बस्तर। सुनीत सलाम और अमेश्वरी सलाम दोनों की कांकेर जिले के आमाबेड़ा ब्लॉक के बड़े तेवड़ा आंगनवाड़ी में कार्यकर्ता और सहायिका के तौर पर काम करती हैं। लेकिन धर्मांतरण के खिलाफ लगातार हिंदूवादी संगठनों द्वारा किए जा रहे विरोध में ये दोनों भी शिकार हो रही हैं। पिछले कुछ सालों से बस्तर के अलग-अलग हिस्सों में आदिवासी ईसाईयों पर प्रताड़ना के कई मामले सामने आए हैं। अब इसकी पहुंच शिक्षा तक पहुंच गई है।
कांकेर जिले में कुछ महीने से कई आंगनवाड़ी में बच्चे नहीं आ रहे हैं। वजह हैं आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का ईसाई होना। कई गांवों में पास्टर और ईसाई प्रचारकों के आगमन पर भी बैन लगा दिया गया है।
दफनाने को लेकर शुरु हुआ मामला
सुनीता सलाम उनमें से एक हैं। जो पिछले आठ नौ सालों से ईसाई धर्म को मानती हैं और उनकी पति गांव के सरपंच और पास्टर हैं।
हम सुनीता से मिलने उनके गांव बड़े तेवड़ा गए। जिस वक्त हम उनके घर गए, घर के बाहर सुरक्षा बल का एक ग्रुप बाहर तैनात था। दरअसल दिसंबर के महीने में सुनीता के ससुर (चमरा राम) की मृत्यु हुई थी। शव दफनाने को लेकर गांव में ईसाई समुदाय और आदिवासी समुदाय आमने-सामने आ गया। इसमें सुनीता के ससुराल के लोग भी दो गुटों में बंटे थे।
एक जो ईसाई रीति-रिवाज के हिसाब से शव का दफन-कफन करना चाहता था और दूसरा आदिवासी रीति रिवाज से। इस बहस ने जल्द ही लड़ाई का रुप ले लिया और अंत में पुलिस शव बाहर निकालकर अपने साथ ले गई।
इस घटना में सुनीता के घर में आग लगा दी गई और बड़े तेवड़ा गांव पुलिस छावनी में तब्दील हो गया। जिस वक्त मैं सुनीता से मिलने पहुंची, वह अपने मायके में रह रही थी, जो उसी गांव में हैं।
वह हमें सबसे पहले गांव के आंगनवाड़ी के पास लेकर जाती हैं। जो उसके घर से लगभग दो किलोमीटर दूर है। शाम का वक्त होने के कारण पाड़े के बच्चे उसके आसपास कुछ जुगाड़ से बनाई गई गाड़ी से खेल रहे थे। सभी बच्चे सुनीता से परिचित थे। इनमें ज्यादातर बच्चे आर्थिक रुप से कमजोर परिवारों से ताल्लुक रखते हैं।
पंचायत में लिया गया फैसला
इसी दौरान ही पहले वह बताती हैं कि घटना के बाद गांव में पंचायत बुलाई गई। जिसमें यह निर्णय लिया गया कि अगर आंगनवाड़ी में ईसाई कार्यकर्ता होगी तो आदिवासी अपने बच्चों को आंगनवाड़ी नहीं भेजेगें। इस निर्णय को हर किसी को मानना था। उसमें कुछ परिवार ऐसे थे जो इस फैसले के विरोध में थे, लेकिन उन्होंने पंचायत में कुछ नहीं कहा। स्थिति यह हो गई कि जिस आंगनवाड़ी में 21 बच्चे आते थे। उसमें आठ बच्चे आने लगे और बाद में सिर्फ तीन बच्चे जो ईसाई समुदाय से है वही आते।
सुनीता कहती हैं दिसंबर महीने की घटना के बाद वह गांव से बाहर चली गई थी। इस दौरान बच्चे आंगनवाड़ी आते थे। लेकिन जैसे ही मैं पांच जनवरी के बाद आंगनवाड़ी आने लगी, कुछ गांव के ही हिंदूवादी संगठन से ताल्लुक रखने वाले नरेंद्र यादव, अकेंश्वर सलाम, बेजु सलाम, शाम सिंह सरफे, हरुआ सलाम ने आकर पहले मेरा विरोध किया और गांव के लोगों को कहा कि ‘ये ईसाई है, इसके पास बच्चों को नहीं भेजना है। इसके बाद से ही बच्चे नहीं आ रहे हैं’
