अमेरिका-इजरायल का ईरान-युद्ध : शांति-वार्ता में सबसे बड़ी बाधा नेतन्याहू हैं

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 15 शर्तों वाले कथित शांति-प्रस्ताव को खारिज करते हुए ईरान ने अपनी तरफ से शांति-स्थापना के लिए अमेरिका के सामने अपनी 5 शर्तें सामने रखी हैं। पहले जान लें कि अमेरिका की 15 शर्तों वाले कथित शांति-प्रस्ताव में ज्यादातर ऐसी शर्तें थीं जिसे कोई भी स्वतंत्र देश हरगिज मंजूर नहीं करेगा। ईरान ने बिल्कुल ऐसा ही किया।

अमेरिका ने एक महीने के युद्ध-विराम के साथ ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को अत्यंत सीमित करने, हिजबुल्लाह और हमास जैसे प्रॉक्सी ग्रुप्स को समर्थन बंद करने, होर्मूज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने और नियंत्रण-मुक्त करने के अलावा ईरान के सैन्य बुनियादी ढांचे और मिसाइल-क्षमता को खत्म करने जैसी शर्तें रखी थीं।

इसमें होर्मूज को खोलने की शर्त पर ईरान सहमत हो सकता है क्योंकि युद्ध से पहले होर्मूज का रास्ता सबके लिए खुला ही था। लेकिन ट्रंप की ज्यादातर शर्ते बेमतलब और ईरान को बिल्कुल निरीह बनाने वाली थीं, जिसे कोई भी स्वाभिमानी और स्वतंत्र देश हरगिज नहीं मान सकता था। ईरान ने ऐसा ही किया। 

अब अमेरिका के सामने ईरान की पांच शर्तें हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक अमेरिका ने इन पर अपना मंतव्य स्पष्ट नहीं किया है। ईरान की 5 शर्तों में ज्यादातर वाजिब हैं। सिर्फ एक शर्त पर विवाद और सवाल उठाया जा सकता है।

पांच में सुसंगत या वाजिब चार शर्तें हैंः पहलीः ईरान के खिलाफ युद्ध और निशाना साधकर हत्या करने का सिलसिला खत्म हो। दूसरीः भविष्य में भी ईरान पर हमला नहीं होगा। इसकी गारंटी की जाय। तीसरीः मौजूदा युद्ध में हुए नुकसान का ईरान को मुआवजा मिले। चौथीःसभी मोर्चों पर संघर्ष और टकराव का अंत हो। ईरान की पांचवीं शर्त है कि होर्मूज जलडमरूमध्य पर ईरान के अधिकार को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिले। अमेरिका ही नहीं, दुनिया के कई अन्य देशों को भी ईरान की इस शर्त पर असहमति हो सकती है।

संयुक्त राष्ट्र संघ के ‘कन्वेन्शन ऑन द लॉ ऑफ सी’के अनुच्छेद 38 में साफ तौर पर कहा गया है कि किसी भी समुद्री जहाज या नौका को ऐसे समुद्री रास्तों के उपयोग की आजादी होगी। ईरान चूंकि संयुक्त राष्ट्र संघ के उक्त कन्वेंशन का हस्ताक्षरी नहीं है इसलिए वह कहता आ रहा है कि अनुच्छेद 38 या इस कन्वेंशन के किसी भी प्रावधान को मानने के लिए वह बाध्य नहीं है।

युद्ध छिड़ने के साथ ही उसने संयुक्त राष्ट्र को इस आशय का संदेश भी भेजा था कि वह ऐसे जहाजों या नौकाओं को इस समुद्री रास्ते से हरगिज नहीं आने देगा जो शत्रु-देश या उसके सहयोगी देश के होंगे। 

इस मामले में संयुक्त राष्ट्र संघ सहित विभिन्न देशों के साथ ईरान के विवाद उभर सकते हैं। पर पांच में उसकी जो चार शर्तें हैं, दुनिया के अनेक देश उन्हें वाजिब मान सकते हैं। लेकिन बात तो तब बनेगी जब अमेरिका और इजरायल भी इन्हें वाजिब मानें। क्या ये दोनों देश मानेंगे? असल सवाल यही है। इन पर स्पष्टता हुए बगैर शांति-वार्ता की शुरुआत के संकेत नहीं मिल रहे हैं। 

अमेरकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी 15 शर्तों में एक शर्त यह भी रखी थी कि ईरान अगर शांति स्थापना के लिए जरूरी उसकी शर्तों को मानता है तो वह ईरान पर लगाये आर्थिक प्रतिबंधों को पूरी तरह या चरणबद्ध ढंग से हटा लेगा। पिछले दिनों उसने युद्ध के बीच भी ईरान के तेल-निर्यात प्रतिबंध को ढीला किया था। लेकिन ईरान ने साफ कर दिया कि फिलवक्त वह तेल का निर्यात नहीं कर रहा है।

अमेरिका ने ईरान पर दशकों से बहुत कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं। समय-समय पर वह अन्य देशों पर भी ईरान से व्यापार न करने का प्रतिबंध थोपता रहता है। इससे ईरान की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ा है। 

ईरान पर हमला करने से पहले अमेरिका ने इजरायल पर भरोसा किया कि वह जल्दी ही ईरान को जीत लेंगे और वहां अपनी पसंद की सरकार बनाकर लौट आयेंगे। इसीलिए युद्ध के शुरू के दौर में दोनों देश बार-बार तख्ता-पलट की चर्चा करते रहते थे। ट्रंप लातिनी अमेरिकी देश वेनेजुएला में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी के ‘किडनैपिंग आपरेशन’ से कुछ ज्यादा ही उत्साहित थे। इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के ईरान जीतने के ब्लू-प्रिंट से प्रभावित होकर ट्रंप ने हमले को अपनी हरी झंडी दिखा दी।

इस रणनीति को अंजाम दिलाने में अमेरिकी रक्षामंत्री पीटर हेगसेथ, मध्य-पूर्व मामलों के सलाहकार स्टीव विटकॉफ और वरिष्ठ सलाहकार जे कुशनर(जो राष्ट्रपति ट्रंप के दामाद भी हैं) की बहुत अहम् भूमिका रही। लेकिन उपराष्ट्रपति जे डी वांस सहित ट्रंप के कई बड़े रणनीतिकार इस सोच से सहमत नहीं थे। युद्ध के बीच जिस तरह अमेरिका के आतंकवाद-रोधी राष्ट्रीय केंद्र के निदेशक जोसेफ केंट ने अपने पद से इस्तीफा देकर युद्ध की आलोचना की, उससे ट्रंप प्रशासन की काफी भद्द पिटी।

उसके कुछ ही दिनों बाद ट्रंप और उनके कुछ नजदीकी लोगों के ईरान-युद्ध से निकलने का कोई न कोई रास्ता खोजने की चर्चा होने लगी। 

डोनाल्ड ट्रंप अपने परस्पर-विरोधी बयानों, धड़ल्ले से बेतुका बोलने की हास्यास्पद शैली और ‘धमकी-भरी कूटनीति’ के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। अभी दो दिन पहले उन्होंने दावा किया कि ईरान के एक शीर्ष नेता से अमेरिका की बहुत अच्छी बातचीत चल रही है। जबकि ईरान के तकरीबन सारे बड़े नेता बयान देकर बोल चुके हैं कि अभी तक उनमें किसी की भी अमेरिकी प्रतिनिधि से बातचीत नहीं है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि ट्रंप हर हालत में ईरान युद्ध से निकलना चाहते हैं। इसकी कई ठोस वजहें हैं।

इस युद्ध के चलते दुनिया भर में तेल-गैस की किल्लत बढ़ी है। मंहगाई बेतहाशा बढ़ रही है और आगे मुश्किलों का अंबार दिख रहा है। इससे सिर्फ एशियाई या यूरोपीय देश ही नहीं, स्वयं अमेरिका भी प्रभावित हो रहा है। दूसरी समस्या राजनीतिक है। अमेरिका में अक्तूबर-नवम्बर में कांग्रेस और सीनेट के  मध्यावधि चुनाव हैं। ईरान युद्ध के कारण इस वक्त डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता का ग्राफ बहुत बुरी तरह गिरा हुआ है।

अगर वह किसी ठोस नतीजे के बगैर अगर लंबे समय तक यह युद्ध जारी रखते हैं तो उनकी लोकप्रियता का ग्राफ और गिरेगा। 

