प्रधानमंत्री की पांच देशों के छह दिवसीय विदेशी दौरे से लौटने के बाद देश और भाजपा की राजनीति में बहुत तेजी से आमूलचूल बदलाव होने जा रहे हैं। मोदी जी ने पहले ही देश को विकट आर्थिक परिस्थितियों से अवगत कराते हुए आगाह किया है। उन्होंने देशवासियों से सात प्रकार से मितव्ययता बरतने की अपील भी की है। इसमें कोई शक़ नहीं है कि देश की आर्थिक स्थिति बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है और यह केवल खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका, इजरायल और ईरान के मध्य तनाव तथा युद्ध से उपजे हालातों से नहीं है।
इसके लिए हमारी घरेलू तथा आयात निर्यात नीति में हाल के वर्षों में मिली नाकामियां भी बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। डॉलर के मुकाबले रुपए का अनवरत गिरना, भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों का विश्वास डिगना जिसके फलस्वरूप उनका यहां से तेजी से पैसे निकालना, हमारा निर्यात लगातार घटना और उसी अनुपात में आयात का तेजी से बढ़ना इसके कारण हैं।
इसके अलावा बेकाबू होती बेरोजगारी, बेलगाम होती महंगाई, बाजार और नीतियों में पारदर्शिता का अभाव होना, शेयर बाजार में बुनियादी बिगाड़ और कमज़ोरी होना, देश का अमेरिका पर असीमित निर्भर होना, चुनावों में असीमित नकद धन वितरण जैसे हालातों ने देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था के वेंटिलेटर पर जाने की चेतावनी दे रखी थी पर तब शायद सरकार में बैठे जिम्मेदार लोगों को इसकी विकरालता का एहसास नहीं था और वह आत्ममुग्धता से चुनाव दर चुनाव में जीत को ही जनता में अपनी स्वीकार्यता समझ रही थी।
उस पर युद्ध की परिस्थिति ने हालातों को और भी चिंताजनक बना दिया है। इसी के मद्देनजर मोदी सरकार के समक्ष गंभीर आर्थिक चुनौती मुंहबाए खड़ी है, इस पर सरकार में अविलंब बेहद कड़े निर्णय लेने की महती आवश्यकता है केवल जनता के मत्थे त्याग करने की अपील मढ़कर सरकार हालातों पर कतई काबू नहीं पा सकती है, उसे दीर्घकालिक नीतियां बनाकर ही आगे बढ़ना होगा। इसी के मद्देनजर मोदी जी विदेशी दौरे से लौटते ही पूरी कैबिनेट को तलब किया।
प्रधानमंत्री को समझना होगा कि अब केवल प्रतीकात्मक रूप से वो इन गंभीर हालातों से पार नहीं पा सकते हैं। राष्ट्रहित में मोदी जी को बड़ा दिल दिखाते हुए विषय विशेषज्ञों को पूरी छूट देकर अपने साथ जोड़ना चाहिए, विपक्ष को भी विश्वास में लेकर आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि यह समय दलगत राजनीति का नहीं बल्कि राष्ट्रीय आपदा का है। अभी एकजुटता से नहीं चले तो हमारे लगभग 80 वर्षों के सद्प्रयासों भरे सफर पर पानी फिर जाएगा और देश को फिर सिफर से शुरुआत करनी होगी।
उन्हें अपनी मंत्रिपरिषद से उन चेहरों की निर्ममता से छुट्टी करनी होगी जो इन विषम परिस्थितियों के लिए कसूरवार हैं। मुझे लगता है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, विदेशमंत्री एस जयशंकर, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, आईटी एवं रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव, कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह, जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल, गृहराज्य मंत्री बंडी संजय कुमार, शिक्षा राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार केंद्रीय मंत्रिमंडल से बाहर किए जा सकते हैं।
