आखिर ईरान में क्यों असफल है अमेरिका?

आयतुल्लाह सैयद अली खामनेई की शहादत के समय ये तस्वीर आम जनता के सामने रखी गयी कि एक राष्ट्र के सबसे प्रमुख व्यक्ति के जाने से वह राष्ट्र दिशाहीन हो जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका और इजराइल के राष्ट्राध्यक्षों, और उनसे प्रभावित मीडिया की सोच यही थी कि ईरान के सर्वोच्च नेता की शहादत के बाद उनका परमाणु कार्यक्रम समाप्त हो जाएगा, और इस वजह से वो किसी भी परमाणु खतरे से बच जायेंगे।

साथ ही ये नेतृत्व परिवर्तन का आधार बन जाएगा। पर, न ये पहली बार है, और न ये पहला मोर्चा है, जिस पर अमेरिका ईरान के सामने अपनी लक्ष्य प्राप्ति में विफल हुआ है। 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति आने से लेकर अब तक तमाम प्रयासों के बाद भी अमेरिका ईरान को नहीं झुका पाया। इस लेख में यही जानने का प्रयास किया गया है कि आखिर क्यों ईरानी नेतृत्व पर अमेरिकी साम्राज्यवाद हावी नहीं हो पाया।

इस दौर में नेतृत्व को पहचानने का जो कॉमन सेंस है, वो पश्चिमी प्रजातंत्र और संस्कृति की सोच पर आधारित है। जिस तरीके से वेनेज़ुएला या भारत में राष्ट्राध्यक्ष चुने जाते हैं, उसी तरीके से ईरान में निर्णायक नेतृत्व तय नहीं होता है। ईरान एक शिया इस्लामिक गणतंत्र है, जो विलायत – अल – फ़की (Guardianship of Jurist) की व्यवस्था पर चलता है। इसमें जनता द्वारा चुने गए जन प्रतिनिधियों, सेना और सरकार के अन्य अंगों के ऊपर सर्वोच्च धार्मिक नेता होता है, जिसे समकक्षी धार्मिक नेताओं का एक समूह, उसकी योग्यता के आधार पर चुनता है।

इसी तरीके की व्यवस्था इराक में भी है, जहाँ प्रजातंत्र, गणतंत्र और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में आयतुल्लाह सैयद अली अल सिस्तानी सर्वोच्च धार्मिक नेता हैं, जिनका अबू बकर अल बगदादी के इस्लामिक स्टेट (ISIS) के खिलाफ दिया गया फतवा इराकी सेना को भी मानना पड़ा था ।इन सर्वोच्च धार्मिक नेताओं का अनुसरण या तकलीद, पूरी दुनिया में उनके अनुयायियों (मुक़ल्लिदों) को मानना अनिवार्य होता है।

शिया इस्लामिक नेतृत्व के रूप में आयतुल्लाह और उनके अनुसरण (तकलीद) की भूमिका  

इस व्यवस्था को समझने के लिए इस्लाम के इतिहास में जाना ज़रूरी है। हज़रत पैगम्बर मोहम्मद साहब (स०अ०व०), जिन पर इस्लाम मुक़म्मल हुआ, वो मुसलमानों के न केवल धार्मिक अपितु, राजनीतिक और सैन्य नेतृत्वकर्ता भी थे। उनके पश्चात मुसलमान दो प्रमुख गुटों में बंट गए: शिया एवं सुन्नी। सुन्नी मुसलामानों के धार्मिक नेतृत्व के तौर पर खलीफा के साथ, तथा राजनीतिक और सैन्य नेतृत्वकर्ता के तौर पर सुलतान का सह – अस्तित्व रहा है, और 1258 – 60 ई० के मध्य सुन्नी मुसलमान बिना किसी खलीफा के थे।

