ग़रीबों को साफ़ करके, ज़मीन मुनाफाखोरी की भेंट : मुम्बई का ध्वस्तीकरण अभियान

पिछले एक महीने में मुम्बई में तीन बड़े अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाये गये हैं। 

पहला अभियान घाटकोपर-मानखुर्द लिंक रोड के किनारे चलाया गया था। हालिया वर्षों में इसे एक-दिवसीय ध्वस्तीकरण अभियान की सबसे बड़ी कार्रवाई बताया गया जिसमें तक़रीबन 1,400 घरों पर बुलडोज़र चला दिया गया। लगभग 11 एकड़ सरकारी ज़मीन को अतिक्रमण मुक्त किया गया।

12 मई को दूसरा ध्वस्तीकरण अभियान मुम्बई पत्तन प्राधिकरण के अधीन दारुखाना की ज़मीन पर चलाया गया। इस कार्रवाई में तक़रीबन 100 घर ढहा दिये गये।

तीसरा ध्वस्तीकरण अभियान बांद्रा पूर्व के ग़रीब नगर में चलाया गया। ग़रीब नगर अपने शुरुआत से ही पश्चिम रेलवे और नगर निगम के बीच विवाद में फँसा हुआ है। रेलवे लाइन और पानी की पाइपलाइन के किनारे स्थित रेलवे की तक़रीबन 5,200 वर्ग मीटर ज़मीन पर 2,000 घरों और व्यावसायिक इकाइयों का कब्ज़ा था।

इन तीनों ही मसलों में, “अतिक्रमण हटाने” की भाषा असल में शहरी ज़मीन को भविष्य में पूँजी-प्रधान उपयोगों के लिए पुनर्गठित करने की एक बड़ी प्रक्रिया पर पर्दा डाल देती है। ये अतिक्रमण राज्य की मौन स्वीकृति के साथ दशकों से मौजूद थे – निवासियों को बिजली व पानी के कनेक्शन, मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड, और राजनीतिक संरक्षण तक प्राप्त था – लेकिन ज़मीन के राजनीतिक या व्यावसायिक मूल्यों में बढ़ोत्तरी के साथ ही “ग़ैर-क़ानूनी” घोषित कर दिये गये।

ग़ौर करने वाली एक और समानता है राज्य की चायनात्मक मौजूदगी। इन तीनों ही इलाकों को प्रशासन ने बुनियादी सुविधाएं और नियमित सेवाएँ मुहैया करने के समय नज़रअंदाज़ किया, लेकिन बेदख़ली के वक़्त प्रशासन और पुलिस बल भारी संख्या में मौजूद रहा।

उतनी ही ग़ौर करने लायक बात है उन निवासियों का पूरी तरह से मताधिकार से वंचित हो जाना जिनके पास वैसे तो नागरिकता और लम्बे समय से निवास के प्रमाण के रूप में कागज़ात मौजूद हैं। जैसे ही उनपर “अतिक्रमणकारी” का ठप्पा लगा दिया जाता है, शहर में उनकी वैधता ही सन्देह के घेरे में आ जाती है। यह स्थिति मौजूदा दस्तावेज़ीकरण और जनगणना अभियानों के दौर में और भी क्रूर हो जाती है, जहाँ ध्वस्तीकरण और विस्थापन लोगों को असल में भौगोलिक के साथ-साथ प्रशासनिक रूप से भी मिटा सकता है। 

सबसे गहरी समानता है कि इन तीनों ही बसाहटों में मुम्बई के आर्थिकी के लिए ज़रूरी मज़दूरों के घर थे: परिवहन कर्मी, बन्दरगाह मज़दूर, कबाड़ बीनने वाले, घरेलू कामगार, रेलवे से जुड़े मज़दूर और छोटे फेरीवाले। पीढ़ियों तक रहने के बाद भी उनकी उपस्थिति अस्थायी या ग़ैर-क़ानूनी है। 