इनके स्थान पर बिहार से नीतीश कुमार, कर्नाटक से बीएल संतोष और तेजस्वी सूर्या, तमिलनाडु से अन्नामलाई, हिमाचल प्रदेश से अनुराग ठाकुर, झारखंड से निशिकांत दुबे, पंजाब से सुनील जाखड़ या राघव चढ्ढा, उत्तरप्रदेश से छत्रपाल सिंह गंगवार या अनूप प्रधान, उत्तराखंड से पुष्कर धामी या अनिल बलूनी, मणिपुर से लिसेंबा सानाजाओबा, सैयद जफर इस्लाम मंत्रीमंडल में शामिल किए जा सकते हैं। पीयूष गोयल देश के नए वित्त मंत्री बनाए जा सकते हैं।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का अगला राष्ट्रपति बनना तय है।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन भी प्रस्तावित है जिसका खाका पूरा कर लिया गया है। मेरा मानना है कि संगठन महासचिव बीएल संतोष केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होंगे और उनकी जगह सुनील बंसल इस जिम्मेदारी को संभालेंगे। हल्की संभावना धर्मेंद्र प्रधान की भी हो सकती है। चूंकि नितिन नबीन छत्तीसगढ़ के प्रभारी रहे हैं और उनके यहां के नेताओं से बेहतर संबंध तथा तालमेल रहा है तो निश्चित ही उनकी कार्यकारिणी में प्रदेश को तरजीह मिलेगी।
दो कैबिनेट मंत्री और दो विधायकों सहित पांच लोगों को इसमें स्थान मिलना तय लग रहा है। नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी गठन की वजह से अनेक राज्य सरकारें प्रभावित होंगी जिससे वहां भी फेरबदल निश्चित है।
भाजपा शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों के कामकाज की गहन समीक्षा भी इसी दौरान कर ली गई है, मेरा अनुमान है कि डॉ. मोहन यादव मध्यप्रदेश, भजन लाल शर्मा राजस्थान और श्री पुष्कर धामी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री, बदले जा रहे हैं। योगी आदित्यनाथ उत्तरप्रदेश तथा विष्णु देव साय छत्तीसगढ़ सुरक्षित जोन में हैं, इसी तरह से गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल भी बेहतर कार्य करने की चेतावनी के साथ अपनी कुर्सी सुरक्षित रखने में कामयाब हो गए हैं, वहीं पंजाब विधानसभा चुनावों के मद्देनजर हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी भी सेफ हैं।
एकमात्र महिला मुख्यमंत्री होने का लाभ दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति रेखा गुप्ता को मिलने की वजह से वह भी सलामत हैं, गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत तथा त्रिपुरा के मुख्यमंत्री डॉ.माणिक शाह भी यथावत जारी रहेंगे, ऐसा कहा जा सकता है।
इसी बीच कई महत्वपूर्ण राज्यों में नए राज्यपालों की नियुक्तियां भी होनी है जिनमें उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना आदि शामिल हैं। वसुंधरा राजे सिंधिया, डॉ. रमन सिंह, सीआर पाटिल, मुख्तार अब्बास नकवी, गिरिराज सिंह, कैलाश विजयवर्गीय आदि को यह जिम्मेदारी दी जा सकती है।