दूसरी तरफ शिया मुसलामानों में इमामत का सिद्धांत चला, जिसमें हज़रत पैगम्बर मोहम्मद साहब (स० अ० व०) की ही तरह आने वाले सारे इमाम, अपने दौर के शियाओं के धार्मिक, राजनीतिक और सैनिक, तीनो आयामों का एकमात्र नेतृत्वकर्ता थे। शिया मुसलामानों में 12 इमाम हैं, और 11 वें इमाम का दौर 874 ई० तक रहा। उसके पश्चात 12 वें इमाम, जो कि गैबत (ज़ाहिर नहीं) में हैं, उनका दौर अभी तक जारी है। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो क़यामत तक का दौर आखिरी 12 वें इमाम का है। ये अभी परदे में हैं, और इस्लामिक दृष्टिकोण से हदीस के अनुसार कुछ निशानियां पूरी होने पर उनका ज़हूर (प्रकटीकरण) हो जायेगा। 12 इमामों को मानने के कारण इन्हें शिया-इशना-अशरी (Twelver) कहा जाता है।

इमामों को हज़रत पैगम्बर मोहम्मद साहब (स०अ०व०) की आध्यात्मिक, धार्मिक, राजनीतिक, और सैनिक सत्ता का ईश्वर की तरफ से तय किया हुआ वारिस माना जाता है। वो पैग़म्बर साहब के जितने ही पवित्र और सच्चे हैं। शिया मतावलंबियों के लिए जिस तरीके से पैगम्बर, खुदा का सबूत और उस तक जाने का जरिया हैं, उसी तरह इमाम भी ईश्वर की सत्ता, और उसके गुणों के उत्तराधिकारी के तौर पर हैं। चूंकि ईश्वर के बाद सर्वोच्च सत्ता के तौर पर मौजूदा इमाम परदे में हैं, इसलिए शिआयों की धर्म एवं विधि शास्त्र सम्मत हिदायत के लिए विशेषज्ञ की आवश्यकता है, जिसे वली – अल – फ़की, और इस व्यवस्था को  विलायत – अल – फ़की (Guardianship of Jurists) कहा गया।

विलायत – अल – फ़की (Guardianship of Jurists) के मायने 

विलायत – अल – फ़की दो शब्दों से मिलकर बना है। विलायत के मूल शब्द वली का अर्थ होता है – देखरेख का ज़िम्मेदार या संरक्षक (Guardian)। फ़की का मूल शब्द फिक़ा है, जिसका मतलब विधिशास्त्र (Jurisprudence) है – ये शिआयों के छठे इमाम – इमाम जाफर सादिक अ० स० प्रदत्त इस्लामिक विधिशास्त्र है जिसे फ़िकह – ए – जाफरिया कहते हैं। इस प्रकार विलायत – अल – फ़की, फ़िकह – ए – जाफरिया के विशेषज्ञ द्वारा संरक्षण की व्यवस्था को कहते हैं। इसके लिए जो संरक्षक चुना जाता है, उसे वली – अल – फ़की कहते हैं।

संरक्षक बनने के लिए पहली आवश्यकता फ़िकह – ए – जाफरिया की संपूर्ण जानकारी होना है। इसके लिए हौज़ा (शिया मदरसों) में दशकों की लम्बी पढ़ाई एवं इज्तिहाद (किसी प्रश्न का विधि सम्मत उत्तर प्राप्त करने की प्रक्रिया) के पश्चात विद्यार्थी मुजतहिद (विधिवेत्ता) बनता है। जिन मुजतहिद को बाकी मुजतहिद, ज्ञान और नेतृत्व के मामले में बेहतर मानते हैं, वो ही आयतुल्लाह कहलाते हैं, जिसका अर्थ होता है अल्लाह की निशानी। और, जिन आयतुल्लाह को बाकी आयतुल्लाह बेहतर मानते हैं, वो आयतुल्लाह अल उज़मा (Grand Ayatollah) कहलाते हैं। ये आयतुल्लाह अल उज़मा मर्जा – ए – तकलीद भी होते हैं। जब कोई गैर मुजतहिद या आम आदमी, धार्मिक मामलों के उत्तर अथवा समाधान ग्रहण करता है, तो उसे तकलीद (अनुसरण) कहते हैं। तकलीद करने वाला मुक़ल्लिद और जिस मुजतहिद की तकलीद की जाती है, वो मर्जा – ए – तकलीद कहलाता है।

यहां मूल शब्द तकलीद (अनुसरण) है क्योंकि ये धर्म के सॉफ्टवेयर की तरह है। शिया इस्लाम में 5 मूल सिद्धांत अथवा उसूल – ए – दीन हैं : तौहीद (एक खुदा को मानना), अदालत (खुदा के न्याय में विशवास रखना), नबूवत (पैग़म्बरों पर यकीन रखना), इमामत (आखिरी पैगम्बर के बाद 12 इमामों पर यकीन रखना) और क़यामत। इन पर अपनी समझ से विश्वास करना अनिवार्य है और किसी की तकलीद (अनुसरण) आवश्यक नहीं है।