दरअसल, ट्रंप बुरी तरह फंसे हुए हैं। अगर वह इस युद्ध से कुछ हासिल किये बगैर ईरान की शर्तों पर ‘युद्ध-विराम’ करते हैं तो युद्ध-घोषणा के पहले दिन(28 फरवरी) से ही उन पर सवाल उठाने वाले डेमोक्रेटिक खेमे के अमेरिकी नेताओंं, वरिष्ठ रणनीतिकारों और जेफ्री सैक्स जैसे विचारकों की बातों की स्वीकार्यता बढे़गी कि राष्ट्रपति ट्रंप न सिर्फ एक विवेकहीन नेता हैं अपितु वह ‘इजरायली-यहूदी कारपोरेट लॉबी’ के दबाव में नीति-निर्धारण करते हैं।

दूसरी तरफ, अगर ट्रंप युद्ध-विराम नहीं करते और ईरान पर आगे और भी बड़ा हमला करते हैं तो युद्ध और लंबा खिंच सकता है। अगर ऐसे किसी अभियान में अमेरिकी सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ती है तो ट्रंप और भी अलोकप्रिय हो जायेंगे। तब रिपब्लिकन खेमे की तरफ से भी उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा, जो फिलहाल नहीं करना पड़ रहा है। 

युद्ध-विराम या युद्ध बंद करने के रास्ते में सबसे ज्यादा बाधा राष्ट्रपति ट्रंप के मित्र इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू हैं। ट्रंप ने जब ईरान के बड़े बिजली घरों और गैस-फील्ड आदि पर पांच दिनों के विराम की घोषणा की तब भी इजरायल का हमला जारी रहा। उस दौरान इजरायल ने ईरान के दो ऐसे केंद्रों पर हमला किया। जवाब में ईरान ने भी इजरायल पर जबर्दस्त हमला किया। इस बीच इजरायल बेरूत पर रोजाना हमले करके हिजबुल्ला को खत्म करने की भरपूर कोशिश कर रहा है।

साथ में ईरान के नेताओं की हत्याओं का उसका आपरेशन भी चल रहा है। ऐसे में युद्ध-विराम कैसे संभव होगा? लेकिन ट्रंप के लिए यह युद्ध वैसा नहीं जैसा नेतन्याहू के लिए है। इसलिए अमेरिका-इजरायल के ईरान-युद्ध के लिए अगले दो-तीन बहुत महत्वपूर्ण हैं। अमेरिका और ईरान भले ही आमने-सामने बैठकर कोई बात नहीं कर रहे हैं पर दोनों देश के शीर्ष नेता अपने बयानों के जरिये युद्ध-विराम को लेकर अपनी-अपनी राय जता रहे हैं।

समझा जाता है कि दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के साथ टर्की, पाकिस्तान और इजिप्ट के नेताओं का संपर्क लगातार बना हुआ है। इन तीनों देशों के शीर्ष नेता अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की कोशिश करते दिख रहे हैं। ऐसी स्थिति में ट्रंप चाहें तो युद्ध-विराम हो सकता है। नेतन्याहू उन्हें रोक नहीं सकते। जहां तक ईरान का सवाल है, उसने अपनी स्थिति साफ कर दी है। उसकी शर्तें बहुत ठोस और संक्षिप्त हैं। ट्रंप की शर्तों की तरह बेतरतीब और लंबी-चौड़ी नहीं हैं।

अमेरिका अगर ईरान की पांच में चार या तीन शर्तों पर भी ईमानदार सहमति जताता है तो बात बन सकती है। पर अमेरिका के कूटनीतिक इतिहास में ईमानदारी के लिए कभी कोई जगह नहीं रही। उसके लिए सहमति, सहयोग या सहकार के कोई मायने नहीं! वह अपने दुश्मनों के लिए ही नहीं, दोस्तों के लिए भी खतरनाक देश है। यह बात ईरान और इजरायल, दोनों को समझनी होगी।

अमेरिका के किंवदतीय कूटनीतिज्ञ हेनरी किसिंजर ने एक समय कहा थाः ‘अमेरिका का दुश्मन होना बेहद खतरनाक है लेकिन दोस्त होना भी कुछ कम घातक नहीं!’

(उर्मिलेश वरिष्ठ लेखक-पत्रकार हैं।)

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