एक दौर था जब मधु किश्वर पत्रकारिता के क्षेत्र में ओपिनियन मेकर थीं। इन्हें स्वतंत्र मीडिया पर सुनना और देखना सुकून देता था। तब न गूगल था और न स्मार्ट फोन। इनकी आवाज़ में विश्वास और साहस झलकता था। उनकी पत्रिका मानुषी का सितारा भी बुलंद रहा। 2014 में चुनाव के ठीक पहले मधु किश्वर ने गुजरात दंगों पर एक किताब लिखी थी जिसमें उन्होंने मोदी की जमकर तारीफ की थी। इसने उनकी छवि पर पानी फेर दिया। वे अंध भक्ति में लीन हो गईं।
अब बारह साल बाद उनकी पुस्तक मोदी नामा आई है। पहले तो यह लगा था कि इसमें भी उन्होंने मोदी जी का स्तुति गान किया होगा लेकिन आश्चर्य हुआ उन्होंने मोदी जी पर खुलकर चारित्रिक आरोप लगाए हैं।
हालांकि उन्होंने जिन आरोपों का उल्लेख किया उसे दिल्ली विधानसभा में कपिल मिश्रा पेश कर चुके हैं। जिन महिला सांसदों का नाम लेने से वे बच रहीं हैं उनमें से स्मृति ईरानी और कंगना रनौत तो खुलकर इस कहानी को अपने तरह से सामने रख चुकी हैं।
सबसे विस्फोटक बयान इस बाबत भाजपा सांसद और पूर्व वित्तमंत्री सुब्रमण्यम स्वामी वर्षों से लगा रहे हैं। किंतु इस सबके बावजूद मोदी जी ने कभी इस विषय पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उपयुक्त किसी भी व्यक्ति पर भी कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। बल्कि कपिल मिश्रा को भाजपा में लाकर युवा बढ़ा दिया। स्मृति ईरानी को तो जो फर्जी डिग्री धारी थी सांसद का चुनाव हारने के बाद भी मानव संसाधन जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठाया गया।
कंगना और आनंदी बेन के जलवों का क्या कहना?मानसी सोनी अमेरिका में शान शौकत से हैं। निजी ज़िंदगी पर अमूमन राजनीति में चर्चाएं नहीं होती हैं। लेकिन जब से एप्स्टीन फाइल में मोदी जी, उनके मंत्री हरदीप पुरी और उद्योगपति अनिल अंबानी के नामों का खुलासा हुआ तब से पीएम की निजी ज़िंदगी की दास्तानें सामने तेजी से आ रही है। इस पर भी अब तक पीएम कुछ नहीं बोल पाए हैं। जबकि इस फ़ाइल में नाम आने पर बहुत से लोग स्वेच्छा से अपने पदों से हट गए हैं। वे चुप्पी को निर्दोष होना समझते हैं। वे भ्रम में हैं।
बहरहाल, यह विषय आज मौंजू है इसलिए भी कि एक महिला लेखिका द्वारा इस खुलासे के बीच जिस तरह मानसिक अवसाद लंबे दशक तक झेला गया उससे वे बच सकती थीं यदि वे उस दबाव व घुटन को निर्भीकता पूर्वक 2014 के साल या बाद में उजागर कर देतीं और जो समय मोदी जी की अंधभक्त में गुज़ारी उस समय प्रतिरोध का स्वर मुखर होता तो बात दूसरी होती। उस दौरान इस पुस्तक का बहुत विक्रय भी होता। तथा मोदी जी की छवि तभी सामने आ जाती जो आज सामने लाई गई है। तो तरह के सवाल लेखिका पर नहीं लगाए जाते। कहा जा रहा है कि मोदी के बिगड़ते हालात देखकर वे मुखर हो रही हैं।
लेकिन समय अब बहुत बदल चुका है अंधभक्तों को कहीं कोई सम्मान नहीं मिल रहा है लेखिका के यू-टर्न लेने से कोई फायदा नहीं मिलने वाला। हां इतना ज़रूर है मोदी नामा मोदी की घृणित महिला शोषण पर केंद्रित यह किताब एक दस्तावेज के रूप में काम ज़रूर आएगी।
कुछ लोगों द्वारा यह भी कहा जा रहा है कि यदि मधु किश्वर जी के पास मोदी जी के चरित्र से जुड़े प्रामाणिक दस्तावेज हैं तो उन्हें प्रेस में जारी करना चाहिए तथा उसके आधार पर मोदी जी पर कानूनी कार्रवाई करने अदालत भी जाना चाहिए। यदि इस बदले माहौल में लेखिका इन दो तरीकों को अपनाती है। तो उनका पूर्ववर्ती जलवा फिर वापस होने की उम्मीद है। वर्ना एक महिला सामाजिक कार्यकर्ता, मुखर पत्रकार और लेखिका मधु किश्वर का किरदार संदेहास्पद ही रहेगा।
(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)