सूरत, मुंबई, पूना और फिर दिल्ली के रेलवे स्टेशनों से मजदूरों के गांव लौटने के दृश्य कुछ मीडिया चैैनलों पर दिखने लगे हैं। प्रवासी मजदूरों पर बात करने वाले थोड़े से पत्रकार उनकी व्यथा बताने के लिए उन तक गये। रोते और गुस्से में बोलते मजदूरों के दृश्य उस भावुकता को सामने लाने की कोशिश करते हैं जिससे कि आप उससे जुड़ सकें। लौटने का यह दृश्य भावुकता से अधिक कोविड और नोटबंदी के दिनों के दृश्यों की अधिक याद दिलाता है। ये दृश्य भावुकता से अधिक हताशा और निराशा में बदलते हुए दिखते हैं।
प्रिंट मीडिया में इससे जुड़ी कुछ खबरें जरूर आईं। इनका असर दृश्य मीडिया की तुलना में कुछ भी नहीं था। भारत में राज्यों की विधानसभा चुनावों में इन सबका कोई असर नहीं है। मोदी राज के कुल 12 साल में तीन बार मजदूरों के शहर से गांव लौटने के बारे में न तो कोई बात हो रही है और न ही इसे एक राजनीतिक मुद्दे की तरह देखा जा रहा है। यह अपने आप में भारतीय राजनीति के पटल से मजदूर राजनीति की बढ़ती अनुपस्थिति का एक उदाहरण है।
नोटबंदी के दौरान भारत के बाजारों से नकद लेन-देन का विकल्प अचानक इतना नीचे आ गया कि व्यापार, छोटे और मध्य उद्यम, दुकानदारी, खेती आदि देखते-देखते ठप्प पड़ने लगे। नकद की कमी ने बाजार में मांग को एकदम ही नीचे ला दिया और उत्पादन, खासकर उपभोक्ता उत्पादन पर सीधा असर पड़ा। इस दौरान हजारों उत्पादन से जुड़ी इकाईयां बंद हो गईं। मजदूरों के लिए काम के लिए काम कम हो गया। बड़ी संख्या में मजदूर गांव की ओर लौट गये।
इस संदर्भ में आज तक स्पष्ट और ठोस आंकड़ें उपलब्ध नहीं हैं। शोध संस्थान एजेंसियों ने कई सारे मानकों का प्रयोग कर इस संदर्भ में स्वतंत्र आंकड़े जरूर दिये। 2016 में हुई नोटबंदी के असर को 2017-18 रोजगार के आंकड़ों में देखा जा सकता है। इस दौरान रोजगार सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग में ही कम नहीं हुआ था, यह कमी खेती में भी देखी गई। ऐसे में ये मजदूर कहां गये? ये नये तरह के सेवा क्षेत्र और भट्ठा और निर्माण क्षेत्र में हिस्सेदारी करते हुए दिखते हैं।
ऑनलाइन सेवा क्षेत्र का बढ़ते विस्तार को आज हम देख सकते हैं। इसमें ज्यादातर काम ऑनलाइन पेमेंट और खुद की साधन उपलब्धता की जरूरत होती है। यहां से हम गिग वर्कर को बढ़ते हुए देखते हैं। भट्ठा और निर्माण क्षेत्र में अमूमन भुगतान की प्रक्रिया मध्ययुगीन भुगतानों से मिलती-जुलती है। इसमें ददनी जैसी व्यवस्थाएं और ऋण का जाल काफी बड़ा होता है।
आज के समय में इसके परिणाम हम उत्पादन की सामंती प्रणाली की बढ़त में देख सकते हैं जिसमें मजदूर एक दास जैसी व्यवस्था में बंधने की ओर बढ़ता दिख रहा है।
कोविड-19 के समय में स्थिति और भी भयावह हो गई। लाॅकडाउन जैसी घोषणा ने न सिर्फ उत्पादन को ठप कर दिया, मजदूरों का जीना मुश्किल कर दिया। मजदूर खुद को बेहद असुरक्षित महसूस करने लगे। वे अपने पूरे परिवार के साथ हजारों किमी की यात्रा पर पैदल ही निकल पड़े। शहर से मजदूरों की यह वापसी पूरी दुनिया का सबसे भयावह दृश्य था। इस वापसी में कई लोग तो रेलवे लाइन पर हुई दुर्घटनाओं के कारण मारे गये। बहुत सारे मजदूर भूख, गर्मी, बिमारी और थकान से मारे गये।