इन 5 मूल सिद्धांत अथवा उसूल – ए – दीन का व्यवहारिक प्रदर्शन फुरु – ए – दीन कहलाता है, जो मनुष्य को ईश्वर के करीब लाता है। इनकी संख्या 10 है : नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात, ख़ुम्स, जिहाद, अम्र बिल मारूफ (अच्छाई की दावत), नहीं अनल मुनकर (बुरे का प्रतिरोध), तवल्ला (पैग़म्बर मुहम्मद और उनके परिवार से प्रेम करना) और तबर्रा (पैग़म्बर मुहम्मद और उनके परिवार के दुश्मनों से अलगाव रखना)। इन 10 व्यवहारिक प्रदर्शनों को धर्म और विधिशास्त्र सम्मत तरीके से करने का तरीका बताने के लिए सबसे बड़ी आधिकारिक सत्ता तो पैग़म्बर के उत्तराधिकारी के तौर पर इमाम की ही होती है।

परंतु, इमाम के ग़ैबत में होने की वजह से शास्त्र के सबसे बड़े जानकारों के तौर पर इस आवश्यकता को पूर्ति मर्जा – ए – तकलीद करते हैं। उनका अनुसरण (तकलीद) अनुयायी (मुक़ल्लिद) पर वाजिब होती है। जो शिया इस व्यवस्था में यकीन नहीं रखता वो गैर – मुक़ल्लिद अखबारी कहलाता है, और वो इस व्यवस्था का विरोध करते हैं। इसके विपरीत मुक़ल्लिद उसूली शिया कहलाते हैं।

उल्लेखनीय है कि हर चीज़ पर विशिष्ट रूप से आधिकारिक सत्ता को इस्लामिक शरियत द्वारा स्थापित नहीं किया गया है। ऐसे विषय जो बदलते दौर में भी सामने आते रहे, और जिनके लिए विशिष्ट प्रावधान नहीं है, उनको उमूर – ए – हिस्बिया कहा जाता है। इसी के अंतर्गत किसी देश की अर्थव्यवस्था, रक्षा इत्यादि से लेकर तम्बाकू तक सारे मसले आते हैं । उमूर – ए – हिस्बिया पर भी मर्जा – ए – तकलीद का अनुसरण मुक़ल्लिद पर वाजिब होता है।

इतिहास और वर्तमान में आयतुल्लाह या मर्जा – ए – तकलीद की भूमिका  

इन सब के मूल में शियाओं के छठे इमाम – इमाम जाफर सादिक अ० स० प्रदत्त इस्लामिक विधिशास्त्र है जिसे फ़िकह – ए – जाफरिया कहते हैं। इमाम जाफर सादिक अ० स० स्वयं इस्लामिक धर्मशास्त्र और विधि-विशेषज्ञ होने के साथ-साथ चिन्तक, दार्शनिक और वैज्ञानिक थे। उनके शिष्यों में सुन्नियों के इमाम अबू हनीफा, रसायन शास्त्र के विद्वान जाबिर इब्ने हय्यान, अलगोरिथ्म के संस्थापक अल ख्वारिज्म इत्यादि शामिल थे।

इसी प्रकार शेख अल तूसी ईरानी मूल के विशेषज्ञ थे, जो हलाकू के दौर में थे।ये विधि विशेषज्ञ होने के साथ दार्शनिक, खगोल शास्त्री, गणितज्ञ, जीवनीकार, और परंपराओं के विशेषज्ञ भी थे।कहा जाता है कि किताबों के जलने के बाद भी इन्होंने इज्तिहाद के अवधारणा को सशक्त किया, और नजफ़ (इराक) में भी हौज़े की स्थापना की। स्पष्ट है कि इस्लामिक धर्म और विधिशास्त्र के साथ-साथ अन्य ज्ञान की शाखाओं की विशेषज्ञता की परंपरा रही है। साथ ही इस धारा में संस्थाओं का निर्माण और लोगों को तैयार करने की भी परंपरा रही है।