उनका कहना था कि ईसाई कार्यकर्ताओं को हटाया जाए नहीं तो कोई नहीं आएगा।
सुनीता कहती हैं ‘मैं इस आंगनवाड़ी में चार साल से काम कर रहीं हूं। जबकि चर्च तो पिछले आठ नौ सालों से जा रही हूं। मेरी नौकरी के वक्त तो किसी तरह की कोई परेशानी नहीं हुई। अब 21 बच्चों के भविष्य के साथ क्यों खेला जा रहा है। ज्यादातर बच्चे गरीब परिवारों से आते हैं। उन्हें आंगनवाड़ी में अक्षर ज्ञान के साथ-साथ पौष्टिक आहार मिलता था। लेकिन यह लड़ाई बच्चों के भविष्य को खराब कर रही है। हांलाकि मेरे मन में किसी तरह की बदले की भावना नहीं है। मैं चाहती हूं की बच्चे यहां आएं।”
वह आगे बताती हैं ‘ जबकि पहले यहां बच्चे आते थे, पोषण आहार उन्हें मिलता था। पोषण त्यौहार में अभिभावक भी आते हैं। इस घटना के बाद सिर्फ तीन बच्चे आंगनवाड़ी आ रहे हैं। इन्हीं की रिपोर्ट जिले की बाल विकास विभाग में दी जाएगी’।
सहायिका हिंदू है
सुनीता कहती हैं कि मैंने इसकी शिकायत भी जिला के बाल विकास विभाग में की। उन्हें मुझे लगातार काम पर जाने के लिए कहा।
अमेश्वरी सलाम बड़े तेवड़ा में सहायिका के तौर पर काम करती हैं और आदिवासी हैं। हमने उनसे पूछा क्या ‘आपको भी काम करने के लिए मना किया गया’? जवाब था नहीं! लेकिन इस घटना के बाद जब भी मैं बच्चों को आंगनवाड़ी के लिए बुलाने के लिए गई तो अभिभावकों ने साफ कहा गांव में जो फैसला हुआ है उसके खिलाफ हम बच्चों को नहीं भेजेंगे।

हमने इस बारे में गांव के सरपंच रजमन सलाम से बातचीत करने की कोशिश की। लेकिन शव दफन के मामले में हिंसक झड़प के बाद वह गांव में नहीं थे। हम इसके लिए उपसरपंच शाम सिंह सरफे के घर गए। लेकिन वह भी हमसे मिलने नहीं आएं।
हमने गांव के कुछ परिवारों से इस घटना के बारे में जानना चाहा। जिनके बच्चे आंगनवाड़ी में पढ़ते हैं। कुछ लोग हमसे बात करने के लिए तैयार हुए और कुछ ने कहा पंचायत ने जो भी फैसला लिया है। हम उसका पालन करेंगे। बच्चों के भविष्य के बारे में पूछने उनके पास कोई जवाब नहीं था।
अभिभावक चाहते हैं बच्चे आंगनवाड़ी जाएँ
सुरवती सलाम और मनीष सलाम दोनों ने कम उम्र में ही प्रेम विवाह किया है और बड़े तेवड़ा गांव में रहते हैं। इनके दो बच्चे हैं और एक में आंगनवाड़ी में जाता था। लेकिन गांव के फैसले बाद भेजना बंद कर दिया। सुरवती के घर की स्थिति अच्छी नहीं है। दोनों ही मजदूरी करते है और घर का खर्च चलाते हैं। मिट्टी के घर में कुछ मवेशियों को भी पाल रखा है। उनके दोनों बच्चे घर के बाहर डंडों के सहारे से एक गाड़ी बनाकर चला रहे थे।
बच्चों को यह बात पता नहीं है कि अब वो आंगनवाड़ी क्यों नहीं जाते हैं। लेकिन आंगनवाड़ी को कार्यकर्ता को देखकर थोड़ा डर जाते हैं जैसे वो उन्हें स्कूल लेकर न चली जाए।
