है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने 15 मार्च यानि इतवार के दिन हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई का दिन मुकर्रर कर दिया और न चाहते हुए भी दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को लोगों को छोड़ना पड़ा। कोर्ट के सामने अपने बचाव के लिए छोड़ने के समय सभी से बैक डेट वाली इस नोटिस पर साइन कराया गया कि ‘पूछताछ की नोटिस मिलने के बाद वे अपनी मर्जी से यहां आये हैं’।

इतना ही नहीं सारे भुक्तभोगी जब एम्स में अपने मेडिकल के लिए गये तो डॉक्टरों ने पहले तो उनकी चोटों को चिन्हित किया, लेकिन इसके बाद जब इस मामले में पुलिस को बुलाया गया तो उन चिन्हों को कागज़ों पर लिखने से इंकार कर दिया। यानि हेबियस कॉर्पस की अगली सुनवाई जो कि 27 मार्च को होनी है, उसके लिए पुलिस वालों ने सारे सुबूत मिटाने की शुरुआत कर दी है, बहुत मुमकिन है कि 27 के पहल वे ये काम वे आसानी कर लेंगे। 

गैरकानूनी हिरासत से छूटने के बाद पीड़ितों ने पीयूसीएल को बताया कि इस बार भी उनके सवालों में वल्लिका थी, लेकिन इस बार इसके साथ ही कुछ नये सवाल और धारणायें भी थीं, जिन्हें सभी को जानना ज़रूरी है। सार रूप में ये सवाल थे- 

-‘भगत सिंह की सूक्तियां यानि कोटेशन तुम लोग क्यों लिखते हो, वो तो आतंकवादी था, तुम लोग भी उसकी तरह आतंकवादी हो’।

-‘तुम लोग बार-बार छत्तीसगढ़ क्यों जाते हो’, (जबकि उनमें से कई कभी नहीं गये)।

-‘31 मार्च का कार्यक्रम (कारपोरेट लूट के खिलाफ) क्यों कर रहे हो, किसके कहने पर कर रहे हो, ये हम नहीं करने देंगे। क्योंकि 31 मार्च तक माओवादियों का सफाया करने का आदेश है। कुछ दिन के लिए तुम लोग कहीं चले जाओ, इस समय सीमा के खत्म होने के बाद ही दिखाई देना’।

-लड़कियों से पूछा गया कि ‘तुम मुसलमान के साथ सेक्स क्यों करती हो। एक लड़की के पिता को एक तस्वीर दिखाई गई, जिसमें ट्रेन की एक यात्रा में वह एहतमाम के कंधे पर सिर टिका कर सो रही है। यह दिखाकर कहा गया कि इस मुसलमान लड़के से अपनी लड़की को दूर रखो। उसे कमरे में बंद कर दो। उसे ‘संस्कार’ सिखाओ’। 

-रूद्रविक्रम रॉय से उसकी जेन्डर आइडेन्टिटी को लेकर भद्दे सवाल पूछे गये और उसका मज़ाक उड़ाया गया।

-लड़कों से उनकी सेक्स पार्टनर के बारे में सवाल पूछे गये और कहा गया कि वे उनसे दूरी बनायें।        

इन यातनाओं के ब्योरे अब सार्वजनिक हो चुके हैं, जिसे पढ़कर सिर शर्म से झुक जाता है कि यह लोकतान्त्रिक देश की पुलिस, जो कि राजधानी में बैठी है, द्वारा किया जा रहा है। लेकिन उससे भी ज्यादा इन व्यौरों से तीन बातें सामने आती हैं- 

पहला यह कि देश की पुलिस व्यवस्था और सुरक्षा एजेन्सियां माओवाद को खत्म करने की गृहमंत्रालय द्वारा तय समय-सीमा की सनक के कारण इतना अधिक दबाव में हैं कि वे इसके खात्मे के नाम पर किसी को भी परेशान कर सकती हैं, किसी भी कार्यक्रम को रोक सकती हैं, सारे लोकतान्त्रिक अधिकारों को कुचल सकती हैं, सभी लोकतान्त्रिक जगहों को खत्म कर सकती है, संविधान और कानून की धज्जियां उड़ा सकती हैं और कोई भी झूठा केस बनाकर किसी को भी ‘माओवादी’ बताकर उसका खात्मा कर सकती हैं, उसे जेल में डाल सकती हैं। अगले कुछ दिनों में सत्ता के ये ‘दोस्त’ कुछ भी कर सकते हैं।

दूसरा यह कि दिल्ली पुलिस हद दर्जे तक मर्दवादी सोच से बजबजा रही है और वह यौन कुण्ठा से अत्यधिक ग्रस्त है। इन यातनाओं के बारे में पढ़कर इस बात की अत्यधिक ज़रूरत लगती है कि दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के लोगों के अन्दर से मर्दवाद दूर करने के लिए उन्हें जनवाद की शिक्षा दी जाए। कार्यशालाओं द्वारा उन्हें विभिन्न लैंगिकताओं की शिक्षा दी जाये।

तीसरा यह कि उनकी यौन इच्छा पूरी करने के लिए और प्रेम कर सकने के लिए उन्हें छुट्टी दिये जाने की ज़रूरत है। लेकिन इसके साथ ही अपनी यौन इच्छा वे अपनी पार्टनर के साथ जनवादी तरीके से पूरा कर सके, इसके लिए उन्हें यौन शिक्षा दिये जाने की भी ज़रूरत है, ताकि वे अपनी यौन कुण्ठा से मुक्त हो सकें और इसका इस्तेमाल यातना देने के लिए न करें।

चौथा यह कि पुलिस में सभी जातियों और धर्मों का सम्मान करने की लोकतान्त्रिक शिक्षा की बेहद कमी है, जिसे पुलिस में अधिक से अधिक अल्पसंख्यकों और दलित जातियों की भरती करके पूरा किया जा सकता है।

अंत में यह कहना ज़रूरी है कि अगली बार जब भी आप न्यू फ्रेण्ड्स कालोनी के इस इलाके से गुजरें तो थोड़ी देर वहां रूक कर कान लगाकर ज़रूर सुनें कि सत्ता के ये जिगरी यार वहां किसी को यौन कुण्ठा से ग्रस्त थर्ड डिग्री यातना तो नहीं दे रहे हैं?

(लेखिका सीमा आजाद पीयूसीएल से जुड़ी मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और दस्तक पत्रिका की संपादक हैं।)  

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