इन तीनों इलाकों में सबसे ज़्यादा विचलित कर देने वाली समानता शायद सामाजिक परित्याग का निरा नंगापन है। बच्चे और औरतें मलबे में कपड़े, बर्तन, स्कूल की किताबें, और पहचान पत्र ढूँढते नज़र आते हैं। पुरुष कम्बल, लोहे के रोड, लकड़ियों के तख़्ते और हर ऐसी चीज़ जिसे फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है या बेचा जा सकता है, बचा लेते हैं। वहीं बाक़ी लोग मलबे में तब्दील हो चुके अपने घर के पास बैठे नज़र आते हैं, जैसे अचानक हुई बेदख़ली के हिंसक आघात को समझ पाने में नाक़ाम हैं।  

ध्वसतीकारण प्रक्रिया कितनी “क़ानूनी” थी?

घाटकोपर-मानखुर्द लिंक रोड में 18 फरवरी 2026 को नोटिस जारी किये गये थे और निवासियों को जगह खाली करने के लिए 7 दिनों का समय दिया गया था। एकदिवसीय ध्वस्तीकारण अभियान के लिए बीएमसी के एम-पूर्व वॉर्ड के साथ कई समन्वय बैठकें की गईं, 10 से ज़्यादा जेसीबी मशीनें तैनात की गईं, और भारी पुलिस बल तैनात किया गया। इसके बाद सरकार ने ज़मीन खाली करा ली है, लेकिन इस ज़मीन के इस्तेमाल की कोई ठोस योजना की घोषणा नहीं की गयी है।

प्रस्तावित इस्तेमाल में डिटेन्शन केन्द्र से लेकर विज्ञान पार्क तक शामिल हैं। मुम्बई के उप-नगरीय कलेक्टर सौरभ कौटियाल के अनुसार 2011 के बाद हुये अतिक्रमणों की सीमा निर्धारित करने के लिए सैटेलाइट इमेजरी का इस्तेमाल किया गया था।

दारुखाना में, मुम्बई पत्तन प्राधिकरण ने 17 अप्रैल 2026 को न्यू टैंक बंडर रोड के किनारे के लगभग 120 घरों को नोटिस जारी किये थे। अधिकारियों ने इस बसाहट को “अनाधिकृत अतिक्रमण” और “सुरक्षा के लिए ख़तरा” बताते हुये तर्क दिया कि यह इलाका बन्दरगाह अवसंरचना के बेहद निकट है। 28-29 अप्रैल को तक़रीबन 400 निवासियों ने मानव शृंखला बनाकर इस इलाके तक पहुँच को रोक दिया और ध्वस्तीकारण के शुरुआती प्रयासों का विरोध किया।

12 मई को भारी पुलिस बल; लगभग 500 कर्मियों; की मौजूदगी में दूसरे ध्वस्तीकरण अभियान को अंजाम देने की कोशिश की गयी। तक़रीबन 100 घर ढहा दिये गये जिससे लगभग बच्चों और बुज़ुर्गों समेत 500 निवासी विस्थापित हो गये। बुलडोज़र सुबह-सुबह इलाके में दाख़िल हुए जबकि ख़बरों के अनुसार पुलिस बल रात भर वहाँ तैनात था। कई निवासियों के अनुसार वे वहाँ 1995 से पहले से बसे हुए थे और उनके पास पात्रता सम्बन्धी दस्तावेज़ भी मौजूद थे।

हालाँकि, ज़मीन केन्द्र सरकार के अधीन होने के कारण मात्र से पुनर्वास के दावे स्वतः लागू नहीं हो जाते। ध्वस्तीकरण की पहली कोशिश के बाद सत्ता और विपक्ष, दोनों के ही नेताओं ने आश्वासन दिये, लेकिन अन्ततः लोगों को कोई राहत मुहैया नहीं कराई गयी। बन्दरगाह की ज़मीन पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई लगातार होती ही रहती है, हालाँकि निवासियों को बाद में अक्सर पुनः बस्ने की अनुमति दे दी जाती है।