आंगनवाड़ी में गांव के बच्चों को लेकर पढ़ाई के साथ-साथ पौष्टिक आहार भी मिलता है, जो गरीब बच्चों के लिए शारीरिक वृद्धि में मददगार होता है। सुनीता ने हमें आंगनवाड़ी दिखाते हुए वहां रखा खाने वाला सामान दिखाते हुए कहा ‘कई बच्चे गांव में बहुत सारी सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं ऐसे में यह बिताए गए कुछ घंटे उन्हें शिक्षा की दुनिया से रुबरु कराने के साथ-साथ चित्रकला और खाने के भी स्वाद एहसास कराते हैं, पिछले कुछ समय से आंगनवाडियों में खाने को लेकर किसी तरह भी लापरवाही प्रशासन के द्वारा इग्नोर नहीं की जा रही है। इसलिए कई लोग अपने बच्चों को भेजना चाहते हैं।

सुरवती भी यही चाहती हैं, उनकी घऱ की स्थिति नहीं है लेकिन बच्चे पढ़ें ज़रूर। बगल में बैठे मनीष कहते हैं “गांव वालों ने फैसला लिया है कि कोई भी बच्चा आंगनवाड़ी नहीं जाएगा क्योंकि वहां ईसाई महिला कार्यकर्ता है।”
मैंने उनसे पूछा क्या आप अपने बच्चे को आँगनवाड़ी भेजना चाहते हैं? जवाब था भेजना तो चाहते हैं लेकिन गांव के फैसले के विरुद्ध नहीं जा सकते हैं।
सुरवती स्वयं दसवीं तक पढ़ी हैं। छोटी उम्र में शादी हो जाने के कारण परिवार की जिम्मेदारियों में उलझ गई। उनका कहना था एक नियम होता है, यहां सारी चीजें उसी हिसाब से चलती हैं, अब गांव का निर्णय है तो मानना पड़ेगा। इसमें हमारे बच्चों का भविष्य खराब हो रहा है। अभी एक बच्चा जाता था अगले साल दूसरा भी जाने लग जाता। हम गांव लोग भी कुछ समय बच्चों को आंगनवाड़ी भेजकर काम करने चले जाते थे। बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ खाना भी मिल जाता था। इससे बच्चों की वृद्धि हो रही थी। लेकिन गरीबों की कोई नहीं सुनता और भविष्य भी हमारे बच्चों का खराब हो रहा है।
सुरवती और मनीष चाहते हैं कि बच्चे आंगनवाड़ी जाए लेकिन वह गांव के फैसले के अनुसार बहुत मजबूर हैं।
सोना नरेती इसी गांव में एक किसान हैं। जिनके चार बच्चे हैं और एक बच्ची आंगनवाड़ी जाया करती थी। वह कहते हैं पूरे गांव में यह फैसला लिया कि ईसाई समुदाय के लोगों का बहिष्कार करना है। इसीलिए आंगनवाड़ी का भी विरोध हो रहा है।
बच्ची को आंगनवाड़ी भेजने के बारे में पूछने पर वह कहते हैं ‘हमारे चाहने से क्या होता है गांव में जो फैसला लिया गया है उसे मानना पड़ेगा, बच्चों के भविष्य के बारे में कोई नहीं सोचता है’।
हमने सोना नरेटी से पूछा- क्या आपके बच्चों को आंगनवाड़ी में ईसाई प्रार्थना सिखाई जा रही है? क्या कभी घर में बच्चों ने इस तरह की शिकायत की? जवाब था नहीं, बच्चों ने कभी भी इस तरह की बात भी नहीं की लगे वह आंगनवाड़ी में ईसाई प्रार्थना कर रहे हो।
कांकेर में हुई इस घटना पर डीएम नीलेश कुमार महादेव से संपर्क करने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने हमारे मैसेज कोई जवाब नहीं दिया।
इस घटना के बाद भी कांकेर में लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं जहां आंगनवाड़ी की कार्यकर्ता ईसाई होने के कारण बच्चों को आंगनवाड़ी नहीं भेजा जा रहा है।
11 मई को शारदा बघेल, चंद्रिका ठाकुर कार्यकर्ता (ग्राम कापसी), ब्लॉक कोयलाबेड़, नीता साहू, कार्यकर्ता (ग्राम गोवर्धन) ब्लॉक कांकेर से अपनी समस्या को लेकर जिला कलेक्टर और एसपी ऑफिस पहुंची और समस्या को लेकर ज्ञापन सौंपा। उन्होंने बताया कि लगातार सामजिक बहिष्कार के बाद उन्हें आंगनवाड़ी में प्रतिबंधित किया गया है। जिसके कारण उन्हें दो महीने से वेतन भी नहीं मिला है।