भाजपा अपने राष्ट्रीय मीडिया पैनल में भी बड़ा परिवर्तन करने जा रही है। मोदी जी और शाह जी वर्तमान मीडिया पैनल से कतई संतुष्ट नहीं हैं खासकर कांग्रेस से गए प्रवक्ताओं से बिल्कुल भी नहीं। शहजाद पूनावाला, रोहन गुप्ता और राधिका खेड़ा का बाहर होना तय है इसी तरह से संजू वर्मा, प्रेम शुक्ला, गौरव भाटिया, शिवम त्यागी भी इस भूमिका से अलग किए जा सकते हैं। नए पैनल में युवाओं को खास तरजीह मिलेगी, छत्तीसगढ़ से भी कोई एक चेहरा देखने को मिल सकता है। सबसे बड़ा खतरा भाजपा आईटी सेल के सर्वेसर्वा अमित मालवीय की कुर्सी पर है।
इन सारी कवायदों के अलावा भी कुछ राजनीतिक नियुक्तियां लंबित हैं जिसे संगठन से बाहर हुए लोगों, मंत्रिमण्डल से बाहर आए लोगों, पूर्व राज्यपालों, एनडीए गठबंधन के साथी दलों के लोगों के जरिए भरा जाएगा।
इतने भारी भरकम बदलाव के चलते निश्चित ही भाजपा की राज्य सरकारें भी प्रभावित होंगी। छत्तीसगढ़ भी अछूता नहीं रहेगा। यहां व्यापक पैमाने पर मंत्रिमण्डल का पुनर्गठन होगा। मेरा मानना है कि वर्तमान साय सरकार के छह से सात मंत्री नए मंत्रिपरिषद से बाहर दिखेंगे। साय जी के नेतृत्व में नया मंत्रिमण्डल नए और पुराने लोगों के सामंजस्य वाला होगा, इसमें दो महिलाओं को स्थान मिलेगा। लक्ष्मी राजवाड़े, लता उसेंडी, भावना वोहरा में से दो को जगह मिलेगी।
नए प्रदेशाध्यक्ष नियुक्त करने की स्थिति में किरण सिंहदेव के भी कैबिनेट मंत्री बनने की प्रबल संभावना होगी। अगला प्रदेशाध्यक्ष मैदानी इलाके से तथा ओबीसी वर्ग से हो सकता है। महासमुंद लोकसभा को भी मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व मिलेगा। रोहित साहू या योगेश्वर राजू सिन्हा में से किसी की प्रबल संभावना है। पुन्नू लाल मोहिले या डोमन लाल कोर्सेवड़ा में से कोई एक नए मंत्रिपरिषद में शामिल हो सकते हैं।
अजय चंद्राकर और सुनील सोनी को भी साय जी की नई टीम में जगह मिल सकती है। डॉ. रमन सिंह जी के राज्यपाल बनने की स्थिति में धरम लाल कौशिक या अमर अग्रवाल नए विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका में दिखाई दे सकते हैं। विधानसभा उपाध्यक्ष पद पर भी नियुक्ति की जानी है जिस पर किसी महिला विधायक को अवसर दिया जा सकता है।
मेरी समझ है कि यह सारी कवायदें 25 मई से जून अंत तक पूरी कर लिए जाने की संभावना है। यही टीमें केंद्र से लेकर राज्यों के चुनावों में जाएंगीं। छत्तीसगढ़ में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का त्रिदिवसीय प्रवास प्रशासनिक के साथ साथ राजनीतिक गहमागहमी वाला था। उनकी तरफ से सारा होमवर्क पूरा कर लिया गया है। इतना तय है कि गलतियों से सीखने तथा बड़ा दिल दिखाते हुए बदलाव करने से ही सफलता हासिल होगी, केवल खानापूर्ति कर चेहरे बदलने से हालात वही ढांक के तीन पात वाले ही होंगे जिससे समस्याएं और विकराल रूप लेंगी।
मेरा स्पष्ट मानना है कि पिछले 12 वर्षों के अपने शासन काल में पहली बार मोदी जी समस्याओं के भंवरजाल में बुरी तरह से उलझे हुए दिख रहे हैं, इनसे वो देश को कैसे निजात दिलाते हैं इसी में उनकी राजनीतिक कौशलता की परीक्षा है। यहां चूकने का अर्थ होगा उनकी राजनीतिक पारी पर बड़ा सा प्रश्नचिन्ह।
आशा है, इतने व्यापक बदलावों का सकारत्मक लाभ छत्तीसगढ़ प्रदेश को भी अवश्य मिलेगा।
(परमजीत बॉबी सलूजा का लेख)