इसी क्रम में सैयद दिलदार अली नकवी उर्फ़ गुफ़रान मआब (1753 – 1820) भारत के पहले मुजतहिद, आयतुल्लाह अल उज़मा, एवं मर्जा – ए – तकलीद थे। इन्होंने उस दौर में 1776 तक भारत में पढ़ाई की, और 1778 तक इराक व ईरान में कई आयतुल्लाह अल उज़मा के शिष्य के तौर पर अध्ययन किया। 1790 में इन्होंने लखनऊ में इमामबाड़ा गुफ़रान मआब की स्थापना की, जो आज भी स्थित है। इन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के शियाओं को एक कौम की तरह संगठित किया, अखबारी, सूफी और बाकी फिरकों से बहस और लेखन के मामले में अपनी श्रेष्ठता साबित की, तथा बहुत सारे अखबारियों, सूफियों और अन्य मतावलंबियों को उसूली शिया समुदाय में समाहित किया।

वर्तमान भारत के लखनऊ शहर को एक शिया मरकज़ (केंद्र) के रूप में स्थापित किया, जो आज भी उसी तरह है। साथ ही वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान, बर्मा और श्रीलंका में शिया समुदाय के पहले मर्जा – ए – तकलीद बने और अज़ादारी समेत बाकी धार्मिक और विधिक मसलों को शिया धर्मशास्त्र एवं विधिशास्त्र से सम्मत किया। आज हम जो भारतीय उपमहाद्वीप में शिया समुदाय में अज़ादारी, ताजियादारी, मजलिस, महफ़िल इत्यादि का एक शास्त्र सम्मत स्वरूप देते हैं, इसकी बुनियाद इन्होंने ही रखी थी। यहाँ तक कि उस दौर में लखनऊ और बंगाल समेत सारे शिया नवाब भी उनकी तकलीद और पैरवी करते थे।

इसी परंपरा में कुदरतुल आरिफीन जनाब सैयद अली साहब (1800 – 1868) को बिहार का पहला मुजतहिद माना जाता है। वर्तमान में भारतीय उपमहाद्वीप के शिया समुदाय ईरान और इराक के मर्जा या मर्जा – ए – तकलीद /आयतुल्लाह अल उज़मा की तकलीद करते हैं, जिनमें प्रमुख शख्सियतों में आयतुल्लाह अल उज़मा सैयद अली अल सिस्तानी हैं, और दिवंगत आयतुल्लाह सैयद अली खामनेई (र० अ०) भी थे ।

जब से ईरान शिया मुल्क बना है, तब से उलेमा का समाज में बड़ी भागीदारी रही है।और मर्जा – ए – तकलीद के प्रभाव को आयतुल्लाह अल उज़मा मिर्ज़ा शिराज़ी के दिसम्बर, 1891 के फतवे से समझा जा सकता है। उस समय नासिर अल दीन शाह काजर ने तम्बाकू को उगाने, बेचने, और निर्यात पर अधिकार ब्रिटिश कंपनी को दे दिया। ईरान में तम्बाकू का बहुत ज्यादा उत्पादन और उपभोग दोनों होता था। इस कानून से किसानों, और व्यापारियों, दोनों को समस्या थी। उनके बढ़ते विरोध के आलोक में आयतुल्लाह अल उज़मा मिर्ज़ा शिराज़ी का फ़तवा तम्बाकू के प्रयोग के खिलाफ आ गया, और लोगों ने तम्बाकू के खेतों और गोदामों को आग लगाना शुरू कर दिया, जिससे सरकार को झुक कर अपना निर्णय वापस लेना पड़ा। स्पष्ट है कि शिया राष्ट्र होने के कारण मर्जा – ए – तकलीद का एक व्यापक प्रभाव भी होता है।

1979 में ईरान में जब इस्लामिक क्रांति आई तो उसे ईरान का इस्लामिक गणतंत्र कहा गया। इसमें गणतांत्रिक रूप से राष्ट्राध्यक्ष /राष्ट्रपति की व्यवस्था थी। साथ ही इस्लामिक रूप से ऊपर बताये गए उमूर – ए – हिस्बिया की श्रेणी के अंतर्गत शासन विधि को रखते हुए देश के शासन को इस्लामिक फुकहा / मुजतहिद के हवाले किया। विलायत -अल – फ़की पर आधारित इसी व्यवस्था को इमाम खुमैनी ने प्रस्तुत किया, और इसे मुजतहिदों की सभा ने संविधान में स्थापित किया।

