“सटायर और कॉकरोच को खत्म करने वाला स्प्रे दुनिया में नहीं बना”

आधी रात की शिफ्ट, कैफेटेरिया की वो बंबू वाली ग्लास-टॉप टेबल और हाथ में कड़क चाय। माहौल बिल्कुल शांत था, जब तक कि वह सामने नहीं आया। मूंछें हिलाता हुआ, पूरे टशन में टेबल के केंद्र बिंदु की तरफ बढ़ता हुआ एक अदद कॉकरोच! अखबार के दफ्तर में रहने का एक ही नुकसान है, हाथ में हर वक्त ‘हथियार’ (मुड़ा हुआ अखबार) तैयार रहता है। मैंने जैसे ही निशाना साधा, वह चिल्लाया, “रुको यार! तुम तो अपनी सरकार जैसे हो गए, बिना नोटिस के सीधे डिजिटल… मेरा मतलब है फिजिकल स्ट्राइक!”

मैं हक्का-बक्का रह गया। चाय का कप साइड में रखते हुए मैंने अदब से कहा, “हुजूर फरमाइए, आप तो बड़े क्रांतिकारी निकले।”

कॉकरोच ने अपनी पिछली टांगों पर खड़े होने की कोशिश करते हुए कहा, “क्रांतिकारी हम नहीं भाई, वो ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ वाले हैं। सुना नहीं, सरकार ने उनके एक्स (ट्विटर) हैंडल पर ऐसा कानूनी पेस्ट कंट्रोल चलाया है कि अकाउंट ही ‘विदहेल्ड’ हो गया! वैसे, तुम्हारी इस मोनोब्लॉक चेयर से ज्यादा मजबूत स्थिति तो हमारी है।”

मैंने मुस्कुराते हुए पूछा, “वो कैसे? तुम तो बस कोनों में छिपते फिरते हो।”

“यही तो तुम्हारी भूल है,” उसने टेबल पर एक राउंड मारते हुए कहा। “हम छिपते नहीं हैं, हम विपक्ष की तरह ‘रणनीतिक आत्मसमर्पण’ करते हैं ताकि सही समय पर दोबारा रेंग सकें। अब उस सोशल मीडिया वाले पेज को ही देख लो। इंस्टाग्राम पर 13 मिलियन (1.3 करोड़) से ज्यादा फॉलोअर्स! देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को डिजिटल रेस में पछाड़ दिया था उसने। अब जब एक अदना सा जीव सत्ता के नैरेटिव को चुनौती देने लगे, तो लोकतंत्र के इस कैफेटेरिया में ‘लीगल स्प्रे’ तो छिड़का ही जाएगा न?”

मैंने अपनी पत्रकार वाली आदत के मुताबिक कुरेदा, “लेकिन भाई, तुम लोगों का सोशल मीडिया से क्या लेना-देना? तुम तो नालियों और सिंक के नीचे के किंग हो।”

कॉकरोच ने अपनी मूंछें ऐसे तानीं मानो किसी टीवी डिबेट में एंकर को चुप करा रहा हो, “अरे ओ मीडियाकर्मी! आज की राजनीति और हममें कोई फर्क बचा है क्या? तुम लोग दिन-रात जिन नेताओं की खबरें छापते हो, उनकी ‘इम्युनिटी’ देखी है? गठबंधन की सरकारें बदल जाएं, विचारधाराएं पलट जाएं, कोर्ट के चक्कर लग जाएं, लेकिन नेताजी हर मौसम में मुस्कुराते हुए सत्ता के गलियारे में सर्वाइव कर जाते हैं। डायनासोर खत्म हो गए पर हम बचे रहे, वैसे ही देश की जनता त्रस्त हो जाए पर राजनेता बचे रहते हैं। हम दोनों ही इस पृथ्वी के सबसे ढीट ‘सर्वाइवर’ हैं।”

मैंने हंसते हुए कहा, “बात तो तुम्हारी सही है। वैसे इस डिजिटल स्ट्राइक के बाद तुम्हारी पार्टी का क्या होगा?”

उसने एक लंबी सांस ली और ओवन की तरफ देखते हुए बोला, “जनता की हालत तो इस माइक्रोवेव जैसी है अंदर ही अंदर सुलगती रहती है, गर्म होती रहती है, लेकिन खुद कभी बाहर नहीं आ सकती। पर हम? हम कॉकरोच हैं दोस्त! एक्स पर रास्ता बंद हुआ तो क्या, वीपीएन के अंधेरे रास्तों से रेंगकर वापस आ जाएंगे। सटायर और कॉकरोच को खत्म करने वाला स्प्रे अभी तक दुनिया में बना ही नहीं है।”

तभी दूर गलियारे से किसी के आने की आहट हुई। कॉकरोच भांप गया कि अब उसकी ‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’ का वक्त खत्म हो चुका है। वह तेजी से माइक्रोवेव के पीछे वाले अंधेरे कोने की तरफ बढ़ा और जाते-जाते बोला, “कल सुबह के अखबार में हेडलाइन संभलकर लिखना भाई, कहीं तुम्हारी आईडी भी ‘विदहेल्ड’ न हो जाए!”

वह तो गायब हो गया, लेकिन मैं हाथ में मुड़ा हुआ अखबार लिए सोच रहा था कि इस देश में व्यंग्य जिंदा है या सिर्फ उसका ‘अकाउंट’ बदल गया है।

(नहमोनम का व्यंग्य)

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