कोविड-19 महामारी को इससे फैलना और अधिक आसान हुआ। अलग-अलग आंकड़ों में बीमारी से मारे गये लोगों की संख्या 40 लाख से 60 लाख बताई गई। सरकार के आंकड़े अलग ही रहे। इसी तरह शहर से गांव लौटने वाले मजदूरों की संख्या को लेकर विवाद रहा। कई जगह ये आंकड़े दो करोड़ दिये गये और कुछ जगह इसे 12 करोड़ तक माना गया। इस दौरान, कई अर्थशास्त्रीयों ने आंकड़ों को व्याख्यायित कर बताया कि गांव की कुल आबादी में वृद्धि हुई है।
यह आंकड़े एक विकासशील देश की अर्थव्यवस्था के लिए चिंतनीय थे। जबकि इसी दौरान मोदी सरकार भारत को विकसित देश बना देने का दावा करने में लगी हुई थी। हाल के दिनों में, जो आंकड़े आ रहे हैं उसमें रोजगार की स्थिति काफी बदतर दिख रही है। गांव में महिलाओं की कार्य में भागीदारी दिख रही है लेकिन भुगतान नहीं दिख रहा है। अर्थशास्त्री यह बता रहे हैं महिलाएं परिवार और ऐसे कामों में लगी हुई हैं जिसमें उन्हें कोई भुगतान नहीं है।
इसी दौरान ग्रामीण क्षेत्रों के लिए रोजगार गारंटी योजना में लाए गये बदलाव भी चिंताजनक हैं।
अब हम एक बार फिर ईरान पर अमेरीका और इजरायल द्वारा किये गये हमले से पैदा हुई परिस्थितियों को देख रहे हैं। सरकार अपने आंकड़ों के आधार पर बता रही है कि गैस और पेट्रोल की कोई किल्लत नहीं है। लेकिन, जमीनी हकीकत कुछ और ही तथ्य बता रहे हैं। दुकानों के बंद के होने, भोजन के मंहगा होने की खबर लगातार आ रही है। लेकिन, इन बातों का सरकार पर कोई असर पड़ते हुए नहीं दिख रहा है। दिल्ली सरकार हर घर में पीएनजी गैस आपूर्ति के लिए अधिक प्रयास करने का वादा कर रही है।
संभव है कि सरकार इस तरह का प्रयास करे और वह सफल भी हो। लेकिन, गैस की आपूर्ति से मजदूरों को कितना ही राहत पहुंचा सकेगी? भारत का ज्यादातर मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करता है। उसमें से भी अधिकांश मजदूर दिहाड़ी और देय न्यूनतम मजदूरी से भी कम पर काम करता है।
यहां तक कि हाल ही में इंडियन ऑयल कारपोरेशन, पानीपत में मजदूरों के आंदोलन से इस जैसी कंपनी में काम करने वाले मजदूरों के काम के हालात और उन्हें दिया जा रहा भुगतान का विवाद सामने आया, जो काफी डरावना है। इस संदर्भ में ‘फिलहाल’ पत्रिका के मार्च, 2026 के अंक को देखा जा सकता है।
नोटबंदी से लेकर कोविड-19 और उसके बाद में बड़े और छोटे शहरों तक में बड़े पैमाने पर ‘अतिक्रमण हटाओ’ अभियान में लाखों मजदूरों को उजाड़ दिया गया और अभी भी यह अभियान जारी है। ‘अतिक्रमण हटाओ’ एक तरह से कोर्ट के निर्णयों के बाहर सजा देने का एक तरीका भी बन गया है।
शहरों में आवास की कमी, आवास को अतिक्रमण हटाने के नाम पर नष्ट करने, मंहगाई, न्यूनतम वेतनमान को दुरूस्त रखने वाली व्यवस्थाओं की कमी या अनुपस्थिति, बेरोजगारी भत्ता प्रदान करने वाली व्यवस्था की कमी, भोजन जैसी व्यवस्था प्रदान करने वाले केंद्रों की कमी, रोजगार की अस्थिरता वे कारण हैं जो शहरों में काम करने आये मजदूरों को बेहद कमजोर हालात में धकेल देते हैं।