ईरानी संविधान के अनुच्छेद 5 में ये स्पष्ट कर दिया गया कि इमाम के ग़ैबत में रहने की स्थिति में उम्मत/ राष्ट्र का नेतृत्व और संरक्षण एक ऐसे न्यायप्रिय और पवित्र फुकहा (मुजतहिद) के हवाले रहेगा, जो अपने दौर की परिस्थितियों का ज्ञाता हो, साहसी, उपाय कुशल और बेहतर प्रशासनिक क्षमता वाला हो। बाद के अनुच्छेदों में इसकी प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया है। इसी के तहत मुजतहिदों और वकीलों की एक कौंसिल का निर्माण किया गया, जिसे शूरा – ए – निगेहबान कहा गया। इसमें सुप्रीम लीडर द्वारा चुने गए 6 मुजतहिद, और मजलिस द्वारा चुने गए 6 वकील शामिल हैं।

उनकी प्रमुख शक्तियों में विधेयक पर वीटो लगाने, मुख्य न्यायधीश का चुनाव करने, और प्रत्याशियों को अस्वीकृत करने का अधिकार है। इस प्रकार जो मुजतहिद हैं, वो देश की नीति निर्धारण में निर्णायक भूमिका में हैं। साथ ही ये जनता के मध्य धार्मिक सत्ता का महत्व भी रखते हैं, और इनका अनुसरण जनता के लिए आवश्यक है। ये व्यवस्था जितनी ही संवैधानिक है, उतनी ही धार्मिक भी है।

इसी प्रकार इराक में आयतुल्लाह अल उज़मा एवं मर्जा – ए – तकलीद मोहम्मद बाकिर अल सद्र (1935 – 1980), जिन्हें शहीद-ए-खामिस (पांचवा शहीद) भी कहा जाता है, को 1979 में ईरान क्रांति के बाद इराक के शिया समुदाय ने अपना लीडर घोषित किया था, और सद्दाम हुसैन विरोधी आन्दोलन चालू हो गए। इसी को दबाने के लिए सद्दाम हुसैन ने इनको और इनकी बहन सैयदा बिन्त अल हुदा को गिरफ्तार करके उनकी हत्या कर दी। इनका प्रभाव ये था कि लोग इनके धार्मिक के साथ-साथ राजनीतिक लीडर के तौर पर देख रहे थे। साथ ही इन्होंने दर्शनशास्त्र पर “फल्सफातुना” और अर्थव्यवस्था पर “इक्तिसादुना” नामक किताबें लिखी, जिसे समाजवाद और पूँजीवाद की समकालीन समालोचना और प्रत्युत्तर माना जाता है।कहा जाता है कि कुवैत ने इनकी ही सलाह पर इस्लामिक बैंक की स्थापना की थी।

आयतुल्लाह / मर्जा – ए – तकलीद और उनके अनुसरण (तकलीद) की व्यवस्था का प्रतिरोध और भविष्य 

इस व्यवस्था के विरोध का भी एक संक्षिप्त इतिहास रहा है। जैसा कि ऊपर बताया गया है, जो तकलीद करते हैं, उनको उसूली शिया कहा जाता है, और जो तकलीद नहीं करते वो अखबारी कहलाते हैं। ये विभाजन और बहस हमेशा संस्थाओं के भीतर रही, और इस पर उलेमा बहस करते रहे। मोहम्मद अमीन अस्तराबादी, जिनका निधन 1627 में हुआ था, पहले अखबारी शिया कहलाते हैं। इसी कड़ी में यूसुफ इब्ने अहमद अल बहरानी (1695-1722) कर्बला में सबसे लोकप्रिय अखबारी मुजतहिद थे, जिनके छात्रों की तादाद बहुत ज्यादा थी। लेकिन उसूली मुजतहिद मोहम्मद बाकिर बेह्बानी (1706 – 1791) ने कर्बला में उनको बहस में हरा दिया, और यूसुफ बहरानी साहब ने वसीयत की जिसके मुताबिक उनकी नमाज़-ए-जनाज़ा मोहम्मद बाकिर बेह्बानी ने पढ़ाई। इसके साथ ही इस बहस का संस्थागत समापन हो गया।