चंद्रिका ठाकुर कपासी ग्राम में कार्यकर्ता हैं इनके यहां तीन आंगनवाड़ी हैं। जिसमें अलग-अलग पाड़ा के बच्चे आते थे। चंद्रिका की आंगनवाड़ी में पांच बच्चे आते थे। उनका कहना है कि ‘मार्च के महीने में गांव वालों की तरफ से ग्राम पंचायत को बुलाया है। जिसमें कई लोग शामिल थे। वह सभी लोग लगातार मुझे घर वापसी के लिए कह रहे थे। मैंने ग्राम पंचायत से कहा मैं आप लोगों से अलग नहीं हूं। इसी गांव में रहती हूं और सबसे मिलना जुलना भी करती हूं। ऐसे में शामिल होने वाली बात का क्या मतलब।
वह आगे कहती हैं इसके बाद यह फैसला लिया गया कि मुझे आंगनवाड़ी में जाने नहीं दिया जाएगा और दूसरे दिन से आंगनवाड़ी में गांव के ही कुछ लोगों ने ताला लगा दिया। जिसके बाद से न मैं आंगनवाड़ी जा पाई और न ही मुझे इसकी पेमेंट मिली है।
हमने इसके लिए गांव की ही सरपंच सुमित नरेटी से बात की। वह कहती हैं ‘हमारे गांव में तीन आंगनवाड़ी है। पूरे गांव के लोगों का फैसला है धर्मातरित लोगों से किसी तरह का कोई संबंध नहीं रखना है। इसके बाद से ही हमने आंगनवाड़ी को बंद कर दिया है। बच्चों को हम लोग दूसरी आंगनवाड़ी भी भेज रहे हैं।
इस संबंध में हमने अनूसूचित जनजाति के जिला अध्यक्ष ईश्वर सिंह से बात की। वह आदिवासी समाज से ताल्लुक रखते हैं। लेकिन कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं है।
ईश्वर का कहना है यह गांव के अपने नियम होते हैं, जिसमें वह खुद अपने फैसला है। आंगनवाड़ी मामले में भी गांव का ही फैसला है इससे राजनीति का कोई लेना देना है।
बच्चो के भविष्य के बारे में पूछने पर वह कहते हैं “हमें यह खबर मिली है कि आंगनवाड़ी में बच्चों को ईसाई प्रार्थना करवाई जाती है। ऐसे में बच्चों का भविष्य तो वैसे भी ईसाईयों के पास जा रहे है। अगर अभिभावक को लग रहा है ऐसे माहौल में बच्चों को आंगनवाड़ी नहीं भेजना चाहिए तो हमें उनके फैसले का सम्मान करना चाहिए’।
वहीं दूसरी ओर जिला मसीही आस्था समाज कांकेर अध्यक्ष पी.मोहन का कहना है कि हमने इस मामले में कलेक्ट के साथ-साथ कई विभागीय अधिकारियों से बातचीत की है। लेकिन किसी का भी इस मामले में कोई ज्यादा सहयोग नहीं मिला।
वह कहते हैं कि यह एक तरह से किसी की डिगनिटी पर भी सवाल उठाता है। जिसका बच्चों की मानसिकता पर गलत प्रभाव पड़ा रहा है। बच्चे जिन टीचर्स से पढ़ते थे अब उनसे बात भी नहीं करने दी जा रही है। आंगनवाड़ी में ताला लगा दिया जा रहा और बच्चों को आने नहीं दिया जा रहा है। इससे तो साफ न कि बच्चों के भविष्य के बारे में कोई नहीं सोच रहा है।
बच्चों यह भी नहीं पता किसके साथ खेल रहे हैं। लेकिन इस तरह की घटना बच्चों के बीच बंधुत्व का भाव भी खत्म हो रहा है। जिस उम्र में उन्हें एक दूसरे के साथ पढ़ना लिखना खेलना कूदना चाहिए था, उस वक्त उन्हें अंदर धर्म के नाम पर ईर्ष्या भाव भरा जा रहा है।
(पूनम मसीह रिपोर्टर हैं।)