ग़रीब नगर की झुग्गी बस्ती सीधा पश्चिमी रेलवे की सम्पत्ति और बीएमसी के विशाल जल अवसंरचना – महत्वपूर्ण तानसा जल पाइपलाइन – के बीच में बसी हुई थी। विस्तारित होती यह बस्ती ऐतिहासिक तौर पर दोनों ही संस्थाओं की ज़मीनों के हिस्सों पर कब्ज़ा जमाती आई है। अपने शुरुआती दिनों में इस बस्ती ने पश्चिमी रेलवे औए स्थानीय वॉर्ड कार्यालय से नियमित तौर पर बेदख़ली नोटिस पाये थे।

राजनीतिक संरक्षण के कारण कई बार ये कार्रवाईयाँ रोक दी जाती थीं। पुराने निवासी याद करते हैं कि पूर्व सांसद सुनील दत्त ने बड़े पैमाने पर निष्कासन की मुखालिफ़त की थी। ध्वस्तीकरण के बाद अक्सर कच्चे ढाँचे फिर से खड़े हो जाते थे और अगले ध्वस्तीकरण अभियान तक टिके रहते थे।

26 अक्टूबर 2017 को उच्च न्यायालय ने मुम्बई के मुख्य जल पाइपलाइन के 10 मीटर के दायरे में सभी अतिक्रमणों को हटाने के आदेश दिये थे। नगर निगम भारी पुलिस बल और बुलडोज़रों के साथ मौक़े पर पहुँचा था। ध्वस्तीकरण की शुरुआत के कुछ घंटों बाद भीषण स्तर-4 की आग लग गयी जिसने पूरे इलाके को अपनी चपेटे में ले लिया। बाद में पुलिस जाँच ने यह दावा किया कि एक निवासी ने बेदख़ली को रोकने के लिए आग लगायी थी।

आग और उसके उपरान्त चली अदालती कार्यवाहियों के कारण ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा मुक़दमेबाज़ी में फँसा रहा। 2022 में सुचारु रेल संचालन और रेलवे पटरियों के किनारे कूड़े को रोकने के लिए  148 ढाँचे  को ढहा दिया गया था। 19 मई 2026 को उच्च न्यायालय के अन्तिम आदेश को लागू किया गया।

पश्चिमी रेलवे इंजीनियरिंग डिवीज़न के नेतृत्व में और रेलवे सुरक्षा बल समेत मुम्बई पुलिस के 1000 से भी ज़्यादा कर्मियों की मौजूदगी में विस्थापन अभियान के तहत लगभग 400 से ज़्यादा अनधिकृत कई मंज़िला ढाँचों को ढहा दिया गया। उच्च न्यायालय के आदेशानुसार केवल 100 सरवेक्षित भूतल ढाँचे वैकल्पिक आवास की व्यवस्था होने तक सुरक्षित रहेंगे।

सभी दस्तावेज़ीकरण अभियानों की साझा कड़ी

इन झुग्गी बस्तियों में काम करते हुए मेरी राय बनी है कि ग़रीब नगर जैसी अस्थिर बस्तियाँ तब तक टिकी रहने दी जाती हैं जब तक वे प्रत्यक्ष रूप से सीमित और नियंत्रित रहती हैं। जैसे ही वे विस्तारित होती हैं  और हद पार करने लगती हैं, ध्वस्तीकरण अभियान शुरू कर दिये जाते हैं। यह आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग और निम्न-आय समूहों के लिए आवास की गम्भीर कमी के सूचक हैं। यह यह भी दर्शाता है कि प्रवासियों के लिए इस शहर में कोई जगह नहीं है, अगर वे मुम्बई आते हैं तो अपने दम पर आएं, ख़ासकर आवास के मामले में। 

भीषण गर्मी के दौरान की गयी बेदख़ली शहर के प्रशासन व्यवस्था के असंवेदनशील रवैये को और बेपर्द करती है। राजनीतिक सत्ता, अवसंरचना अजेंसियों और पूँजी का नापाक गठजोड़ का दखल उजाड़े जा रहे लोगों के प्रति बेरुख़ी का रवैया अपनाते हुए विस्थापन की प्रक्रिया में बढ़ता जा रहा है। नये प्रवासी और हाल में बसे परिवार सबसे अधिक असुरक्षित होते हैं क्योंकि न तो उनके पास बचत होती है और न स्थायी सामाजिक सहारा। कई मामलों में विस्थापन का संकट पूरे समाज को ही प्रभावित करता है जिससे सहयोग की संभावनाएं भी ख़तम हो जाती हैं।