आधुनिक दौर में सीआईए, मोसाद, ऍमआई-6 इत्यादि ने इस संस्थागत बहस को पुनः जीवित करने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो सके। इसके लिए उन्होंने गैर – मुजतहिद, गैर – उलेमा लोगों के माध्यम से भी लोगों में विभाजन का प्रयास किया लेकिन वो सफलता प्राप्त नहीं कर पाए। आज भी खुद को अखबारी कहते हुए, या उसकी मुहिम चलाते हुए कई लोग मिल जायेंगे, लेकिन उनका कोई उल्लेखनीय प्रभाव परिलक्षित नहीं है।

इसकी वजह ये है कि मुजतहिद को लोग हदीस की रौशनी में अम्बिया / पैग़म्बर का वारिस मानते हैं। साथ ही कि आयतुल्लाह अल उज़मा एवं मर्जा – ए – तकलीद कहलाने वाली शख्सियतें सामान्य लोग नहीं होते हैं। ये अपने धर्म के सर्वोच्च गुरु होने के साथ-साथ अपने दौर की ज्ञान – विज्ञान की सभी धाराओं की जानकारी, और कई बार महारथ रखते हैं। हौजों में कई सालों तक अध्ययन और प्रशिक्षण के बाद कोई मुजतहिद तैयार होता है, और जब तक हौज़ा रहेंगे, तब तक मुजतहिद रहेंगे, और उन्हीं में से एक आयतुल्लाह अल उज़मा, एवं मर्जा – ए – तकलीद बनते रहेंगे।

ये दुनिया के हर उस हिस्से में बन सकते हैं, जहाँ पर हौज़े हैं। ये दुनिया के किसी भी देश के शिया हो सकते हैं। वो अफ्रीकी य भारतीय उपमहाद्वीप का भी हो सकते हैं। हो सकता है कि आने वाले के काम करने का तरीका पहले वाले से अलग रहे, परन्तु ये निश्चित है कि दिशा में कोई परिवर्तन नहीं होगा क्योंकि सबका मूल एक ही रहेगा।

दरअसल शिया समुदाय की दिशा और दर्शन के मूल में कर्बला है। कर्बला के पहले शियाओं के दूसरे इमाम – इमाम हसन मुजतबा अ० स० को जब मुआविया इब्ने अबू सुफियान ने सुलह का प्रस्ताव भेजा, तो उन्होंने उसे स्वीकार किया और अपनी शर्तों पर सुलह की, जिसे बाद में खुद मुआविया ने ही नहीं माना।

बाद में इमाम हुसैन अ० स० को जब मुआविया के लड़के यजीद ने समर्पण के लिए दबाव बनाया, तो उन्होंने शहादत चुनी। इस तरह कर्बला के मूल में अम्र बिल मारूफ (अच्छाई की दावत) और नहीं अनल मुनकर (बुरे का प्रतिरोध) है, और किसी के दबाव में समर्पण तो बिलकुल ही नहीं है। इसी पथ पर शिया समुदाय अपने मर्जा की तकलीद करते हुए आगे बढ़ रहा है।

आज जब आयतुल्लाह सैयद अली खामनेई (र० अ०) की शहादत हो गयी है तो आने वाले भी उन्हीं की तरह मुजतहिद हैं, और ये परंपरा इसी दिशा में चलती रहने की व्यवस्था है। जिस तरीके से मुक़ल्लिद की ज़िन्दगी की मियाद होती है, उसी तरीके से मर्जा – ए – तकलीद की ज़िन्दगी भी नश्वर है ।अगर कुछ बरक़रार रहेगा तो फिक़ा और तकलीद ।यही फिक़ा और तकलीद के परिणामस्वरूप ईरान का संविधान और उसकी वर्तमान शासन व्यवस्था है ।

आज जब अमेरिका और इजराइल हमला कर रहे हैं, तो वहीँ के एक भूतपूर्व सैन्य अधिकारी स्कॉट रिटर ने कहा कि डोनाल्ड ट्रम्प को कर्बला और शिया विचारधारा की जड़ों और उसकी गहराई का कोई अंदाज़ा नहीं है।रिटर के अनुसार खामनेई साहब को शहीद करके अमरीका ने पहले ही दिन पूरे शिया समुदाय को एक शहीद के पीछे एकत्रित कर दिया है, और ये समुदाय सब कुछ स्वीकार करेगा सिवाय समर्पण के।

