लंबे शासन के रिकॉर्ड पर मैं किस बात का जश्न मनाऊँ?

सरकारी मीडिया में काम कर रहे एक महाशय ने अपनी फेसबुक पोस्ट में सबसे ज्यादा दिन तक सरकार चलाने का रिकॉर्ड बनाने पर मुखिया जी को दुनिया का सबसे शानदार नेता घोषित कर दिया। उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि इस रिकॉर्ड के पीछे कोई तो वजह होगी! और आलोचना करने वाले बुद्धिजीवियों की लानत-मलामत भी किया।

अरे भाई, ‘कोई तो वजह होगी’ लिख कर तो आपने खुद ही मुखिया जी की आलोचना कर दिया है। आपके पास तो गिनाने के लिए हजारों वजहें होनी चाहिए थीं।

खैर, सरकारी नौकरों को तो वैसे भी ज्वाइन करते ही नौकर की क़मीज पहना दी जाती है। उन्हें इस क़दर सीसीएस आचार संहिता से बांध दिया जाता है कि वे सरकार को ही देश समझने लगते हैं। यूं तो सरकार भी खुद को ही देश समझती है।

लेकिन सरकारी मीडिया के तो क्या ही कहने! पुराने राज दरबारों के चारणों-भाटों में भी आज के इन चापलूसों से ज्यादा आत्म सम्मान होता होगा।

आज जब पूरे मीडिया पर ही सरकार-पोषित कॉरपोरेट घरानों का क़ब्जा हो चुका है, तो सरकारी मीडिया वाले इन बेचारों को भी अपने सारे मुखौटे फाड़कर अब प्राइवेट मीडिया के इन निकृष्टतम चाटुकारों से मुकाबला करना पड़ रहा है।

बहरहाल, प्रशंसा करते समय उन महाशय को मुखिया जी के लंबे शासन के रिकॉर्ड की बजाय उनके द्वारा देश की जनता के सर्वांगीण विकास की दिशा में किये गये योगदानों पर चर्चा करनी चाहिए थी।

आम चर्चाओं में भी लोग इस पर ज्यादा बातचीत नहीं करते हैं कि कौन कितने दिन जिया, बल्कि किसने कितना महत्वपूर्ण योगदान दिया, इस पर बात करते हैं।

मेरे कुछ सवाल हैं:

-क्या देश के पिछड़े इलाक़ों का औद्योगीकरण हो चुका है?

-क्या युवाओं को अब अपने घरों के आस-पास ही विश्वसनीय रोजगार उपलब्ध होने लगा है?

-क्या हमारे युवाओं को अब यूपी, बिहार, असम, बंगाल, उड़ीसा से भागकर दिल्ली, मुंबई, बंगलौर, सऊदी अरब, ओमान, कतर, रूस, यूक्रेन, कनाडा, अमरीका नहीं जाना पड़ता है?

-क्या इन जगहों पर उनके साथ क्षेत्रीय, भाषाई, नस्लीय और आर्थिक भेदभाव और शोषण अब नहीं होता है?

-क्या हमारे युवाओं को अब जान पर खेलकर डंकी मार्गों से अवैध आप्रवासियों के रूप में पश्चिमी देशों में नहीं जाना पड़ रहा है?

-क्या हमारे मजबूर युवाओं को हथकड़ियों-बेड़ियों में जकड़ कर, कार्गो ढोने वाले जहाजों में ठूंसकर हमारे हवाई अड्डों पर नहीं फेंका जा रहा है?

-क्या हमारे देश के हर बच्चे को एक समान, उन्नत, वैज्ञानिक चेतना से लैश, विश्वस्तरीय शिक्षा सुनिश्चित हो चुकी है?

-क्या हमारे हर नागरिक को भरपूर पोषक आहार से परिपूर्ण भोजन की निश्चिंतता सुनिश्चित हो चुकी है?

-क्या हमारे हर नागरिक के स्वास्थ्य और जीवन के साथ एक जैसा ट्रीटमेंट सुनिश्चित हो चुका है?

-क्या नवजात से लेकर वृद्धा तक, हर स्त्री के साथ मानवीय और गरिमापूर्ण व्यवहार सुनिश्चित हो चुका है?

-क्या ग़रीबों, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, स्त्रियों और किसी भी तरह की कमजोरी के शिकार हर नागरिक की सुरक्षा, क़ानून तक पहुंच और किसी भी तरह के भेदभाव, शोषण और उत्पीड़न से मुक्त गरिमामय जीवन सुनिश्चित हो चुका है?

-क्या हमारे देश की संपत्ति और आर्थिक समृद्धि में हर नागरिक को बराबर भागीदारी मिलने लगी है?

-क्या हमारे देश में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई पटने लगी और बराबरी आने लगी है?