इन ध्वस्तीकरण अभियानों के कारण क़रीबी मज़दूरों के रिहायशी इलाकों में मकानों के किराये पर बढ़ोत्तरी का दबाव पड़ता है। सस्ते आवास की माँग में बढ़ोत्तरी के साथ किराया तेज़ी से बढ़ता है और कई बार विस्थापित लोग ख़ुद ही उस इलाके से बाहर हो जाते हैं। अनियमित अनौपचारिक रेंटल मार्केट ज़्यादा भीड़भाड़, असुरक्षित निवास, मनमानी किराया बढ़ोत्तरी और मकान मालिकों की दबावपूर्ण व्यवहार जैसी परिस्थितियों में और भी ज़्यादा शोषणकारी बन जाता है। 

ये ध्वस्तीकरण क्यों हुए?

इन तीनों ही मामलों में ध्वस्तीकरण को अवसंरचनागत विस्तार, सुरक्षा और शहरी सुधार के नाम पर जायज़ ठहराया गया।

घाटकोपर-मानखुर्द लिंक रोड के किनारे 11 एकड़ राजस्व भूमि को कथित रूप से मौजूदा जेलों पर दबाव कम करने हेतु डिटेन्शन केन्द्र बनाने के लिए 15 मई को केन्द्रीय जेल प्राधिकरण को सौंप दिया गया।

ग़रीब नगर के ध्वस्तीकरण को बांद्रा टर्मिनस के विस्तार, रेलवे परिचालन की क्षमता में बढ़ोत्तरी और रेलवे की बेशक़ीमती ज़मीन के मुद्रीकरण से जोड़ा गया। अधिकारियों का दावा था कि खाली कराई गयी ज़मीन अतिरिक्त रेलवे सेवाओं और स्टेशन के पुनर्विकास में सहायक होगी। 

दारुखाना में मज़दूर बस्तियाँ और अनौपचारिक व्यावसायिक अड्डे हमेशा ही बन्दरगाह पुनर्विकास, सड़क विस्तार व पूर्वी तटरेखा को अधिक क़ीमती शहरी रियल एस्टेट में बदलने की कोशिशों के कारण दबाव झेलता रहा है।  

मानखुर्द, दारुखाना और ग़रीब नगर मुम्बई में चल रहे एक बड़े परिवर्तन के द्योतक हैं :

मज़दूर आबादी को अनौपचारिक रूप से सोख लेने वाले शहर से एक ऐसे शहर की ओर जो अब ज़मीन के व्यवसायीकरण, अवसंरचनात्मक गलियारों और सट्टात्मक पुनर्विकास से संचालित हो रहा है।

अतः यह अतिक्रमण महज़ अलग-थलग “अतिक्रमण-विरोधी” कार्रवाईयाँ नहीं है बल्कि शहरी इलाकों के व्यापक पुनर्निर्माण की कड़ी का हिस्सा है, जहाँ ग़रीब तब तक सहे जाएंगे जब तक उनके श्रम की ज़रूरत हो और ज़मीन की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी के साथ विस्थापित कर दिये जाएँगे। 

जो तस्वीर उभरती है वह बेहद बहिष्कारी और संरचनात्मक रूप से असंवेदनशील शहर की है – जो ग़रीबों के श्रम पर टिका है लेकिन उन्हें सुरक्षा, आश्रय और शहर में स्थायी जगह देने से इंकार करता है। 

(श्वेता दामले की रिपोर्ट “फ्री स्पीच कलेक्टिव” से साभार। दामले हैबिटेट एण्ड लाइवलीहूड वेलफ़ेयर एसोसियेशन की संस्थापक व निदेशक हैं और वर्किंग पीपल्स कोएलिशन की कार्यकारी समिति की सदस्य हैं। अनुवाद : वृषाली श्रुति। मूल रिपोर्ट यहाँ पढ़ सकते हैं।)

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