मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं, अभी भी चुनाव याचिका दायर करने का विकल्प

कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा नामांकन पत्र को निरस्त किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने राहत देने से इनकार कर दिया और उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि उनके पास चुनाव याचिका दायर करने का विकल्प खुला है।

सुनवाई के दौरान नटराजन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत के समक्ष दलील दी कि जिस निजी शिकायत (प्राइवेट कंप्लेंट) के आधार पर नामांकन खारिज किया गया, उस पर अब तक किसी सक्षम अदालत ने संज्ञान ही नहीं लिया है।

सिंघवी ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपी एक्ट) की धारा 33ए के तहत उम्मीदवार को केवल उन आपराधिक मामलों का खुलासा करना होता है, जिनमें दो वर्ष या उससे अधिक सजा वाले अपराध में सक्षम अदालत द्वारा आरोप तय (चार्ज फ्रेम) किए जा चुके हों। उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान मामले में न तो आरोप तय हुए हैं और न ही किसी अदालत ने संज्ञान लिया है, इसलिए नामांकन निरस्त करने का आधार कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।

सुनवाई के दौरान सिंघवी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 223 का हवाला देते हुए कहा कि किसी निजी शिकायत में संज्ञान लेने से पहले प्रस्तावित आरोपी को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि संबंधित मामले में केवल नोटिस जारी किया गया है, जबकि संज्ञान लेने और आरोप तय होने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।

इस दौरान न्यायमूर्ति पीके मिश्रा ने टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति के खिलाफ समन तभी जारी किया जाता है, जब मजिस्ट्रेट प्रथम दृष्टया संतुष्ट हो जाए। इस पर सिंघवी ने कहा कि केवल समन या नोटिस जारी होना संज्ञान लिए जाने के बराबर नहीं माना जा सकता और कानून में दोनों की अलग-अलग प्रक्रिया निर्धारित है।

सिंघवी ने अदालत को घटनाक्रम बताते हुए कहा कि 9 जून को नामांकन निरस्त करने का आदेश पारित हुआ, 10 जून को चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाया गया और 11 जून को मामले का सुप्रीम कोर्ट में उल्लेख किया गया।

उन्होंने कहा कि उन्हें आशंका थी कि चुनाव परिणाम घोषित कर दिए जाएंगे और बाद में ऐसा ही हुआ। कांग्रेस की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि रिटर्निंग ऑफिसर ने मामले में मनमाने ढंग से कार्रवाई की।

सिंघवी ने कहा कि जब तक किसी व्यक्ति के खिलाफ विधिसम्मत रूप से लंबित आपराधिक मामला न हो और उसमें आरोप तय न किए गए हों, तब तक केवल निजी शिकायत के आधार पर उम्मीदवार को चुनावी प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि पूरी कठिनाई यह है कि यदि हम आपका नामांकन स्वीकार कर लेते हैं, तो अनुच्छेद 329 के तहत अधिकार क्षेत्र का विभाजन हो जाएगा। एक प्रकार के मामले उच्च न्यायालय देखेगा और दूसरे, जहां स्पष्ट मामला हो, अनुच्छेद 32 के तहत आएंगे। इन दोनों शक्तियों में अंतर कैसे किया जाएगा? हम लगातार कहते आए हैं कि चाहे नामांकन गलत तरीके से ही क्यों न खारिज किया गया हो, उसका उपचार चुनाव याचिका के माध्यम से है। हमें ऐसा कोई फैसला दिखाइए जिसमें हमने चुनाव प्रक्रिया के दौरान हस्तक्षेप किया हो?

कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन की याचिका का विरोध करते हुए भाजपा उम्मीदवार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि नामांकन पत्र खारिज किए जाने का मामला किसी मौलिक अधिकार के उल्लंघन से संबंधित नहीं है। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।

रोहतगी ने तर्क दिया कि संविधान का अनुच्छेद 329 चुनावी प्रक्रिया के दौरान न्यायिक हस्तक्षेप पर पूर्ण रोक लगाता है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के तहत चुनाव प्रक्रिया में दखल नहीं दिया जा सकता। उनके अनुसार, चुनाव की पूरी प्रक्रिया शुरुआत से लेकर परिणाम तक इन संवैधानिक प्रावधानों के दायरे से बाहर रखी गई है।

