देश के हर दिल अज़ीज़ शायर बशीर बद्र साहिब का इंतकाल कुर्बानी के पर्व ईदुल अज़हा के दिन हुआ।उसी दिन उन्हें भोपाल में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। वे लंबे अर्से से अस्वस्थ थे। उनके निधन पर शिद्दत से लोगों ने बखूबी याद किया। अख़बार और मीडिया चेनल ने भी इस लोकप्रिय शायर पर बेहतरीन तरीके से उन्हें स्मरण किया। अदबी शायरों ने उनकी ग़मी पर अपने अशयार से उन्हें नवाज़ा। उनकी यादें बदस्तूर सोशल मीडिया पर जारी हैं।
लेकिन सिरफिरों का क्या कहना? मुसलमान शायर के मरने के बाद भी उन्हें चैन कहां अफवाहों का बाज़ार गरम कर दिया कि बशीर साहिब के जनाजे में बामुश्किल बीस लोग शरीक रहे। लोगों को यकीन भी हो गया वे तरह तरह की दलीलें देने लगे। कुछ ने बताया कि वे व्यवहारिक नहीं थे तो किसी ने फ़रमाया आदमी के रुख़ संत होते ही सब बदल जाते हैं तो कोई ईदुल अज़हा को इस कमी की वजह बताने में जुट गए।
जब ये ख़बरें अख़बारों में सुर्खियां बनी तब भोपाल के साहित्यिक जगत ने अपनी चुप्पी तोड़नी और सचित्र ये बताने की कोशिश की कि उनके जनाजे में 200 से अधिक लोग शरीक थे। सोशल मीडिया पर योजनाबद्ध तरीक़े से यह बात फैलाई गई कि मरहूम पद्मश्री बशीर बद्र साहब के जनाज़े में केवल 20 लोग शामिल हुए। एक साहित्यकार सैयद अदबी जो वहां मौजूद थे ने ज़िम्मेदारी के साथ कहा है कि यह दावा सही नहीं है। जनाज़े में लगभग 200 से 250 लोग मौजूद थे। और कब्रिस्तान पहुंचने तक लोगों की तादाद इससे भी ज्यादा बढ़ चुकी थी ।
हाँ, यह बात अपनी जगह सही है कि बशीर बद्र साहब जैसी बड़ी शख़्सियत के जनाज़े में इससे कहीं ज़्यादा लोग होने चाहिए थे। यह अफ़सोस की बात हो सकती है, लेकिन झूठे आँकड़े फैलाकर पूरे शहर को बदनाम करना भी सही नहीं है। यह बात भी समझनी चाहिए कि वहाँ केवल उर्दू अदबी हल्क़े के लोग ही नहीं थे। प्रशासन के अधिकारी मौजूद थे, एसडीएम साहब मौजूद थे, पुलिस अधिकारी मौजूद थे, मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी का स्टाफ़ मौजूद था, साहित्यकार, शायर, अहबाब और चाहने वाले भी मौजूद थे।
अगर कोई जानबूझकर ग़लत तस्वीर पेश कर रहा है, तो यह सिर्फ़ किसी एक इदारे या हुकूमत को नहीं, बल्कि पूरे भोपाल की तहज़ीबी पहचान को बदनाम करने की कोशिश है।
वाकई लोग कितने संवेदनाहीन हो गए हैं कि एक अमनपसंद बेहतरीन शायर की मौत को भी कमतर दिखाने से नहीं चूकते।ऐसे लोगों को उपन्यास लेखक मुंशी प्रेमचंद और क्रांतिकारी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की शवयात्रा के बारे में पढ़ना चाहिए।जिनकी इस अंतिम यात्रा में चंद लोग ही उपस्थित थे पर इसका उनके लेखकीय व्यक्तित्व पर कोई असर नहीं पड़ा।
वैसे भी, हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ते बन जाएंगे। वे अयोध्या के गांव में जन्में शायर थे अलीगढ़, मेरठ में अपना मुकाम बनाया। मेरठ में भड़के सांप्रदायिक दंगों के दौरान दंगाइयों की उन्मादी भीड़ ने बशीर बद्र के घर को आग लगा दी थी यह पीड़ादायक घटना बशीर बद्र ने अपनी आँखों से देखी और यह उनके जीवन का एक बड़ा मोड़ साबित हुई। उन्होंने लिखा –
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में.”
एक गहरा अफसोस लेकर वे भोपाल चले आए। यहां उन्होंने उन तमाम ऊंचाईयों और कद्रदानों को पाया जो उनकी चाहत थी। उसका ज़िक्र उन्होंने कई दफ़ा अपने दोस्तों के बीच साझा किया है। ये ज़रुर है कि भोपाल की फिज़ाओं में आ रहे बदलाव से वे काफ़ी चिंतित थे। लेकिन उन्होंने अपनी शायरी से पूरे हिंदुस्तान में अपने हुनर से जो मकाम पाया वह काबिले गौर है।
बशीर बद्र साहब की लोकप्रियता से प्रभावित होकर, सागर (मध्य प्रदेश) के रहने वाले प्रसिद्ध शायर अशोक मिज़ाज ने अपने नाम के साथ ‘बद्र’ जोड़ लिया था वे 14 फरवरी 1992 से बशीर साहब के आधिकारिक शागिर्द (शिष्य) रहे हैं। उनके जनाजे में वे शरीक थे। उन्होंने भी जनाजे में बीस लोगों के होने को झूठा बताया है।
अंत में, उनका एक शेर अर्ज़ है जिसमें दुनियावी हकीकत का साफ़ शफ़्फाक रुप देखने मिलता है
कोई हाथ भी न मिलाएगा
जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है
ज़रा फ़ासले से मिला करो
उनके जनाजे को लेकर जो कारगुजारी की गई उसका अहसास यह बखूबी बयां करता है।
(सुसंस्कृति परिहार एक्टिविस्ट और टिप्पणीकार हैं।)