फिल्मोत्सवों में सेंसर प्रमाणपत्र के बिना फिल्मों की स्क्रीनिंग हुई और मुश्किल

बढ़ते सेंसरशिप के दौर में गैर वाणिज्यिक फिल्मोत्सवों में सेंसर प्रमाणपत्र के बिना फिल्मों की स्क्रीनिंग और मुश्किल कर दी गई है।

एक्सचेंज फॉर मीडिया की एक खबर के अनुसार सूचना प्रसारण मंत्रालय ने 30 मार्च को एक आदेश जारी किया है जिसके अनुसार फिल्मोत्सवों में ऐसी फिल्मों की स्क्रीनिंग खास स्थितियों में ही हो सकती है।

मंत्रालय के अनुसार देसी और विदेशी फिल्मों के प्रदर्शन की नीति पहले से मौजूद है जिसके तहत फिल्में केवल पूरी तरह गैर वाणिज्यिक फिल्मोत्सवों में और केवल पंजीकृत सदस्यों (डेलीगेट्स) के लिए होगी।

अब इस छूट के लिए आवेदनों का एक स्वरूप बनाया गया है, जिसके तहत अब आयोजकों को आवश्यक दस्तावेजों के साथ निर्दिष्ट स्वरूप में आवेदन समय रहते देना होगा। अधूरे, देरी से जमा किए आवेदन या नियमों का पालन न करने वाले आवेदनों को अस्वीकृत किया जाएगा।

इसके अलावा, फिल्म चयन के लिए प्रिव्यू कमेटी में आयोजक संस्था से बाहर के तीन सदस्यों को शामिल करना होगा, जिनमें एक महिला सदस्य होना आवश्यक है। कमेटी को यह भी प्रमाणित करना होगा कि दिखाई जाने वाली फिल्मों के संबंध में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के पास कोई विवाद लंबित नहीं है।

मंत्रालय ने एक फॉर्म जारी किया है जो आयोजकों को भरना होगा। उसमें फिल्मों की सूची, आयोजक संस्था की जानकारी, फिल्मोत्सव निदेशक की जानकारी मांगने के अलावा अन्य पूरी की जाने वाली आवश्यकताओं के बारे में बताया गया है।

उल्लेखनीय है कि पिछले साल केरल फिल्मोत्सव में इस पर भारी विवाद हुआ था और केंद्र ने फिलिस्तीन की कुछ फिल्मों समेत 19 फिल्मों के प्रदर्शन की मंजूरी नहीं दी थी लेकिन केरल सरकार ने फिल्मों के इस “बैन” को न मानने की घोषणा की। इसके बाद कुछ और फिल्मोत्सवों में इस तरह के विवाद हुए हैं।

दुनिया भर में फिल्मोत्सवों में सेंसर सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं होती है और नहीं होनी चाहिए लेकिन भारत में केंद्र सरकार सुनिश्चित करने पर तुली हुई है कि उसकी नजर में “संवेदनशील” कोई देसी विदेशी फिल्म भारत में नहीं देखी जाए। इसके लिए सेंसर बोर्ड प्रमाणपत्र नहीं देता या लटकाकर रखता है (उदाहरण: पंजाब 95, संतोष और द वॉयस ऑफ हिन्द रजब) और फिल्मोत्सवों में फिल्म दिखाने की तथाकथित “छूट” भी अब लगभग खत्म की जा रही है।

(जनचौक ब्यूरो)

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