नोएडा हिंसा मामले में ‘धुरंधर’ ट्विस्ट?

नोएडा मज़दूर आंदोलन के दौरान 13 अप्रैल को हुई हिंसा के मामले में “धुरंधर” ट्विस्ट सामने आया है, जिसने उत्तर प्रदेश पुलिस और सरकार की “साज़िश” थ्योरी को सिर के बल खड़ा कर दिया है।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की 23 मई की एक रिपोर्ट के अनुसार एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने स्वीकार किया है कि एक उप निरीक्षक बीना कर्मचारियों के एक ह्वाट्सऐप समूह में शामिल हुई थीं। उन्होंने समूह में एक जलते वाहन के वीडियो का स्क्रीनशॉट डाला था इस उम्मीद में कि कोई उसकी ज़िम्मेवारी स्वीकार करेगा। अर्थात् वह अंडरकवर इंटेलिजेंस ऑपरेटिव थीं।

पुलिस अधिकारी ने यह भी दावा किया है कि उप निरीक्षक से मिली जानकारी ने पुलिस को विरोध प्रदर्शनों को प्रभावी तरीके से हैंडल करने में मदद की।

टाइम्स की इसी ख़बर में दो दिन पूर्व गिरफ्तार ड्राइवर अनिल कुमार के बारे में पुलिस का कहना है कि अनिल कुमार नोएडा के किसी पुलिस अधिकारी का ड्राइवर नहीं था और न ही वह शहर में रहता था।

हिंसा की जांच के लिए बनाई गई एसआईटी के प्रमुख और सेंट्रल नोएडा के एडिशनल डीसीपी स्वतंत्र सिंह ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताया है कि अनिल कुमार दिल्ली में एक केंद्र सरकार इकाई के एक अधिकारी का संविदा कर्मचारी है।

अनिल कुमार को 21 मई को नोएडा फेज 2 इलाके से मदरसन फैक्ट्री के पास से गिरफ्तार किया गया था।

अब, कुमार और एसआई बीना वह लोग हैं जिन पर हिंसा को लेकर गिरफ्तार मज़दूर कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में 19 मई को हुई सुनवाई के दौरान हिंसा भड़काने वाली पोस्ट ह्वाट्सऐप समूह में डालने का आरोप लगाया था। उनका आरोप था कि कुमार ने ख़ुद को एक डीसीपी का ड्राइवर बताया था।

कुमार के दावे और एसआई बीना के कर्मचारियों के ह्वाट्सऐप समूहों में ‘घुसपैंठ’ की जानकारी 17 अप्रैल से ही सोशल मीडिया में थी, पुलिस ने लेकिन सुप्रीम कोर्ट में 19 मई की सुनवाई के बाद जाकर कुमार को गिरफ्तार किया और एसआई के ‘अंडरकवर इंटेलिजेंस ऑपरेटिव’ के रूप में ह्वाट्सऐप समूह में उपस्थिति की बात स्वीकार की है। भले, पुलिस ने दावा किया है कि कुमार का किसी पुलिस अधिकारी से कोई संबंध नहीं है और यह भी कि एसआई समूह से हिंसा समाप्त होने के बाद ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने के लिए जुड़ी थीं और उन्होंने एक संदेश यह देखने के लिए डाला था कि कोई ज़िम्मेवारी स्वीकार करता है या नहीं।

उल्टे, इस दौरान, पुलिस ने जनसत्ता यूट्यूब चैनल, जिसने इस जानकारी का फैक्ट चेक करते हुए वीडियो रिपोर्ट दी थी और कैंपेन फॉर रिलीज़ ऑफ़ एक्टिविस्ट्स इन नोएडा (कारवाँ) फेसबुक पेज और कुछ अन्य फेसबुक पेज के खिलाफ एफआईआर दर्ज की कि वह जनता की नज़रों में पुलिस की छवि बिगाड़ रहे हैं और लोगों को भड़का रहे हैं।

नोएडा में न्यूनतम वेतन में बढ़ोत्तरी, दुगने रेट पर ओवरटाइम, साप्ताहिक अवकाश और गरिमापूर्ण कार्यस्थितियों की जायज़ मांगों को लेकर 10 अप्रैल से प्रदर्शन हो रहे थे और 13 अप्रैल को हिंसा हुई थी। हिंसा के बाद उत्तर प्रदेश सरकार को न्यूनतम वेतन, जो एक दशक से रिवाइज नहीं किया गया था, में 21 फ़ीसदी की वृद्धि की घोषणा करनी पड़ी थी। हालांकि शुरू से ही पुलिस प्रशासन ने विरोध प्रदर्शनों के पीछे बड़ी साज़िश होने, अर्बन नक्सल और पाकिस्तान तक से तार जुड़ने के दावे किए।

कथित साज़िश के मामले में 11 अप्रैल को चार (रुपेश, सृष्टि, आकृति और मनीषा) गिरफ्तारियां की गईं। फिर, आदित्य आनंद, वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा और छात्र हिमांशु ठाकुर को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने सत्यम और आकृति पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगा दिया है।

कैंपेन फॉर रिलीज़ ऑफ़ एक्टिविस्ट्स इन नोइडा ने समूचे प्रकरण की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच कराने की माँग की है।

(जनचौक ब्यूरो)

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