-क्या चुनाव प्रणाली की पारदर्शिता बढ़ी है?

-क्या राजनीति में भ्रष्टाचार खत्म हो गया है और चुने गये सांसदों, विधायकों और पार्षदों की खरीद-फरोख्त अब खत्म हो गयी है?

-क्या अब राजनीति बेलगाम सत्ता भोगने की बजाय वास्तव में जनता और देश की सेवा का माध्यम बन चुकी है?

-क्या सत्ता हथियाने के लिए सांप्रदायिक उन्माद फैलाने की राजनीति अब बंद हो चुकी है और हम एक मजबूत और समरस समाज बन चुके हैं?

-क्या सरकार का विरोध करने वालों या अपना हक़ मांगने वालों की बातें अब सहानुभूति पूर्वक सुनी जाने लगी हैं, और उनका समाधान किया जाने लगा है? उन पर फर्जी मुक़दमे चला कर उन्हें जेलों में ठूंसा जाना बंद हो चुका है?

-क्या सरकार की नीतियों की मुख़ालफ़त करने वालों, धरना-प्रदर्शन करने वालों के घरों को अब बुलडोजर से गिराया जाना बंद हो चुका है?

-क्या शासन की नीतियों का विरोध करने वालों, विरोध में लिखने वालों की सोशल मीडिया पोस्टों को अब हटवाया नहीं जाता? उनके एकाउंट्स अब ब्लॉक नहीं कराये जाते?

-क्या सत्ताधारी पार्टी की विचारधारा के खिलाफ लिखने, बोलने, व्यंग्य करने वाले, फिल्में बनाने वाले कवियों, लेखकों, व्यंग्यकारों, फिल्मकारों के खिलाफ सत्ताधारी पार्टी से जुड़े गिरोह, उसकी मीडिया और सत्ता अब पुलिस, इन्कम टैक्स, ईडी, सीबीआई वगैरह का इस्तेमाल करके उन्हें रगड़ कर उनकी भूसी नहीं छुड़ाती है?

ये सवाल जब तक हल नहीं होते हैं, तब तक किसी के सबसे ज्यादा दिन शासन करने का रिकॉर्ड बनाने से देश का क्या?

देश की ऐसी हालत के बावजूद ज्यादा दिन सत्ता में रहने का रिकॉर्ड बनाने पर खुश होना और जश्न मनाना देश की आत्मा से विश्वासघात करने जैसा है। जिसका रिकॉर्ड टूटा, और जिसने तोड़ा, उन सबके लिए लानत है।

हालत यह है कि देश में ग़रीबी और बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ रही है। जीवन बचाने की कोशिश में भारी स्तर पर आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय पलायन बढ़ रहा है। स्तरीय शिक्षा और स्वास्थ्य का स्तर लगातार गिर रहा है। ग़रीबों, कमजोरों और यहां तक कि निम्न मध्यवर्ग के लोगों के लिए न्याय हासिल कर पाना एक दुःस्वप्न बन चुका है।

अधिकांश संपदा और आय चंद अमीरों की तिजोरियों में क़ैद हो रही है। सत्ता बनाने और बचाने के लिए जघन्यतम तिकड़में की जा रही हैं। राजनीतिक फायदे के लिए सांप्रदायिक तनाव पैदा किये जा रहे हैं और देश को भीतर से कमजोर किया जा रहा है।

वैज्ञानिक चेतना को कुंद किया जा रहा है और अंधविश्वास, कर्मकांड, तंत्र-मंत्र, जादू-टोने, झाड़-फूंक को खुद सत्ता द्वारा महिमामंडित किया जा रहा है। ज्यादातर राजनेताओं, बड़े पुलिस अधिकारियों, न्यायाधीशों, नौकरशाहों और बड़ी मीडिया हस्तियों का कॉरपोरेट शक्तियों से गठबंधन हो चुका है और वे मिलकर अकूत संपत्तियां बनाने में मशगूल हैं। वे देश की सारी अचल संपदा, नदियों, जंगलों, पहाड़ों, जमीनों की बेतहाशा लूट में और आपसी बंदरबाट में लगे हुए हैं।

इस लूट का विरोध करने वाली सारी आवाजों का न केवल गला घोंटा जा रहा है, बल्कि उन्हें आतंकवादी क़रार देकर भयानक दमन-उत्पीड़न किया जा रहा है। दरबारी मीडिया चौबीसों घंटे झूठ परोसने में लगा हुआ है, लोगों का ध्यान असली मुद्दों से भटकाने के लिए नक़ली विकास के झुनझुने सुना रहा है।

ऐसे में कोई मुझे बताये, कि एक आम नागरिक के तौर पर मैं किस बात का जश्न मनाऊँ?!

(सिद्धार्थ कबीर लेखक और टिप्पणीकार हैं।)

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