ऐसे में कारण चाहे छोटे हों या बड़े, सबसे पहले मजदूर प्रभावित हो रहे हैं। यह भारत की पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली का संकट है जो मजदूर को उसके श्रम सहित सबसे निचले पायदान पर रखता है, उसके साथ सबसे बदतर व्यवहार करता है। इन सबका एक और नतीजा हम फैक्टरी या सेवा क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों के दुर्घटना में मारे जाने के रूप में देखते हैं।
यह सब कुछ भारत में अंग्रेजों के काल में पड़ने वाले उन अकालों की याद दिलाते हैं जो कई बार प्राकृतिक कारणों से और कई बार अंग्रेजों की युद्ध नीतियों से पैदा हुए। बंगाल में, अंग्रेजों ने शुरूआती समय में, उस समय बंगाल का अर्थ बंगाल के साथ साथ बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और उड़िसा भी आता था, जमींदारी व्यवस्था को लागू किया। इस जमींदारी व्यवस्था का एक ही उद्देश्य था, अधिकतम अनाज और रूपये की वसूली और गन्ना, अफीम, नील की खेती पर जोर।
इसका कुल परिणाम गांव से अनाज की कमी और पैसे की लूट में दिखाई दिया। पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर पटना तक के इलाके अफीम की खेती से भर दिये गये। कुल अनाज के उत्पादन की कमी ने बाजार में अनाज की मांग और उसकी मंहगाई को बढ़ाने में योगदान दिया। इस मंहगाई का असर गन्ना उत्पादकों और नील के खेतिहरों पर हुआ और देखते-देखते वे गिरमटिया मजदूर बनकर खुद को बेचने के लिए विवश हो गये।
लेकिन, पीछे अकाल एक न खत्म होने वाली परिघटना बन गई जो कभी पांच साल और कभी दस साल पर लाखों लोगों को मार डालती थी।
आज हम जो पिछले एक दशक में बार-बार गांव से शहर और शहर से गांव जाने का दृश्य देख रहे हैं, वह एक भयावह दृश्य की ऊपरी सतह है। इसके नीचे देखने के लिए सिर्फ आंकड़ों की नहीं, थोड़ा प्रयास कर जमीन पर उतर कर देखने की जरूरत है। एक परिघटना हमेशा एक चेतावनी की तरह सामने आती है। जरूरी है कि उस परिघटना को ठीक से देखें और उसके नीचे बनने वाले उस उथल पुथल को देखें जो हमें, हम सभी को गिरफ्त में लेने वाली है।
आज कुल जितना मध्यवर्ग है उसका लगभग चार गुना मजदूर और किसान है। मध्य वर्ग के उजाड़ की कहानियां अब पूरी किताब बन कर सामने आ रही है। इस मध्य वर्ग, मजदूर और किसान के ऊपर उच्च मध्य वर्ग और सत्तीसीन लोग बैठे हैं। निश्चित ही इस ऊपरी समूह को अधिकतम चिंता अपने से नीचे वाले समूह मध्य वर्ग की हो सकती है।
मध्य वर्ग भी बस ‘ऊपर की ओर देखने’ में मस्त है। ये सभी जिसकी पीठ पर खड़े हैं, वह अब बुरी तरह दरकते हुए दिख रहा है। आज हमारे समाज की यही हकीकत है। इस दरकते यथार्थ से मुंह मोड़ना तो संभव है लेकिन उसके परिणाम से भाग पाना संभव नहीं है। इसलिए जरूरी है कि अपने समय की हकीकत को उसे उसी रूप में देखें और समझे, जैसा वह है।
(अंजनी कुमार लेखक व राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)