वर्तमान स्थिति 

हाल में भारतीय मीडिया ने TRP की लालच में ईरान के बारे में खबर को सनसनीखेज बनाने के उद्देश्य से जो अपनी संकीर्ण सोच का प्रदर्शन किया, जिस संबंध में सरकार ने भी आदेश जारी किया TRP जारी करने पर 6 मार्च, 2026 को रोक लगा दी, वो उसकी संकीर्णता के साथ साथ अज्ञानता भी दिखता है। जो इस लड़ाई को मुसलमान बनाम अन्य यहूदी बनाने का प्रयास कर रहे हैं, वो ईरान के धार्मिक और संवैधानिक चेतना को समझने में बड़ी भूल कर रहे हैं। ईरान, पाकिस्तान या इजराइल की तरह धर्म के आधार पर बना हुआ देश नहीं है, वो दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है, और प्रतिरोध उसकी संस्कृति और परंपरा दोनों है।

ईरान का संविधान अपने नागरिकों को मुफ्त शिक्षा (अनुच्छेद – 30) के साथ साथ मुफ्त घर (अनुच्छेद – 31) भी देता है। इसमें धार्मिक अल्पसंख्यकों (अनुच्छेद – 13), और गैर मुस्लिमों (अनुच्छेद – 14) के अधिकार का भी संरक्षण है। इस संविधान के तहत ही अनुच्छेद – 3 में सरकार के लक्ष्यों में – साम्राज्यवाद का पूर्ण खात्मा और किसी विदेशी प्रभाव का प्रतिरोध है, और उसके साथ साथ दुनिया भर में आजादी के संघर्ष को समर्थन देना भी है।

स्पष्ट है कि विलायत – अल – फ़की की व्यवस्था के अंतर्गत ईरान का संविधान एक तरफ तो लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करता है, वहीँ दूसरी तरफ स्पष्ट कर देता है कि साम्राज्यवाद और विदेशी प्रभाव का खुला प्रतिरोध है। यही प्रतिरोध की संवैधानिक चेतना ही इरान द्वारा अमरीका के विरोध के मूल में है ।

बांग्लादेश या पाकिस्तान जैसे इस्लामिक देशों में एक राष्ट्राध्यक्ष हट जाएगा, तो हो सकता है दूसरा अमेरिका के दबाव में आ जाये ।ऐसा इसलिए भी है कि वहां पर राष्ट्राध्यक्ष बनाने की प्रक्रिया एक शक्ति प्रदर्शन का विधिवत अभ्यास भी है। नेतृत्व के शीर्ष पर पहुँचने के लिए प्रतियोगिता है, और विरोधियों को हराने के लिए धनबल और बाहुबल की आवश्यकता होती है ।ऐसी स्थिति में अमेरिका जैसी साम्राज्यवादी ताक़तों की ख़ुफ़िया एजेंसी के लोगों को शक्ति संतुलन में हिस्सेदारी के कई रास्ते खुल जाते हैं। इस व्यवस्था की उनको आदत भी है, और अभ्यास भी ।

इतिहास में तमाम ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं ।लेकिन, ईरान में जैसा कि ऊपर बताया गया कि नेतृत्व कोई शक्ति संघर्ष नहीं है। ये एक ज़िम्मेदारी है, जो एक मुजतहिद को बाकी मुजतहिदों ने दी है।इसके लिए कोई धनबल य बाहुबल की आयश्यकता नहीं है, इसलिए इसमें बाकी विदेशी ताक़तों के प्रभाव या भागीदारी के लिए कोई जगह ही नहीं बचती है। जब तक विलायत – अल – फ़की की व्यवस्था के अंतर्गत ईरान का संविधान चलेगा, तब तक अमेरिका समेत किसी भी बाहरी ताक़त के लिए उसको प्रभावित करना असंभव की सीमा तक कठिन रहेगा।

(लेखक आग़ा मीर सैयद अब्बास हुसैन खोरासानी इमामबाड़ा के सरपरस्त हैं।)

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