उन्होंने कहा कि यदि किसी उम्मीदवार का नामांकन गलत तरीके से भी खारिज किया गया हो, तब भी उसका उचित कानूनी उपाय चुनाव याचिका (इलेक्शन पिटिशन) है, जिसे चुनाव न्यायाधिकरण के समक्ष दायर किया जा सकता है। रोहतगी ने मोहितर सिंह गिल मामला और कुल्लू स्वामी मामले का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 329 के कारण न्यायालय चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, चाहे नामांकन निरस्तीकरण सही हो या गलत। उन्होंने कहा, “हर गलत कार्य के लिए कानून में एक न एक उपचार उपलब्ध है।”

रोहतगी ने कहा कि धारा 33ए को लेकर दी जा रही दलील गलत है। इसमें स्पष्ट है कि नियमों के अनुसार जानकारी देना आवश्यक है। 2018 के बाद संशोधित शपथपत्र (एफिडेविट) में सभी लंबित मामलों का विवरण देना अनिवार्य है। इन्हें (नटराजन को) मामले की जानकारी थी, फिर भी उसने उसे छिपाया।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति पीके मिश्रा ने कहा कि हम फिलहाल इन सभी पहलुओं पर नहीं जाएंगे। यदि अंततः हम यह कहते हैं कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं है और याचिकाकर्ता के पास चुनाव याचिका का वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है, तो मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी उस उपाय को प्रभावित कर सकती है। इसलिए हम पहले यह तय करेंगे कि यह याचिका सुनवाई योग्य (मेंटेनेबल) है या नहीं।

पीठ ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33ए का प्रावधान यहां प्रासंगिक है। उम्मीदवार द्वारा जानकारी प्रस्तुत करने की आवश्यकता कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स, 1961 के नियम 4ए में निर्धारित की गई है। नियम 4ए के अनुसार, प्रत्येक उम्मीदवार को रिटर्निंग ऑफिसर के समक्ष नामांकन पत्र प्रस्तुत करते समय अपने द्वारा शपथपूर्वक सत्यापित एक हलफनामा (एफिडेविट) भी जमा करना होता है। फॉर्म-26 में उन जानकारियों का विवरण दिया गया है, जिनका उम्मीदवार को अपने हलफनामे में खुलासा करना अनिवार्य है। फॉर्म-26 का खंड (क्लॉज) 5 नामांकन दाखिल करते समय उम्मीदवार द्वारा प्रदान की जाने वाली सूचनाओं से संबंधित है।

न्यायालय ने कहा कि ऐसी कोई भी व्याख्या, जिसके तहत नामांकन पत्र खारिज किए जाने के मामलों में इस न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप किया जाए और अन्य मामलों को चुनाव याचिका के माध्यम से चुनौती देने के लिए छोड़ दिया जाए, उसे प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता। इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने याचिका में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए उसे खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान अनुच्छेद 32 या 226 के तहत न्यायिक हस्तक्षेप करना अनुच्छेद 329 के सिद्धांतों के विरुद्ध होगा। पीठ ने कहा कि यदि नामांकन निरस्तीकरण जैसे मामलों में “स्पष्ट या गंभीर त्रुटि” के आधार पर भी अदालत हस्तक्षेप करने लगे, तो इससे संविधान में निर्धारित चुनावी प्रक्रिया की संरचना प्रभावित होगी। अदालत ने कहा कि इस तरह की स्थिति में हस्तक्षेप का कोई अलग वर्ग बनाना संविधान में परिकल्पित नहीं है।

न्यायालय ने पोनुस्वामी मामला का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप केवल चुनाव याचिका (इलेक्शन पिटीशन) के माध्यम से ही संभव है और यह सिद्धांत लगातार लागू रहा है। पीठ ने यह भी कहा कि यदि अदालत ऐसे मामलों में अलग-अलग श्रेणियां बनाकर कुछ मामलों में हस्तक्षेप करे और कुछ को चुनाव न्यायाधिकरण के लिए छोड़ दे, तो यह अनुच्छेद 329 की भावना के विपरीत होगा।

अंत में न्यायालय ने कहा कि वह याचिका पर विचार करने के लिए इच्छुक नहीं है और इसे अनुच्छेद 32 के तहत स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई।

इस बीच, नटराजन ने कहा, “जहां तक मेरी समझ है, ये कोई झटका नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चुनाव आयोग में अपील की जाए, तो पार्टी (कांग्रेस) में उस पर चर्चा होगी।”

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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